आवरण की नहीं, मानवीय मूल्यों को समझने की आवश्यकता : स्वांतरंजन

लखनऊ। राजधानी के विश्व संवाद केन्द्र में रविवार को ‘मातृभूमि स्तवन’ पुस्तक का लोकार्पण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(आरएसएस) के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वांतरंजन के हाथों संपन्न हुआ।इस अवसर पर अपने उद्बोधन में स्वांतरंजन ने कहा कि जब राष्ट्र और सनातन का विचार एक साथ प्रकट होता है,तब वह अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। कहा कि यह पुस्तक हमें दिशा दिखाती है कि हमें कैसे आगे बढ़ना है। उन्होंने कहा कि पुस्तकों को पढ़ना चाहिए,पढ़ने के बाद उसे लिखना चाहिए, लेकिन इससे भी अधिक आवश्यक है कि उसे लोगों को बताया जाए और लोगों तक पहुंचाया जाए। यह पुस्तक यह भी सिखाती है कि व्यक्ति को किसी आवरण की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि उसे मानवीय मूल्यों को समझने की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि हमें मोबाइल मोड से एक्शन मोड में आने की आवश्यकता है।उन्होंने पुस्तक के लेखक को समर्पित स्वयंसेवक बताते हुए कहा कि शाखा में सदैव यह आग्रह रहा है कि जो भी अनुभव मिले, उसे डायरी में नियमित रूप से लिखा जाए, क्योंकि संघ का उद्देश्य अच्छे व्यक्तियों का निर्माण और गुणात्मक सुधार करना है।उन्होंने कहा कि स्वयंसेवकों द्वारा स्थापित कई संगठन आज विश्व के बड़े संगठनों में गिने जाते हैं, किन्तु स्वयंसेवक के जीवन में संघव्यावहारिक प्रकटीकरण होना आवश्यक है, वही हमारी असली पहचान है। संघ के संस्थापक डॉ.केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ के प्रचारकों के लिए बहुत सुन्दर व्यवस्था बनाई है। संघ के प्रचारक किसी साधु-संत या अन्य वेश-भूषा में कार्य नहीं करते। आप जैसे सामान्य वेश में ही समाज के बीच राष्ट्र का कार्य करने में जुटे हुए हैं। संघ का कार्य किसी आवरण के बिना होता है-प्रचारक या स्वयंसेवक को समाज से केवल एककदमआगेरहनाहै,अलगदिखनेकीआवश्यकता नहीं।उन्होंने पुस्तक को ऐतिहासिक महत्व का बताते हुए कहा कि इसमें संघ के पुराने गीत और सुभाषित संकलित हैं, जो मन में संस्कार भरते हैं और दिशा दिखाते हैं।read more:https://khabarentertainment.in/prof-dr-rajendra-rajput-receives-guru-shree-2026-award-at-national-level-brings-honour-to-ghazipur/ उन्होंने स्वयंसेवकों से आह्वान किया कि वे जहां भी जाएं, अच्छी बातों को डायरी में नोट करें, पढ़ें और आगे साझा करें।
स्वांतरंजन ने कहा कि आरएसएस का शताब्दी वर्ष चल रहा है और ऐसे में संघ के विषयों को समाज तक पहुंचाना आवश्यक है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि विश्व के कई देश भारत के विरुद्ध नैरेटिव फैला रहे हैं, ऐसे में वर्तमान पीढ़ी का दायित्व है कि वह भारत को गहराई से जाने और विश्व मंच पर अपना पक्ष सशक्त ढंग से रखे। उन्होंने समाज में सही विमर्श पहुंचाने और भारत के दृष्टिकोण को व्यापक रूप से फैलाने की आवश्यकता पर बल दिया।
केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय लखनऊ परिसर के निदेशक डॉ. सर्व नारायण झा ने कहा कि इस ग्रंथ की रचना मां सरस्वती की आराधना के समान है। उन्होंने कहा कि पुस्तक में मातृभूमि की वन्दना की गई है और माता व मातृभूमि के प्रति राग में कभी कोई अंतर नहीं आता, भले ही राग और अनुराग शब्दतः भिन्न हों। उन्होंने इसे स्वयंसेवकों के लिए पाथेय (मार्गदर्शक संबल) बताया।इस अवसर पर ए.के. श्रीवास्तव ने भी पुस्तक के लेखक को स्मरण करते हुए कहा कि परमात्मा में उनकी अटूट आस्था थी और वह शुद्ध सात्विक जीवन जीते थे, उनके जीवन से बहुत कुछ सीखने को मिला है, उन्हें नमन।
पुस्तक पर प्रकाश डालते हुए डा.चन्द्रभूषण त्रिपाठी ने कहा कि यह ग्रंथ “बाबूजी” की कृति है, जिनकी बौद्धिक क्षमता अद्भुत थी और जो निरन्तर लेखन में लीन रहते थे। उन्होंने बताया कि उनकी पांडुलिपि में 1960 में पहली बार शाखा जाने का उल्लेख भी मिलता है। ज्योतिष के प्रकांड विद्वान रहे लेखक की इस पुस्तक में मंत्र, सुभाषितानि, केशव अर्चना, ध्वजगीत तथा खेलों की सूची जैसी सामग्री संकलित है। उन्होंने इसे परिवार के लिए दुर्लभ और गौरवमयी अवसर बताते हुए कहा कि प्रत्येक स्वयंसेवक को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक ग्रंथ है। कार्यक्रम के अंत में डॉ.बृजभूषण तिवारी ने सभी अतिथियों एवं उपस्थित जनों का आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर मुख्य रूप से संघ के वरिष्ठ प्रचारक मनोजकांत, हिन्दुस्थान समाचार के क्षेत्रीय सम्पादक डॉ.राजेश तिवारी, संस्कृत भारती के क्षेत्र संगठन मंत्री प्रमोद पण्डित, क्षेत्र सम्पर्क प्रमुख जे.पी. सिंह, प्रान्त सह मंत्री रत्नेश्वरमणि त्रिपाठी, के.के. तिवारी समेत अन्य लोग उपस्थित रहे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *