बहराइच l जब कोई मां बीमार होती है, तो उसके मन में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि क्या वह अपने शिशु को स्तनपान करा सकती है। कई बार यह डर भी सताता है कि कहीं उसकी बीमारी बच्चे तक न पहुंच जाए। यही आशंका देवीपाटन मंडल की उन माताओं के मन में भी थी, जिन्होंने विश्व स्तनपान सप्ताह के दौरान अपने अनुभव साझा किए। परिवार के कुछ सदस्य भी इसी डर से उन्हें स्तनपान कराने से मना करते थे। लेकिन डॉक्टरों की सही सलाह, आशा और एएनएम के मार्गदर्शन तथा परिवार के सहयोग से उनका यह भ्रम दूर हुआ।स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली (एचएमआईएस) आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025-26 में देवीपाटन मंडल के 3.18 लाख से अधिक नवजातों को जन्म के पहले घंटे में मां का दूध पिलाया गया। हालांकि स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि अस्पताल से घर लौटने के बाद बीमारी को लेकर फैली भ्रांतियों और परिवार के संकोच के कारण कई माताएं स्तनपान को लेकर असमंजस में पड़ जाती हैं।अपनी स्वास्थ्य समस्याओं के बावजूद इन माताओं ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपने शिशुओं को पहले छह महीने तक केवल मां का दूध पिलाया और कई माताओं ने दो साल तक भी स्तनपान जारी रखा। आज वे कहती हैं कि उनके बच्चे स्वस्थ हैं, अच्छी तरह बढ़ रहे हैं और दूसरे बच्चों की तुलना में कम बीमार पड़ते हैं।read more:https://pahaltoday.com/villagers-upset-over-garbage-dumping-staged-a-protest-at-the-district-collectorate/
केस -1 फाइलेरिया का डर, लेकिन नहीं रुका स्तनपान-
जरवल ब्लॉक के रिठौढ़ा गांव की रिंकी गर्भावस्था के दौरान फाइलेरिया से पीड़ित हो गई थीं। रिंकी बताती हैं कि प्रसव के बाद परिवार को डर था कि कहीं स्तनपान से बच्चे को भी बीमारी न हो जाए। आशा कार्यकर्ता ने समझाया कि फाइलेरिया मच्छरों के काटने से फैलता है, मां के दूध से नहीं। उन्होंने स्वास्थ्य विभाग की जागरूकता सामग्री भी दिखाई। इसके बाद परिवार की शंका दूर हुई और रिंकी ने अपने बेटे को दो साल तक स्तनपान कराया। आज वह छह साल का है, स्वस्थ है और स्कूल जाता है।
केस -2 कम वजन की बच्ची के लिए मां का दूध बना संबल-
बलरामपुर के श्रीदत्तगंज निवासी मनोज कुमार की पत्नी मीना देवी ने 4 जून 2026 को जिला अस्पताल में 1635 ग्राम वजन की बच्ची को जन्म दिया। कम वजन होने के कारण नवजात को एसएनसीयू में भर्ती करना पड़ा। बच्ची स्तन से दूध नहीं खींच पा रही थी, इसलिए स्वास्थ्यकर्मियों ने मां का दूध निकालकर कटोरी-चम्मच से पिलाना शुरू किया। धीरे-धीरे बच्ची की स्थिति में सुधार हुआ। मीना देवी कहती हैं, “डॉक्टरों ने बताया कि मेरे दूध से ही मेरी बच्ची को सबसे ज्यादा ताकत मिलेगी। आज बच्ची स्वस्थ है और सामान्य रूप से बढ़ रही है।“
केस -3 टीबी इलाज के साथ जारी रहा स्तनपान –
श्रावस्ती जिले के भिनगा क्षेत्र के अंबेडकरनगर की 26 वर्षीय एक महिला (पहचान गोपनीय रखने के अनुरोध पर नाम प्रकाशित नहीं किया जा रहा है) को प्रसव के बाद टीबी का पता चला। परिवार को डर था कि कहीं शिशु को भी संक्रमण न हो जाए। डॉक्टरों ने समझाया कि नियमित उपचार, शुरुआती दिनों में मास्क के उपयोग और पौष्टिक आहार के साथ स्तनपान सुरक्षित रूप से जारी रखा जा सकता है। उन्होंने चिकित्सकीय सलाह का पालन किया और अपने शिशु को स्तनपान कराना नहीं छोड़ा। महिला कहती हैं, “डॉक्टरों की सलाह ने मेरा और मेरे परिवार का डर दूर कर दिया। आज मेरा डेढ़ साल का बेटा स्वस्थ है और मैं भी पूरी तरह टीबी से ठीक हो चुकी हूं।””कई माताएं यह भी सोचती हैं कि बीमारी या दवा लेने से उनका दूध खराब हो जाएगा या बच्चे को नुकसान पहुंचाएगा। जबकि अधिकांश सामान्य बीमारियों और उनकी दवाओं के दौरान भी स्तनपान सुरक्षित रहता है। इसलिए बिना डॉक्टर की सलाह के न तो दवा बंद करें और न ही स्तनपान।”
डॉ. संजय कुमार- मुख्य चिकित्सा अधिकारी, बहराइच