डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

छोटी लाइन के उस पुराने रेलवे स्टेशन के कोने पर बने पूछताछ केंद्र की मेज पर एक मोटा पीला रजिस्टर सालों से वैसे ही जमा हुआ था जैसे किसी दफ्तर की फाइल पर भ्रष्टाचार की परत जमी होती है। उस रजिस्टर के पन्ने वक्त की धूल और सरकारी सुस्ती से इतने कड़े हो चुके थे कि उन्हें पलटना किसी बूढ़े की याददाश्त खंगालने जैसा दुष्कर कार्य था और उसकी जिल्द का धागा अपनी मर्यादा खोकर बाहर लटक रहा था। उस स्टेशन पर दिन भर में केवल दो ही गाड़ियाँ रुकती थीं जो अक्सर समय की पाबंदी को अपनी तौहीन समझती थीं लेकिन वहाँ के एकमात्र क्लर्क हरगोविंद बाबू हर सुबह आठ बजे दफ्तर खोलते ही सबसे पहले उस पीले रजिस्टर को ऐसे सहलाते थे जैसे कोई नेता चुनाव से पहले गरीब के पैर छूता हो। गाँव के लोग जब भी अपने रिश्तेदारों को ठिकाने लगाने या मालगाड़ी के आने का काल्पनिक समय पूछने आते तो हरगोविंद बाबू को उसी रजिस्टर के पन्ने पलटते हुए पाते थे जैसे वे उसमें मोक्ष का मार्ग खोज रहे हों। सफेद बेदाग कुर्ते में लिपटे हरगोविंद बाबू की आँखें हमेशा उस रजिस्टर की आखिरी लाइन पर टिकी रहती थीं जहाँ नीली स्याही से कुछ लिखा था क्योंकि भारत में सच अक्सर आखिरी लाइनों में ही दम तोड़ता है। वे रोज दोपहर की कड़कती धूप से लेकर ढलती शाम तक उसी रजिस्टर को सामने रखकर वैसे ही बैठे रहते थे जैसे कोई ईमानदार आदमी अपनी बेबसी लेकर कचहरी में बैठता है। जब भी कोई नया टीटीई या स्टेशन मास्टर वहाँ तैनात होकर आता तो वह इस पीले रजिस्टर को देखकर ऐसे चौंकता था जैसे किसी आधुनिक मॉल में कोई आदमी लँगोटी पहनकर घुस आया हो। गाँव का चपरासी मन्नू जब चाय का कुल्हड़ लेकर आता जो चाय कम और गर्म पानी का विज्ञापन ज्यादा लगती थी तो हरगोविंद बाबू उससे बड़ी बेताबी से पूछते कि क्यों रे मन्नू आज उस बड़े शहर से आने वाली पैसेंजर गाड़ी में कोई नया नाम दर्ज हुआ या आज भी वही पुराना पन्ना खाली रह गया। मन्नू बस एक लंबी साँस खींचकर अपनी नजरें झुका लेता था क्योंकि सच बोलना सरकारी कर्मचारी के धर्म के खिलाफ होता है।स्टेशन पर आने वाले तमाम ग्रामीणों के लिए वह पीला रजिस्टर किसी रहस्यमयी किताब की तरह बन चुका था जिसका सच जानना उतना ही कठिन था जितना कि किसी सरकारी योजना का लाभ लेना। गाँव में हाल ही में आए नए स्टेशन मास्टर श्यामाचरण जी बहुत ही व्यावहारिक और कड़क मिजाज के इंसान थे जिन्हें दफ्तर की मेज पर किसी फालतू सामान का रखा होना ज़रा भी बर्दाश्त नहीं होता था क्योंकि वे अनुशासन को अपनी निजी संपत्ति समझते थे। श्यामाचरण जी जब भी अपने केबिन से बाहर आते तो उनकी नजर उस फटे-पुराने पीले रजिस्टर पर पड़ती और उनका पारा ऐसे चढ़ जाता था जैसे मई की दुपहरी में किसी घाघ नेता का अहंकार चढ़ता है। एक दिन जब धूप अपने शबाब पर थी और स्टेशन का प्लेटफॉर्म वैसे ही सुनसान था जैसे किसी ईमानदार आदमी का घर होता है तो श्यामाचरण जी कड़े कदमों से पूछताछ केंद्र की खिड़की के पास पहुँचे। उन्होंने चश्मे के ऊपर से घूरते हुए बहुत ही कड़े लहजे में पूछा कि हरगोविंद बाबू आप रोज इस सड़े-गले पीले रजिस्टर को मेज पर सजाकर क्यों बैठते हैं जबकि यह तो किसी बीते हुए जमाने का खारिज हो चुका रद्दी का पुलिंदा है जो सिर्फ दीमकों का पेट भर सकता है। हरगोविंद बाबू ने बहुत ही आत्मीयता से उस पीले रजिस्टर के पन्नों को अपने कांपते हाथों से पोंछा जैसे कोई कवि अपनी रद्दी कविताओं को महान रचना समझकर सहेजता है और बोले कि स्टेशन मास्टर साहब यह कोई खारिज हुआ रद्दी कागज नहीं है बल्कि इस रजिस्टर में इस पूरे कसबे की वह उम्मीद दर्ज है जो अक्सर सरकारी फाइलों में गुम हो जाती है। श्यामाचरण जी ने चिढ़कर कहा कि पहेलियाँ मत बुझाइए हरगोविंद बाबू क्योंकि यह सरकारी दफ्तर है जो नियमों की सूखी लकड़ी से चलता है न कि किसी बूढ़े के गीले जज़्बातों के सहारे।श्यामाचरण जी का गुस्सा देखकर पास की बेंच पर बैठा पुराना कुली रहमान भी उठकर आ गया और उसने हाथ जोड़कर कहा कि साहब हरगोविंद बाबू पर गुस्सा मत कीजिए क्योंकि इस पीले रजिस्टर का नाता इस रेलवे स्टेशन के इतिहास और हम सबके सामूहिक ढोंग से जुड़ा हुआ है। श्यामाचरण जी ने अविश्वास से रहमान की तरफ देखा और पूछा कि आखिर इस साधारण से हाजिरी रजिस्टर में ऐसा क्या तिलस्म छुपा है जिसके सामने तुम सब वैसे ही सिर झुकाते हो जैसे कोई अर्जीनवीस साहब के सामने झुकता है। रहमान ने अपनी लाठी को जमीन पर टिकाया जो उसके जीवन का एकमात्र सहारा और सरकार का प्रतीक थी और बोलना शुरू किया कि साहब बीस साल पहले जब रेलवे महकमे ने घाटे का हवाला देकर इस छोटे स्टेशन को हमेशा के लिए बंद करने का फरमान जारी किया था क्योंकि सरकार को गरीब के सफर से ज्यादा फायदे का गणित प्रिय है तब गाँव के लोगों ने हंगामा किया था और सरकार ने शर्त रखी थी कि अगर इस स्टेशन से साल भर में दस हजार मुसाफिर यात्रा करेंगे तो ही यह बहाल रहेगा। हरगोविंद बाबू ने रहमान की बात को आगे बढ़ाते हुए बड़े गर्व के साथ कहा कि हाँ साहब तब से मैं रोज इस रजिस्टर में यहाँ से चढ़ने और उतरने वाले हर यात्री का नाम अपने हाथों से दर्ज करता हूँ ताकि जब कभी बड़ा अफसर चेकिंग करने आए तो मैं उसे वह झूठ दिखा सकूँ जिसे वह सच मानकर खुश हो जाए। श्यामाचरण जी ने हैरान होकर पूछा कि तो क्या बीस सालों में भी दस हजार यात्रियों की गिनती पूरी नहीं हो सकी जो आप आज भी इस रजिस्टर को वैसे ही घिस रहे हैं जैसे कोई कर्मचारी अपनी कुर्सी घिसता है।हरगोविंद बाबू की आँखों में एक ऐसी चमक तैर गई जो अक्सर केवल पाखंडियों या संतों की आँखों में मिलती है और उन्होंने उस पीले रजिस्टर का आखिरी पन्ना खोला जिस पर नीली स्याही से नौ हजार नौ सौ निन्यानवे का आँकड़ा लिखा हुआ था। हरगोविंद बाबू ने अपने थरथराते हुए हाथ को उस आँकड़े पर रखा और बड़े ही मार्मिक स्वर में बोले कि साहब बस एक आखरी नाम की कसर बाकी है और जैसे ही दस हजारवाँ मुसाफिर इस स्टेशन पर कदम रखेगा वैसे ही हमारा यह स्टेशन हमेशा के लिए सरकारी कागजों में वैसे ही अमर हो जाएगा जैसे कोई घोटाला अमर हो जाता है।read more:https://pahaltoday.com/ballia-police-receive-two-modern-interceptor-bikes-sp-omvir-singh-flags-them-off/श्यामाचरण जी को यह बात बेहद बचकानी और अनहोनी लगी क्योंकि वे जानते थे कि उस सुनसान रूट पर अब गाड़ियाँ केवल औपचारिकता निभाने आती थीं और नया यात्री उतरना उतना ही दुर्लभ था जितना कि किसी विभाग में बिना रिश्वत के काम होना। श्यामाचरण जी ने तंज कसते हुए कहा कि हरगोविंद बाबू बीस साल में अगर एक नाम कम रह गया है तो इसका सीधा मतलब है कि अब कोई दस हजारवाँ मुसाफिर यहाँ आने से रहा और आप व्यर्थ ही इस उम्र में इस सूखे प्लेटफॉर्म पर अपनी सेहत वैसे ही बर्बाद कर रहे हैं जैसे कोई देशभक्त अखबारों की सुर्खियाँ पढ़कर अपना रक्तचाप बढ़ाता है। हरगोविंद बाबू ने सिर हिलाकर मुस्कुराते हुए कहा कि नहीं साहब मुझे पूरा यकीन है कि वह दस हजारवाँ मुसाफिर जरूर आएगा और अपनी यात्रा से इस छोटे से गाँव के लोगों का नसीब बदल देगा क्योंकि हिंदुस्तान में लोग आज भी चमत्कार और सरकार पर भरोसा करते हैं।

अगले कुछ दिनों तक यही सिलसिला जारी रहा और हरगोविंद बाबू नियम से हर सुबह उस पीले रजिस्टर को अपनी मेज पर खोलकर बैठते और दिन भर आने-जाने वाली इकलौती गाड़ी के डिब्बों को उम्मीद भरी निगाहों से वैसे ही ताकते रहते जैसे कोई बेरोजगार विज्ञापन को ताकता है। कसबे में यह चर्चा फैल गई कि हरगोविंद बाबू की सेवानिवृत्ति की तारीख अब सिर पर आ चुकी थी और इस महीने के आखिरी दिन वे दफ्तर से रिटायर होने वाले थे जैसे कोई पुराना कानून अपनी उपयोगिता खोकर रिटायर होता है। महीने का आखिरी दिन आ पहुँचा और शाम ढलने लगी थी जबकि सूरज की लालिमा के बीच दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई दी जो किसी हारते हुए आदमी की आखिरी पुकार जैसी थी। हरगोविंद बाबू के कांपते हाथों ने उस पीले रजिस्टर की कलम को वैसे ही भींच लिया जैसे कोई मरता हुआ आदमी वसीयत पकड़ता है और उनकी नजरें स्टेशन के मुसाफिरखाने के दरवाजे पर टिक गईं। ट्रेन रुकी और कुछ ही पलों बाद छुक-छुक करती हुई आगे निकल गई लेकिन प्लेटफॉर्म पर कोई भी नया मुसाफिर उतरता हुआ नहीं दिखाई दिया क्योंकि वास्तविकता अक्सर हमारी कल्पनाओं का मजाक उड़ाती है। हरगोविंद बाबू के चेहरे की रंगत अचानक उड़ गई और उनका पूरा शरीर पसीने से तर-बतर हो गया जैसे उन्होंने अभी-अभी कोई बहुत बड़ा सच देख लिया हो। श्यामाचरण जी अपने केबिन से बाहर निकले और उन्होंने दयाभरे स्वर में कहा कि हरगोविंद बाबू आपकी नौकरी का आखिरी घंटा समाप्त हो चुका है और अब इस रजिस्टर को बंद कर दीजिए क्योंकि आज भी आपका वह दस हजारवाँ यात्री वैसे ही नहीं आया जैसे अच्छे दिन नहीं आते।हरगोविंद बाबू सुन्न होकर उस पीले रजिस्टर की तरफ देखने लगे जहाँ नौ हजार नौ सौ निन्यानवे का आँकड़ा उनका मुँह वैसे ही चिढ़ा रहा था जैसे चुनाव के बाद जनता के सामने चुनावी घोषणापत्र चिढ़ाते हैं। उन्होंने बहुत ही बेबसी के साथ अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ पुराना लिफाफा निकाला और उसे श्यामाचरण जी की तरफ बढ़ाते हुए बिलख-बिलख कर रोने लगे क्योंकि आँसू ही भारत में अंतिम दलील होते हैं। श्यामाचरण जी ने हैरान होकर जब उस लिफाफे को खोला तो उनके पैरों तले जमीन वैसे ही खिसक गई जैसे किसी घोटाले की फाइल खुलने पर बड़े अफसर की खिसकती है क्योंकि वह रेलवे महकमे का एक बीस साल पुराना गुप्त बर्खास्तगी पत्र था जिसमें साफ लिखा था कि बीस साल पहले ही इस स्टेशन को बंद करके इसके क्लर्क हरगोविंद बाबू को बर्खास्त कर दिया गया था। हरगोविंद बाबू ने रोते हुए अपनी कांपती आवाज में कहा कि साहब बीस साल पहले जब यह स्टेशन बंद हुआ तो गाँव वालों की उम्मीदें टूट गई थीं और मेरे पास उन्हें देने के लिए कोई ढाढस नहीं था इसलिए मैंने बीस सालों से बिना किसी तनख्वाह के हर रोज अपने पास से पैसे खर्च करके फर्जी टिकट काटे और नौ हजार नौ सौ निन्यानवे यात्रियों के फर्जी नाम दर्ज किए ताकि इस व्यवस्था का भ्रम बना रहे। श्यामाचरण जी का कलेजा यह कड़वा सच सुनकर कांप उठा कि हरगोविंद बाबू ने उस पीले रजिस्टर के आखिरी पन्ने पर अपने कांपते हाथों से दस हजारवाँ नाम अपने ही मृत बेटे का लिख दिया था जिसकी याद में वे बीस सालों से एक झूठी उम्मीद का पहरा दे रहे थे। श्यामाचरण जी की आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली और पूरा स्टेशन एक मूक चीख के साथ उस बूढ़े बाप के समर्पण के सामने नतमस्तक हो गया क्योंकि इस देश में अंततः हर व्यवस्था एक बड़े व्यक्तिगत बलिदान की लाश पर टिकी होती है।

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