दो बार सूची में नाम, फिर भी नहीं मिला आवास! जर्जर कच्चे मकान में रहने को मजबूर गरीब परिवार, सरकारी व्यवस्था पर उठे सवाल

आजमगढ़।सरकार की ओर से हर जरूरतमंद परिवार को पक्का आवास उपलब्ध कराने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कई स्थानों पर इन दावों से अलग दिखाई देती है। बूढ़नपुर तहसील क्षेत्र के कोयलसा ब्लॉक अंतर्गत ग्राम पंचायत देउरपुर सराय में एक गरीब परिवार आज भी जर्जर कच्चे मकान में रहने को मजबूर है। परिवार का आरोप है कि पात्र होने के बावजूद उसे सरकारी आवास योजना का लाभ नहीं मिल सका।ग्राम पंचायत देउरपुर सराय निवासी योगेंद्र प्रजापति, पुत्र स्वर्गीय बंशराज प्रजापति, अपनी पत्नी और बच्चों के साथ वर्षों पुराने कच्चे एवं जर्जर मकान में जीवन यापन कर रहे हैं। बरसात और तेज हवाओं के मौसम में यह मकान कभी भी गिर सकता है, जिससे परिवार हमेशा भय के साये में रहने को विवश है।योगेंद्र प्रजापति का कहना है कि उनका नाम दो बार प्रधानमंत्री आवास योजना की पात्रता सूची में शामिल हुआ था, लेकिन बाद में सूची से नाम हटा दिया गया। उनका आरोप है कि किसी प्रभावशाली व्यक्ति के हस्तक्षेप के कारण उन्हें योजना के लाभ से वंचित कर दिया गया। यदि यह आरोप सही है, तो यह न केवल योजना की पारदर्शिता बल्कि पात्र लोगों तक सरकारी लाभ पहुंचाने की व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।read more:https://pahaltoday.com/pm-modi-explained-the-importance-of-every-vote-and-said-that-everyone-should-use-their-vote/योगेंद्र के बड़े भाई रविंद्र प्रजापति अलग रहते हैं और उनके पास पक्का मकान है, जबकि योगेंद्र का परिवार आज भी जर्जर कच्चे मकान में रहने को मजबूर है। परिवार का कहना है कि वह सभी पात्रता शर्तों को पूरा करता है, फिर भी आज तक उन्हें आवास स्वीकृत नहीं किया गया।ग्रामीणों का कहना है कि यदि पात्र व्यक्ति भी सरकारी योजनाओं से वंचित रह जाएंगे, तो योजनाओं का वास्तविक उद्देश्य कैसे पूरा होगा। लोगों का आरोप है कि कई मामलों में पात्रों की जगह अपात्र लोगों को लाभ मिलने की शिकायतें सामने आती रहती हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।परिवार ने प्रशासन से मांग की है कि उनके मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि उनका नाम बिना उचित कारण के सूची से हटाया गया है, तो जिम्मेदारी तय की जाए और उन्हें प्राथमिकता के आधार पर आवास योजना का लाभ दिया जाए।स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारी योजनाओं का मूल्यांकन केवल कागजों से नहीं, बल्कि उन परिवारों की स्थिति देखकर होना चाहिए जो आज भी जर्जर मकानों में जीवन गुजारने को मजबूर हैं।अब बड़ा सवाल यह है कि जब एक पात्र परिवार वर्षों से कच्चे और जर्जर मकान में रहने को विवश है, तो उसकी सुनवाई आखिर कब होगी। क्या उसे भी सुरक्षित पक्की छत का अधिकार समय रहते मिल पाएगा, या फिर वह केवल सरकारी सूची और आश्वासनों तक ही सीमित रह जाएगा?

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