कोचिंग पर कानून का शिकंजा, मगर असली शिकंजा तो परीक्षा का है

महाराष्ट्र सरकार ने निजी कोचिंग सेंटर्स के लिए ‘महाराष्ट्र प्राइवेट कोचिंग सेंटर्स (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) एक्ट, 2026’ का मसौदा पेश किया है। नीट पेपर लीक के बाद सरकार को उस शिक्षा-बाजार की याद आई, जहां बच्चे विद्यार्थी कम, परिणाम पैदा करने वाली मशीन अधिक समझे जाते हैं। मसौदे में फीस, पढ़ाई के घंटे, छात्र सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, विज्ञापन और पंजीकरण पर कड़े प्रावधान हैं। 25 से अधिक विद्यार्थियों वाले केंद्रों का पंजीकरण अनिवार्य होगा, 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को प्रवेश नहीं मिलेगा और रोजाना पांच घंटे से अधिक कक्षाएं नहीं चलेंगी। उल्लंघन पर 50 लाख रुपये तक जुर्माना होगा। कानून का कद बड़ा है; अब देखना है कि उसका हाथ भी उतना ही लंबा है या नहीं।मसौदे का पहला शिकंजा पंजीकरण है। 25 से अधिक विद्यार्थियों वाले हर कोचिंग केंद्र का पंजीकरण अनिवार्य होगा। पुराने केंद्रों को छह महीने मिलेंगे, पंजीकरण तीन वर्ष के लिए होगा और हर शाखा अलग केंद्र मानी जाएगी। शिक्षक स्नातक होने चाहिए तथा संज्ञेय अपराध में शामिल लोगों की नियुक्ति नहीं होगी। रैंक की गारंटी और भ्रामक विज्ञापनों पर भी रोक होगी। यह जरूरी है, क्योंकि अब तक कई संस्थान बिना जवाबदेही शिक्षा बेच रहे थे। मगर असली सवाल पंजीकरण नहीं, निरीक्षण है। निरीक्षक कम और संस्थान हजारों हुए तो कागजों पर सब ठीक, जमीन पर सब पहले जैसा रह सकता है। कानून की स्याही तभी असरदार है, जब निगरानी की आंख खुली रहे।रोज पांच घंटे की कोचिंग सीमा राहत देती है। सुबह बहुत जल्दी और रात देर तक कक्षाएं नहीं चलेंगी। साप्ताहिक अवकाश होगा और छुट्टी के अगले दिन टेस्ट नहीं लिया जा सकेगा। मानसिक स्वास्थ्य के लिए काउंसलिंग और एप्टीट्यूड टेस्ट अनिवार्य होंगे। यह जरूरी है, क्योंकि प्रतियोगिता ने कई किशोरों को किताब से पहले तनाव पढ़ना सिखा दिया है। लेकिन संस्थान में पांच घंटे बंद हुए तो घर में होमवर्क, ऑनलाइन टेस्ट और निजी ट्यूशन के घंटे बढ़ सकते हैं। दबाव का ठिकाना बदलेगा, दबाव खत्म नहीं होगा। ऑफलाइन सीमा से ऑनलाइन कोचिंग और ऐप-आधारित टेस्ट का प्रभाव और बढ़ सकता है। समस्या कोचिंग के समय की नहीं, उस शिक्षा व्यवस्था की है जिसने सफलता को एक परीक्षा तक सीमित कर दिया है।फीस पर प्रस्तावित नियम अभिभावकों के लिए बड़ी राहत हैं। कोचिंग केंद्र घोषित फीस से अधिक नहीं ले सकेंगे और बीच में शुल्क नहीं बढ़ा सकेंगे। पढ़ाई छोड़ने पर दस दिन में फीस लौटानी होगी, जिसमें हॉस्टल और मेस की रकम भी शामिल होगी। हर भुगतान की रसीद अनिवार्य होगी।read more:https://pahaltoday.com/district-magistrate-holds-meeting-of-the-district-drinking-water-and-sanitation-mission-issues-directives/यह उस कारोबार पर रोक है, जहां प्रवेश के समय सपने किस्तों में और बाद में अतिरिक्त शुल्क सामने आता है। खतरा है कि बड़े संस्थान नियमों की दरारें खोज लें, जबकि छोटे संस्थान उतने सक्षम नहीं होंगे। मसौदे पर सुझाव मांगे जा रहे हैं और चार सितंबर तक आपत्तियां भेजी जा सकती हैं। अंतिम कानून में पारदर्शिता के साथ समान प्रवर्तन भी जरूरी है।सुरक्षा प्रावधान सबसे गंभीर हैं। बेसमेंट में कक्षाओं पर रोक होगी। हर विद्यार्थी के लिए कम-से-कम एक वर्गमीटर जगह जरूरी होगी। अग्नि व भवन सुरक्षा प्रमाणपत्र अनिवार्य होंगे। सीसीटीवी फुटेज एक महीने सुरक्षित रखना होगा। पानी, अलग शौचालय, प्राथमिक उपचार और पार्किंग जरूरी होंगे। डमी स्कूल मॉडल पर पाबंदी होगी और नियम तोड़ने वाले स्कूलों की मान्यता रद्द हो सकती है। इन प्रावधानों का महत्व इसलिए है कि हादसे के बाद सुरक्षा का भाषण किसी बच्चे की जान नहीं बचा सकता। मगर पुराने भवनों में अतिरिक्त जगह निकालना आसान नहीं; कई केंद्र बंद हो सकते हैं। इसलिए मानक कठोर हों, पर निरीक्षण निष्पक्ष और व्यावहारिक हो।महाराष्ट्र के रास्ते पर दूसरे राज्य भी बढ़ रहे हैं। राजस्थान का 2025 का कानून 100 से अधिक विद्यार्थियों वाले केंद्रों पर लागू है। असम ने 50 से अधिक विद्यार्थियों वाले कोचिंग संस्थानों के लिए नए नियम मंजूर किए हैं। हरियाणा, बिहार और झारखंड में भी कानून या मसौदे आए हैं। दिल्ली सरकार भी अपनी व्यवस्था बनाने की तैयारी में है। केंद्र की 2024 की गाइडलाइंस के बाद राज्यों की सक्रियता बढ़ी है। महाराष्ट्र का मसौदा अधिक व्यापक और कठोर है—नियमन 25 विद्यार्थियों से शुरू होता है और जुर्माना 50 लाख तक है। फिर भी पूरे देश में एक कानून बनना आसान नहीं, क्योंकि हर राज्य में राजनीति, प्रशासन और कोचिंग उद्योग का प्रभाव अलग है।सवाल यह भी है कि सजा कितनी होगी और न्याय कितना। मामूली उल्लंघन पर एक से पांच लाख और गंभीर उल्लंघन पर दस से पचास लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। पंजीकरण रद्द और केंद्र बंद भी कराया जा सकता है। कागज पर व्यवस्था मजबूत है। लेकिन बड़े संस्थान जुर्माने को कारोबार की लागत मानकर भर सकते हैं, जबकि छोटा केंद्र बंद हो सकता है। बंबई हाईकोर्ट ने करीब दो दशक पहले भी इस क्षेत्र के नियमन की जरूरत बताई थी, पर ठोस कानून नहीं बन पाया। नीट लीक ने सरकार को फिर जगाया है। शिकायत तंत्र कमजोर, निरीक्षण सीमित और राजनीतिक प्रभाव मजबूत रहा तो कानून की लाठी गरीब पर भारी और प्रभावशाली पर हल्की पड़ सकती है।महाराष्ट्र का मसौदा सही दिशा में कदम है, लेकिन इसे शिक्षा का इलाज समझना भूल होगी। कोचिंग उद्योग उस बीमारी का लक्षण है, जिसकी जड़ कमजोर स्कूली शिक्षा, परीक्षा-केंद्रित व्यवस्था और सफलता की सामाजिक सनक में है। स्कूल बेहतर होंगे तो कोचिंग का साम्राज्य अपने आप छोटा होगा। इसलिए पंजीकरण के साथ ईमानदार निरीक्षण, फीस निगरानी, सुरक्षित भवन, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और शिकायत पर तत्काल कार्रवाई जरूरी है। केंद्र को राज्यों के अनुभवों से सीखकर राष्ट्रीय ढांचा भी बनाना चाहिए। कानून बनाकर सरकार ने दरवाजा खोला है; अब भीतर जाकर देखना होगा कि पढ़ाई हो रही है या डर की फैक्ट्री चल रही है। वरना यह मसौदा भी कागजी शेर साबित होगा—दहाड़ बड़ी, मगर बच्चे उसी पुराने पिंजरे में।

 

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