तर्पण का आखिरी घूंट

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 

बनारस के मणिकर्णिका घाट पर चिताओं की लपटें आसमान को इस तरह चाट रही थीं जैसे कोई भूखा कुत्ता आखिरी हड्डी पर झपट रहा हो। पंडित भालचंद्र शास्त्री अपने फटे हुए झोले को छाती से चिपकाए घाट की आखिरी सीढ़ी पर बैठे थे जहाँ गंगा का मटमैला पानी उनके जर्जर पैरों को बार-बार छूकर लौट जाता था। लोग उन्हें सनकी समझते थे क्योंकि वे हर आती-जाती लाश को देखकर एक अजीब सी हँसी हँसते थे जिसमें व्यंग्य का नमक और भीतर बहते जख्मों का मवाद एक साथ घुला होता था। आज सुबह से ही शहर में एक अजीब सा सन्नाटा था मानो हवा ने अपनी सांसें रोक ली हों और घाट पर आने वाले डोम राजा भी मौन व्रत धारण कर चुके हों। भालचंद्र जी ने अपनी धुंधली आँखों पर चश्मा टिकाया और सामने जलती एक अनाम चिता की राख को उड़ते देखा तो उनके भीतर एक बेनाम करुणा का ज्वार उठा जो सीधे आत्मा के कपाट खटखटाता है। उन्होंने अपने झोले में हाथ डाला और उस मुड़े-तुड़े कागज़ को टटोला जिसके भीतर पूरे अस्सी साल की मुफ़लिसी और एक ऐसा गहरा राज़ दफ़न था जिसकी भनक इस घाट पर खड़े किसी भी ज़िंदा इनसान को नहीं थी। तभी उनके पीछे से एक कड़कती आवाज़ आई जिसने सन्नाटे को चीर दिया और भालचंद्र जी का पूरा बदन काठ की तरह कड़ा हो गया।”अरे ओ शास्त्री बाबू, आज कौने जनम का बदला चुकाने के लिए यहाँ आसन जमाए बैठे हो?” घाट के पुराने मल्लाह घसीटे ने अपनी नाव की पतवार को ज़मीन पर पटकते हुए कहा। भालचंद्र जी ने पलटकर देखा और एक ठंडी आह भरकर बोले “घसीटे, जब ज़िन्दगी खुद एक बहुत बड़ा बदला बन जाए तो मौत का तमाशा देखने में ही असली तृप्ति मिलती है, आज यहाँ एक ऐसा मुसाफ़िर आने वाला है जिसका इंतज़ार मैं पिछले चालीस सालों से कर रहा हूँ।” घसीटे ने तंबाकू थूकते हुए कहा “काहे जवानी के मुर्दों को उखाड़ रहे हो बाबू, यहाँ तो रोज़ सैकड़ों आते हैं और माटी में मिल जाते हैं, तुम्हारा कौन सा ऐसा सगा छूट गया है जिसके लिए आँखों का पानी सुखाकर पत्थर हो गए हो?” भालचंद्र जी ने मुस्कुराने की नाकाम कोशिश की पर उनकी आँखों के कोरों से दो बूंद आंसू टपककर सीधे गंगा के आंचल में समा गए मानो वे पानी से ही पानी का हिसाब मांग रहे हों। उन्होंने कहा “सगा तो वह था जिसने मुझे यह बेनाम दर्द दिया था ताकि मैं भीतर ही भीतर जलता रहूँ और दुनिया समझे कि मैं बहुत सुखी हूँ, आज उसका आखिरी हिसाब होना है और इस घाट पर आज कोई चिता बिना आग के जलेगी।” घसीटे को उनकी बातें पहेली जैसी लगीं पर भालचंद्र जी के चेहरे का वह भयानक सन्नाटा देखकर उसकी भी हिम्मत आगे कुछ पूछने की नहीं हुई।तभी घाट के ऊपरी हिस्से से एक बहुत बड़ा काफिला उतरता हुआ दिखाई दिया जिसमें सफेद कुर्ता-पायजामा पहने बड़े-बड़े वीआईपी और सरकारी अफ़सर शामिल थे। एक सजी-धजी अर्थी को कंधे पर उठाए लोग बड़े रुआंसे चेहरे बनाकर चल रहे थे और उनके पीछे चल रही गाड़ियों का काफिला शहर के सबसे बड़े रईस और दानवीर सेठ दीनानाथ की मौत का ढिंढोरा पीट रहा था। भालचंद्र जी अपनी जगह से उठ खड़े हुए और उनके चेहरे पर एक ऐसा भयानक व्यंग्य उभर आया जैसे कोई बहेलिया अपने जाल में फड़फड़ाते पंछी को देखकर मुस्कुराता है। उन्होंने उस अर्थी की तरफ कदम बढ़ाए तो सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें धक्का देकर पीछे गिरा दिया और बोले “बुढ़ऊ, दूर हटो, जानते नहीं हो यह शहर के सबसे बड़े मसीहा की अंतिम यात्रा है, तुम्हारी गंदी परछाई भी इन पर नहीं पड़नी चाहिए।” भालचंद्र जी ज़मीन पर गिरकर भी हँसने लगे और चिल्लाकर बोले “मसीहा कह रहे हो इसे, ज़रा इसके सीने पर हाथ रखकर देखो कि क्या वहाँ कभी कोई दिल धड़कता भी था या सिर्फ नोटों की गड्डियाँ भरी थीं?” चारों तरफ थू-थू होने लगी पर भालचंद्र जी को जैसे किसी की परवाह नहीं थी, वे उठकर सीधे उस मुख्य पुरोहित के पास जा पहुँचे जो सेठ जी का अंतिम संस्कार करवाने आया था।read more:https://khabarentertainment.in/ghosiya-nagar-panchayats-entire-system-collapsed-during-just-five-minutes-of-rain/“अरे ओ पंडित जी, ज़रा रुकिए और मुझे इस महान आत्मा का तर्पण करने का पहला हक दीजिए क्योंकि इसके पापों का घड़ा भरने में मेरा ही खून लगा है” भालचंद्र जी ने अपने झोले से वह मुड़ा-तुड़े कागज़ निकालकर पुरोहित के हाथ में थमाते हुए कहा। पुरोहित ने गुस्से में आकर कहा “पागल हो गए हो क्या भालचंद्र, यह सेठ दीनानाथ हैं जिन्होंने इस शहर के सैकड़ों अनाथालयों और अस्पतालों को करोड़ों का दान दिया है, तुम जैसे भिखारी का इनसे क्या वास्ता?” भालचंद्र जी ने गरजकर कहा “वास्ता जानना चाहते हो तो इस कागज़ को पढ़ो जिसे यह मसीहा पिछले चालीस सालों से मुझसे छीनने की कोशिश कर रहा था और जिसके लिए इसने मेरी जवान बेटी और पत्नी को भूखा मार डाला था।” उस कागज़ पर लिखा था कि सेठ दीनानाथ कोई दानवीर नहीं बल्कि एक बहुत बड़ा अंतरराष्ट्रीय तस्कर था जिसने भालचंद्र जी की जीवनभर की मेडिकल रिसर्च और जीवन रक्षक दवाओं के फार्मूले को चोरी करके अरबों रुपये कमाए और भालचंद्र जी को पागल घोषित करवाकर सड़क पर भीख मांगने के लिए छोड़ दिया था। उपस्थित भीड़ में कानाफूसी होने लगी और हर कोई स्तब्ध रह गया क्योंकि जिसे वे भगवान समझ रहे थे वह दरअसल एक शैतान का मुखौटा पहने बैठा था।तभी उस अर्थी के पास सेठ जी का इकलौता बेटा रोता हुआ आया और उसने भालचंद्र जी के पैर पकड़ लिए और बोला “चाचा, मुझे माफ़ कर दो, मेरे पिता ने मरते समय मुझसे कहा था कि जब तक पंडित भालचंद्र शास्त्री मुझे मुखाग्नि नहीं देंगे, तब तक मेरी आत्मा को मुक्ति नहीं मिलेगी और मैं भटकता रहूँगा।” भालचंद्र जी ने तड़पकर अपने पैर पीछे खींच लिए और रोते हुए बोले “मुक्ति, जिसने मेरी पूरी दुनिया को ज़िंदा चिता में झोंक दिया, वह आज मुझसे मुक्ति की भीख मांग रहा है, मैं तो यहाँ उसकी लाश पर थूकने आया था ताकि मेरी आत्मा को शांति मिल सके।” बेटे ने हाथ जोड़कर कहा “पिताजी ने अपनी वसीयत में अपनी पूरी संपत्ति आपके नाम कर दी है और वे अपनी गलती का पश्चाताप करना चाहते थे, कृपया उन्हें माफ़ कर दीजिए।” भालचंद्र जी ने उस कागज़ को देखा और उसे हवा में उड़ाते हुए कहा “मुझे तुम्हारी यह दौलत नहीं चाहिए जो मेरे अपनों के खून से सनी है, मुझे तो सिर्फ मेरा वह सम्मान चाहिए था जो इस समाज ने मुझसे छीनकर एक कातिल को दे दिया था।”चारों तरफ सन्नाटा छा गया और लोग रोने लगे क्योंकि भालचंद्र जी की आँखों की वह अंतहीन पीड़ा अब पूरे घाट पर फैल चुकी थी। तभी भालचंद्र जी ने उस अर्थी के पास जाकर कफन हटाया तो उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई और आँखों से आंसुओं का ऐसा सैलाब बहा जिसने उनके बूढ़े चेहरे की झुर्रियों को पूरी तरह भिगो दिया। अर्थी पर सेठ दीनानाथ का शव नहीं था बल्कि वहाँ भालचंद्र जी के उस इकलौते बेटे का शव पड़ा था जो तीस साल पहले मेले में खो गया था और जिसे सेठ दीनानाथ ने गोद लेकर पाला-पोसा और अपना सब कुछ सौंप दिया था। वह बेटा जो भालचंद्र जी को ढूंढते हुए इस शहर में आया था और पिता के गम में तड़प-तड़पकर कल रात दिल का दौरा पड़ने से मर गया था, और उसने मरने से पहले अपने पालक पिता दीनानाथ के नाम का सहारा लेकर यह पूरा स्वांग रचा था ताकि वह अपने असली पिता को ढूंढ सके। भालचंद्र जी चीख मारकर अपने ही बेटे की लाश पर गिर पड़े और चिल्लाए “हे भगवान, यह कैसा न्याय है, मैं जिसे अपना दुश्मन समझकर कोस रहा था, वह तो मेरा ही अंश था जो मुझे ढूंढते-ढूंढते खुद लाश बन गया।” मणिकर्णिका की आग जलती रही और एक पिता अपनी ही कोख के उजाले को मुखाग्नि देने के लिए मजबूर हो गया, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

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