जहाँ खुदा नहीं रहता

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
कलीम साहब के चेहरे पर झुर्रियों की एक ऐसी उलझी हुई लिखावट थी, जिसे वक्त की स्याही से नहीं, बल्कि शहर के सारे कायदे-कानूनों ने मिलकर लिखा था। वह साठ पार के एक ऐसे ढहते हुए मलबे की तरह थे, जिसमें कभी एक आलीशान इमारत रही होगी। उनके हाथ में प्लास्टिक की एक पारदर्शी थैली थी, जिसमें क्वार्टर की दो बोतलें और पानी का एक पाउच ऐसे टकरा रहे थे, जैसे किसी उजाड़ खंडहर में हवा के झोंकों से लोहे की कोई पुरानी जंजीर दीवार से टकरा रही हो।रात के ग्यारह बज चुके थे। शहर के सारे ठेके पुलिस की सायरन वाली गाड़ियों के डर से अपनी शटर गिरा चुके थे। कानून की मुस्तैदी का आलम यह था कि जैसे पूरी दुनिया का सारा अपराध बस उसी सवा सौ मिलीलीटर के कांच के टुकड़े में कैद हो। कलीम साहब के घुटने अब उनका साथ छोड़ रहे थे, और प्यास? प्यास गले में ऐसे कांटे की तरह चुभ रही थी, जैसे किसी सूखे कुएं के तल में कोई मछली आखिरी बार तड़प रही हो।तभी उनके ठीक सामने उस गली का नुक्कड़ आया, जहां इस अंधेरे और तल्ख शहर की इकलौती रोशन मीनार खड़ी थी। संगमरमर की वह मस्जिद, जिसके कंगूरे रात की चांदनी में ऐसे चमक रहे थे मानो खुदा ने खुद आसमान से चांदी का वर्क उतारकर वहां चिपका दिया हो। कलीम साहब के कदम थमे। उनके पैर उस चौखट की तरफ बढ़ने लगे, जहां कभी अमीर और गरीब, पापी और पुण्य आत्मा, सब एक ही कतार में खड़े होकर सजदा करते थे।वहां चबूतरे पर शहर के सबसे नामी मौलवी साहब बैठे थे। उनकी लंबी सफेद दाढ़ी इतनी सलीके से संवारी हुई थी कि उसमें कोई एक तिनका भी ढूंढना चाहे तो नाकाम रहे। उनका कुर्ता इतना कड़क कलफदार था कि अगर उसे खड़ा कर दिया जाए, तो वह खुद एक इंसान की तरह गवाही देने लगे।कलीम साहब ने अपनी कांपती हुई थैली को छाती से सटाया और सीढ़ियों पर कदम रख दिया।मौलवी साहब की नजरें कलीम साहब की उस थैली पर पड़ीं, और उनकी भौहें ऐसे तिनक गईं जैसे किसी पवित्र किताब पर किसी ने काली स्याही छिड़क दी हो। वह अपनी जगह से ऐसे उछले, मानो तख्ते के नीचे कोई बिच्छू आ गया हो।”अरे-अरे! ओ कलीम! दिमाग खराब हो गया है क्या तुम्हारा? ये क्या नापाक चीज हाथ में थामे खुदा के घर की तरफ बढ़े चले आ रहे हो? लानत है इस उम्र में इस बेहयाई पर! यह मस्जिद है, खुदा का पाक आशियाना। यह फरिश्तों का ठिकाना है, तुम्हारी इस चुल्लू भर लानत का नहीं।” मौलवी साहब की आवाज में पूरे मजहब का ठेका गूंज रहा था।कलीम साहब की आंखों में एक अजीब, सर्द सन्नाटा था। उन्होंने थैली को और कसकर भींचा। उनकी आवाज में रोने की खनक नहीं, बल्कि एक टूटे हुए कांच की किरच थी। उन्होंने मौलवी साहब की आंखों में आंखें डालीं और बेहद धीमे, थरथराते होठों से कहा, “साहब, थका हुआ हूँ। जिंदगी ने ऐसा निचोड़ा है कि अब भीतर सिवाय बारूद के कुछ बचा नहीं है। बस दो घूंट हलक से उतारने दे इस मस्जिद के किसी कोने में बैठकर। खुदा तो बड़ा रहमदिल है ना? वह तो घट-घट की जानता है, वह मेरी इस बेबसी को भी समझ लेगा।””तौबा-तौबा! बदतमीज, गुस्ताख!” मौलवी साहब ने हवा में हाथ लहराया, जैसे किसी आवारा कुत्ते को दुत्कार रहे हों। “खुदा रहमदिल है, लेकिन गुनाहगारों का मददगार नहीं। इस पाक जगह पर कदम रखने की भी हैसियत नहीं है तेरी इस नापाक हालत में।read more:https://pahaltoday.com/india-withdraws-from-hosting-cop-33-a-major-signal-in-climate-diplomacy/ भाग यहाँ से! यहाँ हर जर्रे में खुदा मौजूद है, तेरी इस गंदगी के लिए यहाँ कोई कोना नहीं है।”कलीम साहब की पीठ झुक गई। उनकी हालत उस फटे हुए लिफाफे जैसी हो गयी थी, जिसके भीतर का खत कब का खो चुका था। उन्होंने एक गहरी सांस ली। उन्होंने थैली उठााई, मौलवी साहब को देखा और वह मशहूर शेर बुदबुदाया,”ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर…या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा न हो।”मौलवी साहब के चेहरे पर कुत्सित मुस्कान तैर गई। उन्होंने अपनी उंगली शहर के सबसे अंधेरे, सबसे गंदे कोने की तरफ उठाई, “जा! उस पार जा। जहाँ बदबू है, जहाँ गटर बहता है, जहाँ जिस्म बिकते हैं, वहाँ जा। वहाँ खुदा नहीं रहता। वहाँ जो मर्जी सो कर।”कलीम साहब बिना कुछ कहे पलट गए। वह हांफ रहे थे, गिर रहे थे, संभल रहे थे। वह उस गटर की तरफ नहीं गए, बल्कि वह शहर के उस सबसे पॉश इलाके की तरफ मुड़ गए, जहां बड़ी-बड़ी कोठियां थीं। एक ऐसी कोठी, जिसके बाहर संगमरमर की नेमप्लेट पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था, ‘कलीम विला’।यह कलीम साहब का अपना खुद का घर था। वही घर, जिसे उन्होंने अपनी जवानी के खून-पसीने से सींचा था।अंदर का नजारा हैरान करने वाला था। कलीम साहब का इकलौता बेटा, जो आजकल की लाइफ स्टाइल और प्रोफेशनल इमेज के लिए जाना जाता था, आज घर में एक बड़ी पार्टी दे रहा था। हॉल में शहर के बड़े रईस और सरकारी अफसर मौजूद थे। धुआं, संगीत और महंगी विदेशी स्कॉच के दौर चल रहे थे।कलीम साहब जब पिछले दरवाजे से अपने ही घर के बगीचे में दाखिल हुए, तो उन्होंने खिड़की से देखा कि उनका बेटा मौलवी साहब (जो अभी-अभी मस्जिद से वहां पहुंचे थे) को एक बड़ा लिफाफा सौंप रहा था। बेटा कह रहा था, “साहब, यह नया प्रोजेक्ट बिना ‘ऊपर वाले की रहमत’ के मुमकिन नहीं था। यह छोटा सा नजराना आपके चैरिटी ट्रस्ट के लिए। बस दुआ कीजिएगा कि अगली टेंडर भी हमें ही मिले।”मौलवी साहब, जो अभी दस मिनट पहले मस्जिद की सीढ़ियों पर पाक-नापाक का पाठ पढ़ा रहे थे, अब उसी हाथ से स्कॉच का गिलास पकड़े हुए थे और मुस्कुराकर कह रहे थे, “मियां, खुदा तो बस तुम जैसे कामयाब लोगों के साथ है।”कलीम साहब अपने ही घर के लॉन में, उसी अंधेरे कोने में बैठ गए जहाँ उन्होंने कभी उम्मीदों का एक पौधा लगाया था। उन्होंने कांपते हाथों से अपनी सस्ती बोतल का ढक्कन खोला। पहली घूंट जब हलक से उतरी, तो उनकी आँखों से निकले आंसू सीधे शराब में जा गिरे।अंदर आलीशान झूमर के नीचे ‘मजहब’ और ‘मुनाफा’ एक ही मेज पर बैठकर जश्न मना रहे थे और बाहर अंधेरे में वह बूढ़ा बाप बैठा था जिसने अपनी पूरी जायदाद और वसीयत कुछ दिन पहले ही अपने बेटे के नाम कर दी थी, यह सोचकर कि अब आखिरी दिन सुकून से बीतेंगे। लेकिन उसे क्या पता था कि जिस घर की ईंटों में उसने अपनी रूह गाड़ दी, वहां अब उसके लिए एक कुर्सी तक नहीं बची थी।कलीम साहब ने अपनी पूरी ताकत समेटकर एक आखिरी घूंट भरी। उनके होठों पर एक ऐसी मुस्कान उभरी, जिसमें रिश्तों और धर्म का जनाजा उठ रहा था। उन्होंने आसमान की तरफ देखा, जहाँ चाँद बादलों के पीछे छिप रहा था।उन्होंने बुदबुदाया, “मौलवी साहब… तुमने सच कहा था। मस्जिद में खुदा था, इसलिए वहाँ जगह नहीं मिली। और इस घर में… इस घर में तो अब सिर्फ ‘सौदा’ बचा है, इंसान ही नहीं रहा, तो खुदा कहाँ से होगा? मुझे मेरी वो जगह मिल गई, जहाँ खुदा नहीं है।”अगले ही पल, कलीम साहब की गर्दन एक तरफ लुढ़क गई। खाली बोतल उनके हाथ से छूटकर संगमरमर के फर्श पर गिरी और बिखर गई। अंदर कमरे में ठहाकों और नोटों की गिनती की आवाज गूंज रही थी, और बाहर लॉन में, एक बाप की रूह इस ढोंगी दुनिया के मुंह पर अपनी आखिरी खामोश हंसी छोड़कर हमेशा के लिए आजाद हो चुकी थी।

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