नवजागरण का नया दौर। किसी भी राष्ट्र का पुनर्जागरण केवल आर्थिक समृद्धि से नहीं होता, बल्कि उसकी सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय आत्मविश्वास, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सुशासन और जनसहभागिता के समन्वय से होता है। भारत की विकास-यात्रा इसी सत्य की पुष्टि करती है। 1947 में भारत और पाकिस्तान दोनों ने स्वतंत्रता प्राप्त की, किंतु दोनों देशों ने अपने-अपने विकास के लिए भिन्न मार्ग चुने। पाकिस्तान जहाँ राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और वैचारिक द्वंद्व से जूझता रहा, वहीं भारत ने लोकतांत्रिक संस्थाओं, संवैधानिक मूल्यों और विकासोन्मुख नीतियों के आधार पर अपनी यात्रा निरंतर आगे बढ़ाई।महात्मा गांधी का यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है।कि भारत की आत्मा उसके गाँवों में बसती है। इसी भावना के अनुरूप आधुनिक भारत ने विकास की ऐसी अवधारणा को अपनाने का प्रयास किया जिसमें गाँव, गरीब, किसान, महिला, युवा और वंचित वर्ग सभी विकास प्रक्रिया के सहभागी बन सकें।read more:https://pahaltoday.com/aarohi-became-dm-for-a-day-boosted-the-morale-of-the-girl-students/पिछले एक दशक में भारत के राजनीतिक परिदृश्य में उत्तरदायी शासन, पारदर्शिता, डिजिटल प्रशासन और परिणाम आधारित राजनीति की अवधारणा अधिक सशक्त होकर उभरी है। जनता अब केवल वादों का नहीं, बल्कि कार्यों और उपलब्धियों का मूल्यांकन करने लगी है। यही स्वस्थ लोकतंत्र का आधार है।इसी कालखंड में अनेक महत्वपूर्ण संवैधानिक एवं नीतिगत निर्णय लिए गए। अनुच्छेद 370 का निरसन, तीन तलाक पर कानून, नागरिकता से संबंधित नई नीतियों पर विमर्श तथा संसद की कार्यप्रणाली के आधुनिकीकरण जैसे कदमों ने भारतीय राजनीति में व्यापक चर्चा को जन्म दिया। इन निर्णयों के समर्थक इन्हें राष्ट्रीय एकीकरण और प्रशासनिक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण मानते हैं, जबकि आलोचक इनके विभिन्न संवैधानिक और सामाजिक पहलुओं पर प्रश्न उठाते रहे हैं। लोकतंत्र की यही विशेषता है कि उसमें विविध मतों का सम्मान बना रहता है।भारत का सांस्कृतिक पुनर्जागरण भी इस दशक की प्रमुख उपलब्धियों में गिना जाएगा। योग और आयुर्वेद को वैश्विक पहचान मिली। भारतीय भाषाओं, लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रयास तेज हुए। अयोध्या में राममंदिर का निर्माण करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था का प्रतीक बनकर उभरा। शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय ज्ञान परंपरा, प्राचीन विज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने के प्रयास किए गए। आज भारत की सांस्कृतिक कूटनीति इसी व्यापक दृष्टि को विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर रही है। आर्थिक क्षेत्र में भी भारत ने उल्लेखनीय परिवर्तन देखे। मेक इन इंडिया, जीएसटी, डिजिटल इंडिया, जनधन योजना, यूपीआई, स्टार्टअप इंडिया तथा आधारभूत संरचना के विस्तार ने आर्थिक गतिविधियों को नई गति प्रदान की। रेलवे, सड़क, हवाई अड्डों, बंदरगाहों और डिजिटल नेटवर्क के विस्तार ने भारत की विकास क्षमता को सुदृढ़ किया। वित्तीय समावेशन और डिजिटल भुगतान प्रणाली ने भारत को विश्व में एक विशिष्ट पहचान दिलाई।यद्यपि आर्थिक उपलब्धियाँ उल्लेखनीय हैं, फिर भी बेरोजगारी, आय-असमानता, ग्रामीण–शहरी विषमता तथा कृषि क्षेत्र की चुनौतियाँ अभी भी गंभीर चिंतन का विषय हैं। किसान आंदोलनों और रोजगार संबंधी बहसों ने यह स्पष्ट किया है कि विकास की गति के साथ-साथ उसका न्यायपूर्ण वितरण भी उतना ही आवश्यक है।विदेश नीति के क्षेत्र में भारत ने संतुलित, बहुआयामी और आत्मविश्वासपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया है। वैश्विक दक्षिण की आवाज़ को प्रभावी ढंग से उठाने, बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाने तथा प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने के कारण भारत का अंतरराष्ट्रीय महत्व निरंतर बढ़ा है। भारत की कूटनीतिक क्षमता और वैश्विक नेतृत्व को नई पहचान प्रदान की।भारत आज एक ऐसे संक्रमण काल से गुजर रहा है जहाँ विकास, सांस्कृतिक आत्मगौरव, वैज्ञानिक सोच और राष्ट्रीय सुरक्षा समानांतर रूप से आगे बढ़ रहे हैं। साथ ही लोकतांत्रिक संवाद, सामाजिक समरसता, समान अवसर और संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।यदि विकास के साथ संवेदनशीलता, विज्ञान के साथ संस्कृति, प्रगति के साथ प्रकृति और शक्ति के साथ नैतिकता का संतुलन बना रहा, तो भारत केवल एक विकसित राष्ट्र ही नहीं, बल्कि विश्व को दिशा देने वाली सभ्यता के रूप में पुनः प्रतिष्ठित होगा।“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।”भारत का पुनर्जागरण केवल सरकारों की उपलब्धियों का इतिहास नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की सामूहिक चेतना, परिश्रम, आत्मविश्वास और राष्ट्रीय संकल्प की प्रेरणादायी गाथा है। यही राष्ट्रीय जागरण विकसित भारत की आधारशिला है।