वीरेंद्र बहादुर सिंह
सुबह के साढ़े आठ बजे थे। कालोनी के मोड़ पर रमनलाल अपने पंद्रह साल पुराने स्कूटर खी फटाक-फटाक किक मार रहे थे। स्कूटर एक बार खांस कर बंद हो जाता था। रमनलाल का पूरा शरीर हिल जाता था, लेकिन वह टस से मस नहीं होते थे।read more:https://khabarentertainment.in/meritorious-students-honored-at-klgm-inter-college-incentive-amount-of-%e2%82%b961000-distributed/तभी कालोनी के ही एक बीस साल के आईटी प्रोफेशनल युवक ने बाइक का बटन दबाया, स्क्रीन पर डिजिटल लाइटें चमकीं और गाड़ी आवाज के बिना स्टार्ट हो गई। उसने हंसकर रमनलाल पर तंज कसा, “अंकल, अब जमाना आटोमेशन का है। कब तक इस कबाड़ खटारे को किक मार-मार कर अपना घुटना तोड़ोगे? इसे बेचो और सेल्फस्टार्ट ले लो। बटन दबाओ और लाइफ स्मूथ।”रमनलाल ने हांफते-हांफते स्कूटर को डबल स्टैंड पर चढ़ाया। जेब से रुमाल निकाल कर मुंह पोंछा और हंस कर बोले, “बेटा, तुम्हारी बटन वाली डिजिटल दुनिया देखने में बहुत खूबसूरत लगती है, लेकिन यह रोज सुबह किक मारने की जो प्रक्रिया है, वह मुझे जिंदगी की सबसे बड़ी फिलॉसफी सिखाती है।””वह कैसे अंकल?”रमनलाल ने स्कूटर के हैंडल पर हाथ रख कर कहा, “देखो बेटा, यह हमारी मध्यमवर्गीय जिंदगी भी इस स्कूटर जैसी ही है। सुबह जल्दी उठो यानी महंगाई और जिम्मेदारियां हमें ऐसा जाम कर देती हैं कि हमारा आगे बढ़ने का मूड ही नहीं होता।”उन्होंने स्कूटर की किक की तरफ उंगली दिखा कर आगे कहा, “तब जिंदगी को चालू करने के लिए रोज सुबह थोड़ी किक मारनी पड़ती है। पहली किक परिवार की जिम्मेदारी की, दूसरी किक बच्चों के भविष्य की, तीसरी किक आशा की। दो-तीन बार असफल भी हो जाएं, पैर में चोट भी लगे, लेकिन अंदर का गुस्सा कम नहीं होता और जब चौथी किक पर यह इंजन धुएं का गुबार निकालकर फड़-फड़ करता हुआ जीवित हो उठता है, तब जो असली आनंद मिलता है, वह तुम्हें समझ नहीं आएगा।”रमनलाल ने आंख मारकर कहा, “यह तुम सेल्फस्टार्ट वालों को सब कुछ रेडीमेड और बिना मेहनत के चाहिए होता है। इसीलिए जब जिंदगी में कोई बड़ा झटका या आर्थिक मंदी आती है ना, तब यह बटन वाली पीढ़ी तुरंत डिप्रेशन में आ जाती है, क्योंकि इन्हें किक मारकर, खून का पानी करके फिर से खड़े होने की आदत ही नहीं होती। तुम रुको तो किक स्टार्ट करने के लिए दूसरे की जरूरत पड़ती है और हमें तो यह स्कूटर ही रोज सुबह पछाड़ खा कर भी सेल्फ मोटिवेट होकर स्टार्ट होना सिखाता है।”इतना कहकर रमनलाल ने पूरी ताकत से एक आखिरी किक मारी। स्कूटर एक जोरदार गर्जना के साथ चालू हो गया। रमनलाल हंसते-हंसते गियर डालकर आगे निकल गए और वह युवक अपनी साइलेंट गाड़ी पर बैठा-बैठा अभी-अभी जानी हुई फिलॉसफी को मन ही मन नमन करने लगा कि जिंदगी का असली पावर रेडीमेड बटन में नहीं, बल्कि परिस्थिति के सामने किक मारकर खड़े होने के जज्बे में है।