अशोक भाटिया
दरअसल अक्सर जो अपराध सतही तौर पर स्थानीय रंजिश या लूटपाट की आम घटना दिखाई देते हैं, उनकी जड़ें देश की सीमाओं के पार तक फैली होती हैं। चंडीगढ़ के सेक्टर-11 में एक दवा स्टोर के कैशियर (जानकी दास) की नृशंस हत्या की जांच के दौरान चंडीगढ़ पुलिस ने जिस अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया है, वह इसी कड़वी हकीकत की तस्दीक करता है। इस हत्याकांड के सुरागों का पीछा करते हुए क्राइम ब्रांच जब पंजाब के सीमावर्ती जिलों—तरनतारन और अमृतसर—तक पहुँची, तो एक ऐसा खौफनाक मंज़र सामने आया जिसने देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है।यह केवल एक साधारण आपराधिक गिरोह नहीं था, बल्कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा पोषित एक बड़ा ‘नार्को-टेरर’ (मादक पदार्थ-आतंकवाद) और जाली नोटों का नेटवर्क था। इस कार्रवाई में भारी मात्रा में मेथामफेटामाइन (नशीला पदार्थ), ₹8 लाख के नकली नोट, और अवैध हथियार बरामद होना यह साबित करता है कि भारत के खिलाफ सीमा पार से जारी ‘प्रॉक्सी वॉर’ (छद्म युद्ध) ने अब नया और अधिक घातक रूप अख्तियार कर लिया है। देखने वाली बात यह है कि पिछले कुछ दशकों में आतंकवाद का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। अब यह केवल बंदूकों और बमों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ के रूप में लड़ा जा रहा है। नार्को-टेररिज्म इस रणनीति का सबसे खतरनाक हथियार है।इसके तहत एक तरफ सीमा पार से ड्रग्स भेजकर भारत की युवा पीढ़ी को शारीरिक और मानसिक रूप से खोखला किया जाता है, तो दूसरी तरफ उसी ड्रग्स की बिक्री से मिलने वाले काले धन का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों, हथियारों की खरीद और स्लीपर सेल्स को फंडिंग देने के लिए किया जाता है।इस विशिष्ट मामले में नशीले पदार्थों के साथ ‘फेक इंडियन करेंसी नोट’ (FICN) की बरामदगी यह दर्शाती है कि दुश्मन देश भारत की आर्थिक संप्रभुता पर भी समानांतर प्रहार कर रहा है। बाजार में नकली नोटों को खपाकर भारतीय मुद्रा की साख को कमजोर करने और महंगाई व अस्थिरता पैदा करने की यह एक सोची-समझी साज़िश है।चंडीगढ़ पुलिस की जांच में जो सबसे चिंताजनक पहलू सामने आया है, वह है इस नेटवर्क द्वारा सीमा पार से तस्करी के लिए ड्रोन तकनीक का धड़ल्ले से इस्तेमाल। पंजाब की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि कटीले तारों और चौसीस घंटे की बीएसएफ (BSF) की चौकसी के बावजूद, आसमान के रास्ते को पूरी तरह सील करना एक बड़ी चुनौती बन गया है। पाकिस्तान में बैठे आका रात के अंधेरे में आधुनिक, कम आवाज वाले ड्रोनों के जरिए जीपीएस कोऑर्डिनेट्स का उपयोग कर हेरोइन, मेथामफेटामाइन और जाली नोटों के पैकेट भारतीय सीमा के भीतर गिरा देते हैं।स्थानीय स्तर पर ‘ड्रॉप’ उठाने वाले कूरियर सुरक्षा एजेंसियों के रडार से बचने के लिए अत्यधिक एनक्रिप्टेड डिजिटल मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं। इस केस में गिरफ्तार आरोपी—गुरमीत सिंह उर्फ बादशाह, आकाश कुमार और सचिन सिलवेस्टर—इसी कॉपरेटिव नेटवर्क के प्यादे थे, जो तकनीक के सहारे देश विरोधी ताकतों के एजेंडे को जमीन पर उतार रहे थे।इस पूरे खुलासे का सबसे स्याह और डरावना पहलू यह है कि इस अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का मुख्य सूत्रधार या रणनीतिकार कोई बाहर घूम रहा अपराधी नहीं, बल्कि जेल की सलाखों के पीछे बंद गैंगस्टर धर्मिंदर सिंह उर्फ गोली है। यह घटना भारतीय कारागारों की सुरक्षा और प्रबंधन पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।एक खूंखार अपराधी जेल के भीतर बैठकर मोबाइल फोन, इंटरनेट और एनक्रिप्टेड ऐप्स के जरिए पाकिस्तान में आईएसआई के हैंडलर्स और बाहर जमीन पर सक्रिय अपने गुर्गों के बीच पुल का काम कर रहा था।जेलों का ‘क्राइम हब’ में बदल जाना यह दिखाता है कि तकनीक के इस दौर में हमारे जेल प्रशासन के पास या तो आधुनिक जैमर्स और सर्विलांस उपकरणों की कमी है, या फिर भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि देश की सुरक्षा दांव पर लगा दी जाती है। जब तक जेलों से गैंगस्टरों के नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त नहीं किया जाएगा, तब तक बाहर सड़क पर पुलिस की हर कामयाबी अधूरी रहेगी।read more:https://khabarentertainment.in/509-vidyut-sakhis-in-bijnor-receive-thermal-printers-instant-electricity-bill-receipts-will-now-be-available-at-doorsteps/गौरतलब है कि पंजाब ने अस्सी और नब्बे के दशक में उग्रवाद का एक लंबा और काला दौर देखा है। बड़ी कुर्बानियों के बाद वहां शांति बहाल हुई थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से ‘उड़ता पंजाब’ की जो छवि बनी है, वह इसी नार्को-टेरर का परिणाम है।चंडीगढ़ पुलिस द्वारा इन सीमावर्ती जिलों में की गई छापेमारी बताती है कि इन क्षेत्रों में इस नेटवर्क की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं। बेरोजगार युवाओं को पैसों का लालच देकर इस दलदल में धकेला जा रहा है।आज का सबसे बड़ा खतरा यह है कि स्थानीय अपराधियों और वैचारिक रूप से प्रेरित आतंकवादियों के बीच की लकीर मिट चुकी है। अपराधी अब केवल फिरौती या डकैती नहीं कर रहे, बल्कि वे विदेशी ताकतों के हाथों के खिलौने बनकर देश के खिलाफ देशद्रोह के मामलों में सीधे शामिल हो रहे हैं।इस पूरे घटनाक्रम में चंडीगढ़ पुलिस की भूमिका अत्यंत सराहनीय रही है। एक स्थानीय हत्या के मामले को केवल एक ‘ब्लाइंड मर्डर’ मानकर फाइल बंद करने के बजाय, पुलिस ने इसके पीछे छिपे वृहद पैटर्न को समझा। चंडीगढ़ जैसे केंद्र शासित प्रदेश की पुलिस ने पंजाब पुलिस और केंद्रीय खुफिया एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित कर त्वरित कार्रवाई की। आरोपियों के फोन रिकॉर्ड्स, वित्तीय लेनदेन और कॉल डेटा के विश्लेषण से ही इस सिंडिकेट का पर्दाफाश संभव हो सका। यह आधुनिक पुलिसिंग का एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे डेटा और तकनीक का सही इस्तेमाल कर बड़े से बड़े सिंडिकेट को तोड़ा जा सकता है।इस खुलासे ने सुरक्षा एजेंसियों के सामने कुछ अनिवार्य और कड़े कदम उठाने की आवश्यकता को रेखांकित किया है:जैसे देश की सभी संवेदनशील जेलों में ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ आधारित सर्विलांस, आधुनिक 5G जैमर्स और नियमित औचक निरीक्षण अनिवार्य किए जाएं। जेल के भीतर मोबाइल का मिलना एक अक्षम्य राष्ट्रीय सुरक्षा अपराध माना जाना चाहिए।भारत-पाकिस्तान सीमा पर ‘एंटी-ड्रोन सिस्टम’ और लेजर फेंसिंग को बड़े पैमाने पर तैनात करने की गति तेज करनी होगी, ताकि आसमान से होने वाली इस अवैध सप्लाई चेन को हवा में ही नष्ट किया जा सके।इस नार्को-टेरर नेटवर्क की कमर तब तक नहीं टूटेगी जब तक इनके वित्तीय साम्राज्य को नेस्तनाबूद नहीं किया जाता। ईडी और एनआईए जैसी केंद्रीय एजेंसियों को इस सिंडिकेट की संपत्तियों को कुर्क करना चाहिए और हवाला नेटवर्क को ध्वस्त करना चाहिए।ड्रग्स और आतंकवाद का कोई राज्य नहीं होता। इसके लिए पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और चंडीगढ़ को मिलाकर एक संयुक्त, स्थायी ‘नार्को-टेरर इंटेलिजेंस ग्रिड’ बनाने की जरूरत है, जहां रीयल-टाइम सूचनाएं साझा की जा सकें। अब यह चंडीगढ़ पुलिस का यह खुलासा एक गंभीर चेतावनी है। यह हमें याद दिलाता है कि भारत के खिलाफ साजिश रचने वाली ताकतें कभी सोती नहीं हैं; वे लगातार अपनी रणनीतियां बदल रही हैं। सरहद पार बैठे आकाओं के मंसूबों को नाकाम करने के लिए हमारी सुरक्षा एजेंसियों को अपराधियों से दो कदम आगे रहना होगा।दवा स्टोर के कैशियर की जान तो वापस नहीं आ सकती, लेकिन उनकी मौत की जांच से जो सच बाहर आया है, उसने देश को एक बड़े खतरे के प्रति सचेत कर दिया है। अब समय आ गया है कि नार्को-आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति को केवल बयानों में नहीं, बल्कि जमीन पर अत्यंत आक्रामकता के साथ लागू किया जाए। देश की संप्रभुता, युवाओं के भविष्य और हमारी आर्थिक स्थिरता की रक्षा के लिए इस पूरे नेटवर्क की जड़ों में तेजाब डालना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।