चुप चाप खड़े खूनी  

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
पुराने बरगद की जटाएं अब हवा में नहीं, दहशत में झूलती हैं। “सुना है?” पीपल ने पत्तों की खड़खड़ाहट में फुसफुसाहट घोली। “क्या?” शीशम की टहनियां कांपीं। “इंसान आ रहा है, हाथ में ‘उन्नति’ लेकर।” बरगद ने गहरी सांस ली, जैसे कोई ओड़िया वृद्ध ‘हे भगवान’ कह रहा हो। “उन्नति? पिछले बार तो इसे ‘सड़क’ कहते थे,” साल के पेड़ ने व्यंग्य से कहा। “इस बार नाम बदल गया है, अब इसे ‘स्मार्ट सिटी’ कहते हैं। इसमें ऑक्सीजन की जगह वाई-फाई बहता है।” पास खड़ा नन्हा नीम सिसका, “दादी, क्या वाई-फाई से चिड़ियां घोंसला बनाएंगी?” बरगद ने कड़वाहट से उत्तर दिया, “नहीं बेटा, वहां सिर्फ गिद्ध बैठेंगे, जो कागजों पर दस्तखत करते हैं।” पूरे जंगल में एक ऐसी टीस थी, जैसे किसी ने जीवित खाल उधेड़ दी हो। संवाद छोटे थे, पर हर शब्द कुल्हाड़ी की धार से भी ज्यादा पैना था।धूल से सने पत्तों पर अब ओस नहीं, बारूद की परत जमने लगी थी। “अरे, तुम तो बड़े खुश दिख रहे हो?” पलाश ने अपनी सूखी टहनियों को सिकोड़ते हुए कचनार से पूछा। कचनार ने फीकी हंसी हंसी, “हां, मुझे कल ‘सुंदरता’ का सर्टिफिकेट मिला है।” पलाश चौंक गया, “मतलब?” “मतलब यह कि मुझे काटा नहीं जाएगा, बस गमले में फिट कर दिया जाएगा। मेरी जड़ें अब पाताल नहीं छुएंगी, बस दो मग पानी की मोहताज रहेंगी।” “इसे तो ‘प्रमोशन’ कहते हैं भाई!” सागौन ने ठहाका लगाया, जो असल में एक रुदन था। “जैसे ओड़िशा के गांवों में लोग भात की आस में आकाश ताकते हैं, हम अब टैंकर की आस में जिएंगे।” जंगल की आत्मा अब एक ऐसी मंडी बन चुकी थी जहां हर पेड़ अपनी कीमत और अपनी मौत का दिन गिन रहा था। इंसानी आहट करीब आ रही थी, और हवा में ‘विकास’ की गंध तीखी होने लगी थी।read more:https://khabarentertainment.in/saharanpur-lucknow-passenger-train-expected-to-resume-operations/“वह देखो, चश्मा पहनकर ‘संवेदना’ आ रही है,” महुआ ने दूर सड़क पर रुकती सफेद जीप को देखकर कहा। जीप से कुछ लोग उतरे, जिनके हाथ में फीते और फाइलें थीं। “ये लोग हमारी छाती क्यों नाप रहे हैं?” नन्हे नीम ने पूछा। “बेटा, वे देख रहे हैं कि तुम्हारी अस्थियों से कितनी कुर्सियां बनेंगी,” बरगद ने अपनी ‘कोठर’ से आवाज निकाली। “पर दादा, मैंने तो सुना था कि इंसान पेड़ों की पूजा करता है?” “हां, करता है! जब हम मर जाते हैं, तो वह हमारी लकड़ी पर घी डालकर अपनी स्वर्ग की राह रोशन करता है।” व्यंग्य इतना गहरा था कि हवा भी शर्म से रुक गई। “मते रक्षा करतु (मुझे बचाओ),” नीम चिल्लाया। “चुप कर,” साल ने उसे डांटा, “यहां प्रार्थनाएं नहीं, सिर्फ टेंडर सुने जाते हैं। तुम्हारी भाषा इन्हें समझ नहीं आएगी, इन्हें सिर्फ नोटों की ‘कड़कड़’ समझ आती है।शाम ढलते-ढलते जंगल में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया। “आज कोई पक्षी नहीं आया?” कचनार ने पूछा। “पक्षी समझदार हैं, उन्हें पता चल गया है कि यहां अब ‘नेटवर्क’ ज्यादा है और नीड़ कम,” बरगद ने अपनी अंतिम छाल सहेजते हुए कहा। “सुना है, शहर में एक बड़ा उत्सव होने वाला है,” शीशम ने सूचना दी। “कैसा उत्सव?” “पर्यावरण दिवस! वहां वे प्लास्टिक के पौधों को पानी देंगे और हमारी तस्वीरों के सामने मोमबत्तियां जलाएंगे।” अचानक दूर से एक भारी मशीन की गड़गड़ाहट सुनाई दी। जंगल की जड़ों में एक कंपन हुआ, जैसे धरती को मिर्गी का दौरा पड़ा हो। “तैयार हो जाओ,” बरगद ने अपनी आंखें मूंद लीं, “अब वे हमें ‘मुक्ति’ देने आ रहे हैं। इस विकास के महायज्ञ में हमारी बलि ही तो मुख्य आहुति है।”मशीनें करीब आईं, पर वे रुकी नहीं। वे जंगल को चीरती हुई आगे निकल गईं। पेड़ों ने राहत की सांस लेनी चाही, पर तभी देखा कि उन मशीनों के पीछे कुछ लोग फटेहाल कपड़ों में, हाथ में अपनी जमीन के कागजात लिए भाग रहे थे। वे लोग पेड़ों से लिपटकर रोने लगे। “क्या हुआ? तुम क्यों रो रहे हो?” नीम ने एक बूढ़े आदिवासी से पूछा। बूढ़ा कुछ नहीं बोला, बस अपनी फटी जेब से एक चेक निकाला। पेड़ों को लगा कि शायद ये लोग उन्हें बचाने आए हैं। तभी बरगद की नजर उस चेक पर पड़ी। उस पर किसी बड़े बैंक की मुहर थी और राशि लिखी थी—’शून्य’। सस्पेंस तब खुला जब बैंक की गाड़ी पीछे से आई। बैंक वालों ने पेड़ों को नहीं काटा, बल्कि उन बिलखते इंसानों को पैसे थमाए और कहा, “ये लो अपनी जमीन और इन पेड़ों का मुआवजा। अब यहां ‘शोक’ नहीं, ‘गोल्फ कोर्स’ बनेगा।” पेड़ हतप्रभ खड़े थे। उन्हें काटा नहीं गया था, उन्हें ‘खरीदा’ गया था। अब वे पेड़ नहीं, ‘प्रॉपर्टी’ थे। बैंक वाले पैसे दे चुके थे और अब वे पेड़ कुल्हाड़ी का नहीं, ‘किस्त’ न भर पाने के डर से कांप रहे थे।

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