कुत्ता शब्द समाज में बतौर गाली प्रयोग किया जाता रहा है। विगत कुछ महीनों से समाज कुत्तों को लेकर दो ध्रुवों में विभाजित दिखाई पड़ता है। कहीं न कहीं कुत्तों के हिंसक व घातक प्रवृत्ति पर बल दिया जाता रहा है। आम तौर पर सिक्के के दो पहलू, कहानी के दो पक्ष और धागे के दो छोर होते हैं। मात्र एक की बात करना और दूसरे को अपनी सुविधा के अनुसार नजरअंदाज कर देना ठीक तो नहीं है। इसी दूसरे पहलू, दूसरे पक्ष और दूसरे छोर की बात को देखें तो कुत्ते की मनुष्यों के प्रति प्रतिबद्धता, भावनात्मकता और प्रेम भावना से हमारा साक्षात्कार होगा। मनुष्यों और पशुओं, विशेषकर कुत्ते की आत्मीयता, प्रेम और समर्पण को समेटकर बेहद रोमांचक और संजीदगी के साथ पर्दे पर उकेरने का काम करती है फिल्म ‘ओह माय डॉग’ (Ohh My Dog)। फिल्म OMG 2 के लेखक व निर्देशक और 69 वें फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित अमित राय ने इस फिल्म का लेखन व निर्देशन कार्य किया है।
ऑस्कर, मोमो, प्रिंस और अप्पू की क्या है कहानी?
मनुष्यों का कुत्तों पर और कुत्तों का मनुष्यों पर विश्वास, प्रेम और समर्पण की भावना पर आधारित इस फिल्म की कहानी दो समानांतर पक्षों को लेकर आगे बढ़ती है। एक ओर असम का एक बच्चा ‘अप्पू’ है जो पशु तस्करों द्वारा अपहरण किए गए अपने कुत्ते ‘मोमो’ को बचाने के लिए स्वयं को समर्पित कर देता है। वहीं दूसरी ओर बिहार के एक नाबालिग मजदूर ‘प्रिंस’ का किडनी तस्करों द्वारा अपहरण किया जाता है जिसे बचाने के लिए उसका कुत्ता ‘ऑस्कर’ अपनी जान पर खेल जाता है। कहानी बड़े रोचक अंदाज़ में मानव का पशु से प्रेम और पशु का मानव से प्रेम होने के दोनों पक्षों को समाहित करते हुए दर्शकों के समक्ष समानांतर रूप में रख देती है। पूरी फिल्म कुत्ते मोमो और नाबालिग मजदूर प्रिंस को खोजने और उनकी जान बचाने के बीच आए संघर्षों के इर्द-गिर्द घूमती है।असम का बच्चा अप्पू अपने बौद्धिक कौशल और तकनीकी ज्ञान के प्रयोग से शहर के आरटीओ अधिकारी और अपनी टीचर के साथ मिलकर अपने कुत्ते मोमो की तलाश में जुट जाता है। इस संघर्ष में वह तस्करों की गिरोह से मिले पुलिस वालों को चकमा देने से लेकर आरटीओ अधिकारी को अपनी समझ से प्रभावित करने तक अपनी सूझबूझ का परिचय देता है। यहां एक मनुष्य का उसके कुत्ते के प्रति समर्पण को दिखाया गया है। दूसरे पक्ष में कुत्ता ऑस्कर अपने मालिक प्रिंस के तस्कर की तहकीकात स्वयं करता है। भ्रष्ट पुलिस कर्मियों द्वारा उसकी हत्या तक का प्रयास किया जाता है। किडनी तस्करों का गिरोह ऑस्कर पर एसिड से हमला भी करता है, परंतु इन सभी बाधाओं को पार करते हुए कुत्ता अपने मालिक की जान बचाने में स्वयं को झोंक देता है। एक कुत्ते की वफादारी का चित्रण इस पक्ष में बखूबी किया गया है।read more:https://pahaltoday.com/district-magistrate-holds-meeting-of-the-district-drinking-water-and-sanitation-mission-issues-directives/
कुत्तों से आगे की बात!
फिल्म में मुख्य रूप से मानवीय व पशुओं की संवेदना और एक दूसरे के पूरक होने की कहानी अवश्य है परंतु इसके परे भी फिल्म बहुत कुछ कहती है। भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में कुछ पुलिसकर्मियों और समाज में लोभी प्रवृत्ति के डॉक्टरों का फिल्म में चित्रण इस ओर भी सोचने पर विवश करता है। दोनों ही तरफ पुलिस न तो अप्पू की सहायता कर रही है न ही प्रिंस के पिता की इसके विपरीत वे पशु और किडनी तस्करों से मिल कर पैसे कमाना चाहते हैं।ओह माय डॉग में एक गहरा छिपा हुआ कटाक्ष भोजपुरी गीतों की अश्लीलता पर भी मिलता है। शुरुआत में मजदूरों को दिखाया जाता है जिसमें बैकग्राउंड में एक अश्लील भोजपुरी गीत बजता है परंतु मध्य में प्रसिद्ध लोक गायिका शारदा सिन्हा की पुत्री वंदना सिन्हा की आवाज में वास्तविक भोजपुरी गीत रखा गया है जो एक तुलना करते हुए असली भोजपुरी संस्कृति का परिचय देता है। असम की संस्कृति, पोशाक, नृत्य और भजन को भी दिखाया गया है। कहीं-कहीं बांग्ला संस्कृति का भी चित्रण किया गया है। हाशिए पर पड़े गरीब मजदूर वर्ग की चिंताओं का वर्णन प्रिंस जैसे बाल मजदूरों के द्वारा किया गया है। फिल्म में हनुमान जी व माता दुर्गा के प्रतीकात्मक संदर्भों के जरिए हिंदू धर्म व उसमें पशुओं की महत्ता की झलक भी देखने को मिलती है।
अभिनय का क्या है?
आम तौर पर अभिनय के संदर्भ में मनुष्यों की बात की जाती है परंतु इस फिल्म का सर्वश्रेष्ठ अभिनयकर्ता एक कुत्ता है। फिल्म में ऑस्कर की भूमिका को निभाने वाले कुत्ते का अभिनय किसी मंझे कलाकार से कम नहीं है। कुत्ते के चेहरे पर करुणा, क्रोध और निराशा जैसे भाव स्पष्ट दिखाई देते हैं जो इस फिल्म को जीवंत बनाते हैं। फिल्म में सभी कलाकारों का अभिनय परिपक्व है। पंकज त्रिपाठी बतौर शिक्षक की भूमिका में हैं, हालांकि उनका भाग कहानी में सीमित है परंतु जितनी देर वे पर्दे पर रहते हैं अपने मजाकिया अंदाज से दर्शकों को उत्साहित व बांधे रखते हैं। अभिनय की दृष्टि से भी फिल्म बेहतरीन है।फिल्म के लेखक व निर्देशक के अनुसार फिल्म में मोमो का किरदार निभाने वाला कुत्ता उनका अपना है। साथ ही अप्पू का किरदार अमित राय जी के पुत्र माही राय ने निभाया है।
कहां हो सकती है निराशा?
हालांकि फिल्म में कोई बड़ी निराशा आपको नहीं मिलेगी। कहानी, पात्र, अभिनय, ट्विस्ट सब बेहतरीन ही है परंतु कुछ छोटी-छोटी बातें जरूर हैं। एक तो अप्पू के किरदार को आयु से अधिक समझदार, होशियार और परिपक्व दिखाया गया है जो आमतौर पर असहज कर सकता है। उसका पुलिस और आरटीओ अधिकारी सभी से ज्यादा तार्किक होना कई बार विश्वास करने योग्य नहीं है। परंतु कहानी की भावुकता के तले वो नजरअंदाज किया जा सकता है। मध्यांतर के बाद तस्करों का पीछा करने का पूरा भाग कुछ लोगों को आवश्यकता से अधिक लम्बा लग सकता है। पूरी फिल्म के विषय और कहानी के भावनात्मक पक्ष के प्रभाव से ये कमियां दरकिनार की जा सकती हैं।
क्या कहता है निष्कर्ष?
फिल्म एक भावुक करने वाली नए आयामों को पेश करने वाली प्रस्तुति है। यह अपने समय की अन्य फिल्मों से विषय के धरातल पर पूर्णतया भिन्न है। जिस प्रकार से मनुष्यों और कुत्तों के बीच के संबंध को दिखाया गया है वह अपने आप में अनोखा है। फिल्म में धर्म और स्थानीय भारतीय संस्कृतियों का एक प्रशंसनीय मिश्रण किया गया है जो वास्तव में फिल्म के प्रवाह के साथ बना रहता है। कुल मिलाकर यह एक ऐसी फिल्म है जिसे निश्चिंत होकर परिवार के साथ देखा जा सकता है। बच्चों के सीखने के लिए भी फिल्म में बहुत कुछ है, जो आज कल की फिल्मों में अपवाद ही है। यह दर्शक के मानस में पशुओं के प्रति संवेदना और करुणा का सृजन करने में सक्षम है। निश्चित ही बिना किसी झिझक के दर्शक इस फिल्म की ओर रुख कर सकते हैं, निराश होने का मौका यह फिल्म नहीं देगी।