नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पत्नी संग वैवाहिक झगड़े के दौरान सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई), 2005 के तहत पति की इनकम टैक्स डिटेल्स का खुलासा नहीं किया जा सकता।जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने कहा कि ऐसी जानकारी आरटीआई एक्ट के तहत ‘व्यापक जनहित’ के अपवाद के दायरे में नहीं आती। हाईकोर्ट ने इस मामले में केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) के एक आदेश को रद्द करते हुए यह बातें कहीं। हाईकोर्ट के इस फैसले से यह साफ हो गया है कि आरटीआई का इस्तेमाल व्यक्तिगत प्रतिशोध या निजी मुकदमों में हथियार के तौर पर नहीं किया जा सकता। प्राइवेसी के अधिकार को सूचना के अधिकार से ऊपर रखते हुए कोर्ट ने पति को बड़ी राहत दी है। लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला एक पति-पत्नी के बीच चल रहे गुजाराभत्ता के मुकदमे से जुड़ा है। दरअसल, पत्नी ने केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) में अपील की थी कि उसे उसके पति की नेट टैक्सेबल इनकम की जानकारी दी जाए। सीआइसी ने पत्नी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को पति की इनकम की जानकारी शेयर करने का निर्देश दिया था।read more:https://pahaltoday.com/a-young-man-jumped-from-the-saryu-bridge-rescued-by-boatmen-troubled-by-family-feud-and-demanded-a-fencing-on-the-bridge/इसके बाद पति ने सीआइसी के इसी आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। सीआइसी की ओर से यह निर्देश वैवाहिक मुकदमेबाजी और भरण-पोषण के एक लंबित दावे के बीच पत्नी द्वारा दायर की गई दूसरी अपील में जारी किया गया था। पति ने यह तर्क दिया था कि इस तरह की जानकारी का खुलासा उसकी प्राइवेसी पर एक अनुचित अतिक्रमण है और यह आरटीआई एक्ट की धारा 8(1)( जे) के तहत छूट प्राप्त है, जो पर्सनल जानकारी को सार्वजनिक किए जाने से सुरक्षा प्रदान करती है। दिल्ली हाईकोर्ट ने सीआइसी द्वारा पारित विवादित आदेश को रद्द करते हुए कहा कि आरटीआई एक्ट की धारा 8 (1)( जे) यह बताती है कि सामान्य नियम यह है कि पर्सनल जानकारी को आमतौर पर सार्वजनिक किए जाने से छूट प्राप्त होती है, यदि वह सार्वजनिक हित से संबंधित न हो या यदि उसके सार्वजनिक किए जाने से किसी व्यक्ति की निजता का अनावश्यक उल्लंघन होता हो। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि उक्त नियम का एकमात्र अपवाद वह स्थिति है, जहां ऐसी पर्सनल जानकारी को सार्वजनिक करना व्यापक जनहित में जरूरी हो। हाईकोर्ट इस पर गौर करते हुए कि पत्नी द्वारा मांगी गई डिटेल पति की पर्सनल जानकारी थी, कोर्ट ने कहा, यह एक्ट सरकारी संस्थाओ के कामकाज में पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था। विधायिका का यह आशय कतई नहीं हो सकता था कि लोगों की ऐसी पर्सनल जानकारी को सार्वजनिक करने की अनुमति दी जाए, जिसका आम जनता से कोई लेना-देना न हो। इसलिए, व्यापक जनहित की अवधारणा की व्याख्या इस तरह से नहीं की जा सकती, जिससे कि इस एक्ट के प्रावधानों का दुरुपयोग हो।