पीतल का टोकन

नगर पालिका दफ्तर के पुराने बाबू कक्ष के बाहर लगी लोहे की जालीदार खिड़की के पास एक पीतल का गोल टोकन पिछले पंद्रह सालों से ऐसे टँगा हुआ था जैसे किसी लोकतंत्र के गले में नैतिकता का फंदा झूल रहा हो। उस टोकन पर उकेरा गया नंबर वक्त की धूल और रिश्वतखोरों की हथेलियों के स्पर्श से घिसकर आधा मिट चुका था क्योंकि हमारे देश में व्यवस्था से ज्यादा जल्दी सिर्फ गरीब का हक ही घिसता है। उस जालीदार खिड़की के ठीक नीचे रखी सीमेंट की चौड़ी बेंच पर हर सुबह आठ बजे शिवराम काका आकर बैठ जाते थे जैसे कोई ईमानदार आदमी किसी घोटाले की जांच रिपोर्ट आने का इंतजार कर रहा हो। गदराए बालों पर गोल टोपी लगाए और अपनी पुरानी सूती धोती को सरकारी वादों की तरह कसकर बाँधे शिवराम काका दिन भर उस पीतल के टोकन को एकटक निहारते रहते थे क्योंकि इस व्यवस्था में देखने के पैसे नहीं लगते बाकी सब तो बिक ही चुका है। दफ्तर आने वाले सैकड़ों लोग जब अपना मकान टैक्स भरने या जन्म प्रमाण पत्र बनवाने कतार में खड़े होते तो काका को उसी शांत मुद्रा में बैठा पाते थे जैसे भ्रष्टाचार के समुद्र में नैतिकता का कोई पुराना खंभा गड़ा हो। काका की जेब में एक छोटी सी पीतल की नंबर प्लेट हमेशा रखी रहती थी जिसे वे बीच-बीच में निकालकर अपने अँगूठे से ऐसे सहलाते जैसे कोई नेता अपनी कुर्सी को सहलाता है और फिर एक गहरी साँस खींचकर खिड़की की तरफ देखने लगते थे क्योंकि फाइलों के बोझ तले दबी हवा वैसे भी फेफड़ों तक कम ही पहुँचती है। दफ्तर का बूढ़ा चपरासी भीखू जब साहब की मेज पर फाइलों का वह ढेर रखकर बाहर निकलता जिसे देखकर किसी भी स्वाभिमानी कागज़ को शर्म आ जाए तो काका उससे बहुत ही मधुर आवाज में पूछते क्यों रे भीखू आज उस एक नंबर वाले टोकन की पुकार हुई क्या या साहब ने आज भी हमारी अर्जी को अगले हफ्ते के उस कब्रिस्तान में भेज दिया है जहाँ सारी उम्मीदें दफन होती हैं? भीखू बस अपनी हथेली से माथा ठोंक लेता और अपनी आँखें चुराकर चुपचाप झाड़ू लगाने में लग जाता क्योंकि व्यवस्था की गंदगी साफ करने का नाटक करना ही यहाँ का सबसे बड़ा रोजगार है।read more:https://pahaltoday.com/woman-posing-as-a-bride-flees-after-administering-a-sedative-remains-at-large-even-after-a-month-and-a-half/नगर पालिका में हाल ही में नए मुख्य कार्यपालक अधिकारी के पद पर आए साहब विवेक शर्मा बहुत ही कड़क और ईमानदार माने जाते थे और ईमानदारी आज के दौर में वैसी ही दुर्लभ बीमारी है जिसका इलाज हर नेता ढूँढ रहा है। विवेक साहब जब भी अपनी चमचमाती कार से उतरकर दफ्तर के परिसर में कदम रखते तो उनकी नज़र सबसे पहले उसी सीमेंट की बेंच पर बैठे शिवराम काका पर जाकर रुक जाती थी जो प्रशासन के मुँह पर एक ज़िंदा तमाचे की तरह बैठे रहते थे। कई हफ्तों तक जब उन्होंने हर कार्यदिवस पर काका को उसी एक जगह पर बैठा पाया तो उनके मन में एक अजीब सी उलझन पैदा हो गई क्योंकि सरकारी दफ्तर में किसी का रोज़ आना या तो बहुत बड़े लालच की निशानी है या बहुत बड़ी बेवकूफी की। एक दिन जब ओपीडी की तर्ज पर जनसुनवाई की मेज सजाई गई जहाँ लोग अपनी समस्याओं का वह विलाप करते हैं जिसे सुनने वाला कान पहले ही बहरा हो चुका होता है तो विवेक साहब ने चपरासी भीखू को बुलाकर बहुत ही सख्त लहजे में पूछा अरे भीखू यह बुजुर्ग आदमी रोज सुबह से शाम तक उस खिड़की के बाहर क्यों जमा रहता है क्या इनका कोई पेंशन या मकान नामांतरण का केस महीनों से उस कोमा में है जिसे हम सरकारी फाइल कहते हैं? भीखू ने अपने गमछे से पसीना पोंछते हुए उत्तर दिया साहब यह तो पंद्रह सालों से रोज यहाँ आते हैं इनके पास कोई नई फाइल नहीं होती बस यह पीतल के टोकन नंबर एक की आवाज सुनने का इंतजार करते रहते हैं जैसे कोई भक्त पत्थर की मूर्ति से बोलने की उम्मीद लगाए बैठा हो। विवेक साहब को यह बात किसी बहुत बड़े प्रशासनिक भ्रष्टाचार या लापरवाही का संकेत लगी क्योंकि उन्हें अभी नया नया जोश था और नए साहब को लगता है कि वे एक ही दिन में फाइलों के जंगल को बगीचा बना देंगे जबकि यहाँ तो पेड़ ही फाइलें खा जाते हैं। उन्होंने ठान लिया कि वे खुद इस पंद्रह साल पुरानी फाइल की अड़चन को दूर करके काका को उनका हक दिलाएँगे मानो वे न्याय के वह देवता हों जिनका मंदिर अभी निर्माणाधीन है।विवेक साहब अपने कमरे से बाहर निकले और कड़े कदमों से उस सीमेंट की बेंच के पास पहुँचे जहाँ शिवराम काका अपनी लाठी पर ठोड़ी टिकाए ऐसे बैठे थे जैसे पुरानी सभ्यता नई बर्बरता का मुआयना कर रही हो। विवेक साहब ने बहुत ही आत्मीय मगर गभीर आवाज में पूछा काका आप इतने सालों से इस पीतल के एक नंबर टोकन का इंतजार क्यों कर रहे हैं अगर आपकी कोई अर्जी खो गई है तो मुझे बताइए क्योंकि इस दफ्तर में फाइलें गायब होना उतनी ही सामान्य बात है जितनी नेताओं का दल बदलना और मैं आज ही आपकी फाइल को मंजूर करवाकर आपका काम पूरा करवा देता हूँ। शिवराम काका ने अपनी धुंधली आँखों पर चढ़ा चश्मा ठीक किया और अपने कांपते हाथों से अपनी जेब से वही पीतल का छोटा सा नंबर प्लेट निकालकर साहब की हथेली पर रख दिया जो पंद्रह साल के इंतजार का वसीयतनामा था। काका ने मुस्कुराते हुए कहा साहब यह सिर्फ एक नंबर का टोकन नहीं है बल्कि इस शहर के सबसे पहले बेघर इंसान के पक्के मकान की वह उम्मीद है जो पंद्रह साल पहले इस दफ्तर ने मुझे दी थी और जिसे विभाग के चूहे अब तक कुतर नहीं पाए हैं। विवेक साहब ने अचरज से उस पीतल के टुकड़े को देखा और पूछा काका क्या पंद्रह साल पहले बनी बेघर आवास योजना में आपको पहला मकान मिलने का वादा किया गया था और आज तक आपको वह मकान नहीं मिला क्या विभाग की फाइलें किसी कछुए की पीठ पर सवार होकर चल रही थीं? काका ने सिर हिलाकर हाँ में जवाब दिया और उनकी आँखों में एक अजीब सी कड़वी चमक तैर गई जो बताती थी कि सरकारी वादों का स्वाद हमेशा कड़वा ही होता है।विवेक साहब का खून यह सुनकर खौल उठा कि एक गरीब बुजुर्ग को सरकारी योजना का पहला मकान देने में पंद्रह साल लगा दिए गए जबकि हमारे यहाँ तो घोटाले पंद्रह मिनट में हो जाते हैं। उन्होंने तुरंत अपने मातहतों को तलब किया और रिकॉर्ड रूम के क्लर्क को हुक्म दिया पंद्रह साल पुरानी उस पहली बेघर आवास योजना की पूरी फाइल और आवंटन रजिस्टर अभी के अभी मेरी मेज पर हाजिर किया जाए क्योंकि आज मैं खुद इस टोकन नंबर एक का फैसला करके साबित कर दूँगा कि व्यवस्था अभी मरी नहीं है बस बेहोश है। पूरे दफ्तर में हड़कंप मच गया और क्लर्क रिकॉर्ड रूम के उन अंधेरे कोनों में पड़ी धूल भरी फाइलों को खंगालने में जुट गए जहाँ सच अक्सर मकड़ी के जालों में लिपटा हुआ पाया जाता है। शिवराम काका चुपचाप लाठी के सहारे खड़े होकर यह सारा तमाशा देख रहे थे और उनके चेहरे पर एक ऐसी खामोशी थी जो किसी बड़े तूफान के आने का संकेत दे रही थी क्योंकि अनुभवी आदमी जानता है कि सरकारी फाइल का खुलना अक्सर किसी नई मुसीबत का खुलना होता है। लगभग दो घंटे की मशक्कत के बाद रिकॉर्ड रूम का पुराना बड़ा बाबू एक बहुत ही मोटी और लाल कपड़े में लिपटी हुई फाइल लेकर साहब के केबिन में पहुँचा जिसे देखकर लग रहा था कि उसमें न्याय नहीं बल्कि सड़ा हुआ इतिहास भरा है। दफ्तर के बाहर खड़े दर्जनों फरियादी भी कौतूहलवश खिड़की के आसपास जमा हो गए क्योंकि सबको लग रहा था कि आज पंद्रह सालों से दफ्तर के चक्कर काट रहे एक बेबस बूढ़े को आखिरकार उसकी छत मिलने वाली है जबकि इस दफ्तर ने तो लोगों के सिर से आसमान तक छीन लिया था।विवेक साहब ने बहुत ही गर्व और उत्साह के साथ उस लाल बस्ते को खोला और पंद्रह साल पुराने आवंटन रजिस्टर के पन्ने पलटने शुरू कर दिए जैसे कोई जासूस किसी बड़े अपराधी का सुराग ढूँढ रहा हो। उस रजिस्टर के पहले ही पन्ने पर पीतल के टोकन नंबर एक का पूरा ब्योरा दर्ज था जहाँ उस योजना के लिए दान में मिली जमीन और पहली रजिस्ट्री का विवरण लिखा हुआ था और दान देना इस देश में महानता का काम है जिसे बाद में व्यवस्था नीचता में बदल देती है। विवेक साहब ने जैसे ही उस पहली रजिस्ट्री के पन्ने पर लिखे नाम को पढ़ा उनके चेहरे की रंगत अचानक ऐसे उड़ गई जैसे किसी घोटालेबाज के सामने एंटी करप्शन ब्यूरो की टीम आ गई हो और उनके हाथ में थमी कलम छूटकर मेज पर गिर पड़ी क्योंकि सच कभी-कभी स्याही से ज्यादा भारी होता है। कमरे में ऐसा भयावह सन्नाटा छा गया कि वहाँ मौजूद हर कर्मचारी एक दूसरे का मुँह ऐसे ताकने लगा जैसे सबने मिलकर सामूहिक आत्महत्या का विचार कर लिया हो। विवेक साहब ने अविश्वास भरी निगाहों से पहले उस पन्ने को देखा और फिर खिड़की के बाहर खड़े शिवराम काका की तरफ ताका जो पूरी व्यवस्था के लिए एक जीता जागता आरोप पत्र थे। उस पन्ने पर बहुत ही स्पष्ट अक्षरों में लिखा था कि पंद्रह साल पहले जिस तीन एकड़ जमीन पर गरीबों के लिए बेघर आवास योजना का निर्माण किया गया था वह पूरी जमीन किसी सरकार की नहीं बल्कि इसी शिवराम काका की पुश्तैनी संपत्ति थी जिसे उन्होंने अपनी स्वर्गीय पत्नी की याद में शहर के बेघर लोगों को मुफ्त में दान कर दिया था और यही उनकी सबसे बड़ी खता थी क्योंकि इस मुल्क में दानवीर होना किसी बड़े अपराध से कम नहीं है।विवेक साहब की आवाज कांपने लगी और वे अपनी कुर्सी से खड़े होकर थरथराते स्वर में बोले काका जब यह पूरी जमीन ही आपकी थी और आपने अपना सब कुछ गरीबों के लिए दान कर दिया था तो फिर आप पंद्रह सालों से इस टोकन नंबर एक की आस में यहाँ एक भिखारी की तरह क्यों बैठते रहे जबकि इस ज़मीन पर तो आपके पैर धोने चाहिए थे? शिवराम काका के आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली और उन्होंने बिलखते हुए भरे गले से कहा साहब जब मैंने अपनी जमीन दान दी थी तो मैंने केवल एक शर्त रखी थी कि उस कॉलोनी का पहला छोटा सा मकान मुझे रहने को दे दिया जाए ताकि मैं अपनी ही मिट्टी पर सिर ढक सकूँ पर आपके दफ्तर के उन भ्रष्ट अफसरों ने उस टोकन नंबर एक के मकान को एक अमीर ठेकेदार को ऊँचे दामों में बेच दिया जो शायद नैतिकता की नीलामी में माहिर था और मुझे एक बेघर आवेदक की अर्जी थमाकर पंद्रह सालों से टहलाते रहे क्योंकि इस व्यवस्था में दान देने वाले को अक्सर कतार के आखिरी छोर पर खड़ा कर दिया जाता है। काका ने अपनी लाठी को कसकर भींचते हुए कहा मैं यहाँ किसी मकान की भीख माँगने नहीं आता साहब मैं तो रोज यहाँ आकर इस पीतल के टोकन को सिर्फ यह देखने आता हूँ कि इंसानियत की नीलामी करने वाले इस दफ्तर की नीयत में कभी ज़रा सी भी शर्म जागती है या नहीं क्योंकि शर्म तो यहाँ फाइलों के नीचे दबकर मर चुकी है। विवेक साहब सुन्न होकर उस दानपत्र को देखते रह गए जो उनकी पूरी प्रशासनिक गरिमा को चिढ़ा रहा था और पूरा दफ्तर उस निष्पाप बुजुर्ग के छल और व्यवस्था के घिनौने चेहरे पर फूट-फूटकर रो पड़ा क्योंकि जब पाप का घड़ा भरता है तो उसमें से पानी नहीं सिर्फ खारा आँसू ही निकलता है।

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