मनु भाकर के कोच जसपाल राणा नहीं रहे

नई दिल्ली। भारतीय खेल जगत के लिए शुक्रवार का दिन एक बेहद दुखद और स्तब्ध करने वाली खबर लेकर आया।देश के महान निशानेबाज और विख्यात कोच जसपाल राणा का 49 वर्ष की आयु में आकस्मिक निधन हो गया है। पिछले सप्ताह अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उनका इलाज चल रहा था, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। राष्ट्रीय राइफल संघ ने उनके असामयिक निधन की आधिकारिक पुष्टि की है। उनके जाने से भारतीय खेल जगत, विशेषकर शूटिंग बिरादरी में गहरे शोक की लहर दौड़ गई है और इसे खेल इतिहास के लिए एक अपूरणीय क्षति माना जा रहा है।राणा के कोचिंग करियर का स्वर्णिम अध्याय देश की स्टार निशानेबाज मनु भाकर के साथ जुड़ा रहा। उन्होंने मनु के करियर के सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील दौर में उनके खेल को एक नया आयाम दिया। उनके कुशल मार्गदर्शन और गहन प्रशिक्षण का ही परिणाम था कि मनु भाकर ने वर्ष 2024 के पेरिस ओलंपिक में इतिहास रचते हुए महिलाओं की 10 मीटर एयर पिस्टल और मिक्स्ड टीम 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धाओं में दो ऐतिहासिक कांस्य पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया। जानकारी के अनुसार, जसपाल राणा वर्तमान में भारतीय पिस्टल निशानेबाजों के हाई-परफॉर्मेंस कोच के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। पिछले हफ्ते म्यूनिख, जर्मनी में आयोजित हुए आईएसएसएफ वर्ल्ड कप में भाग लेकर जब भारतीय दल स्वदेश लौट रहा था, तब उड़ान के दौरान विमान में अचानक उनकी तबीयत खराब हो गई थी। दिल्ली के हवाई अड्डे पर उतरने के तुरंत बाद उन्हें साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी आवश्यक चिकित्सा प्रक्रियाएं पूरी की गईं और चिकित्सकों की देखरेख में उनका सघन उपचार चल रहा था। दुर्भाग्यवश, उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। जसपाल राणा का जाना भारतीय निशानेबाजी के लिए एक युग का अंत माना जा रहा है। उन्होंने तीन दशकों से भी अधिक समय तक एक उत्कृष्ट खिलाड़ी और मार्गदर्शक के रूप में इस खेल की सेवा की।read more:https://pahaltoday.com/the-consumer-commission-settled-the-matter-by-giving-a-cheque-of-rs-55040/ 1990 के दशक में अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय निशानेबाजी का परचम लहराने वाले राणा देश के सबसे सफल पिस्टल शूटरों में से एक थे। उन्होंने एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई चैंपियनशिप में अनेक स्वर्ण और रजत पदक जीतकर वैश्विक स्तर पर भारत का दबदबा कायम किया था। उनकी इन बेमिसाल जीतों ने भारत में निशानेबाजी को एक बेहद लोकप्रिय खेल बनाने में क्रांतिकारी भूमिका निभाई और देश के लाखों युवाओं को इस खेल से जुड़ने की प्रेरणा दी। अपने सक्रिय और शानदार खेल करियर से संन्यास लेने के बाद, जसपाल राणा ने देश में नई प्रतिभाओं को गढ़ने का संकल्प लिया और कोचिंग की दुनिया में कदम रखा। अपनी बेजोड़ तकनीकी समझ और अनुशासित कार्यशैली के कारण वे जल्द ही भारतीय शूटिंग के सबसे प्रभावशाली मार्गदर्शकों में शामिल हो गए। वर्ष 2012 में उन्होंने देश के जूनियर पिस्टल प्रोग्राम की कमान संभाली और अगले दस वर्षों तक उन्होंने भारत के युवा शूटरों को इस कदर तराशा कि वैश्विक प्रतियोगिताओं में भारत को लगातार नए चैंपियन मिलने लगे। राणा की सूक्ष्म प्रशिक्षण योजना, अद्भुत तकनीकी पकड़ और मानसिक रूप से खिलाड़ियों को सुदृढ़ बनाने की क्षमता अद्वितीय थी। वे अपनी ट्रेनिंग के दौरान प्रतियोगिता जैसी कठिन परिस्थितियां और मानसिक दबाव पैदा करते थे, जिससे खिलाड़ी बड़े वैश्विक टूर्नामेंट्स की चुनौतियों के लिए पूरी तरह तैयार हो सकें। उनके इसी कड़े मार्गदर्शन में सौरभ चौधरी, अनीश भानवाला और चिंकी यादव जैसे विश्वस्तरीय शूटर तैयार हुए, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का गौरव बढ़ाया। खेल और कोचिंग के क्षेत्र में उनके असाधारण और ऐतिहासिक योगदान को सम्मानित करते हुए भारत सरकार द्वारा वर्ष 2020 में उन्हें देश के सर्वोच्च खेल सम्मानों में से एक, द्रोणाचार्य पुरस्कार से नवाजा गया था। उनकी प्रतिभा और निरंतर समर्पण को देखते हुए राष्ट्रीय राइफल संघ ने फरवरी 2025 में उन्हें पुनः 25 मीटर पिस्टल विधा के हाई-परफॉर्मेंस कोच पद की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी थी। वे जीवन के अंतिम क्षणों तक देश के शीर्ष शूटरों को तराशने के मिशन में जुटे रहे। जसपाल राणा का असमय जाना भारतीय खेलों के एक ऐसे सुनहरे अध्याय का अंत है, जिसकी कमी हमेशा खलेगी।

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