जनजातीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्र चेतना का महापर्व : प्रकाश कुमार उईके

डॉ. सुभाष गौतम

भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष के अवसर पर नई दिल्ली के लाल किला मैदान में आयोजित होने जा रहे विशाल जनजातीय सांस्कृतिक समागम को लेकर देशभर के जनजातीय समाज में विशेष उत्साह दिखाई दे रहा है। भारतीय आदिम जाति सेवक संघ, नई दिल्ली के अध्यक्ष एवं पूर्व न्यायाधीश प्रकाश कुमार उईके का मानना है कि जनजातीय समाज केवल भारत की सांस्कृतिक पहचान नहीं बल्कि प्रकृति, ज्ञान परंपरा और राष्ट्र चेतना का जीवंत आधार है।
देशभर की सैकड़ों जनजातियों को एक मंच पर लाने वाले इस ऐतिहासिक आयोजन में कई ऐसे समुदाय भी शामिल हो रहे हैं, जो पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर अपनी संस्कृति और परंपराओं की प्रस्तुति देंगे। यह केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की जड़ों, उसकी स्मृतियों और उसकी मूल आत्मा को समझने का प्रयास है। वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सुभाष गौतम और युवा पत्रकार हिमांशु ने प्रकाश कुमार ऊइके से जनजातीय संस्कृति, युवाओं, भाषाओं, लोककलाओं और इस विशाल आयोजन को लेकर विस्तार से बातचीत की। प्रश्न- जनजातीय सांस्कृतिक समागम आयोजित करने के पीछे क्या सोच है?read more:https://pahaltoday.com/obra-police-arrested-a-youth-with-1-kg-150-grams-of-ganja/उत्तर- देखिए, यह वर्ष भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती का वर्ष है। भगवान बिरसा मुंडा केवल एक जनजातीय नायक नहीं थे, बल्कि वे उस चेतना के प्रतीक थे जिसने अपनी संस्कृति, अपनी जमीन, अपनी परंपराओं और अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए अंग्रेजी सत्ता से संघर्ष किया। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन जनजातीय समाज के अधिकारों और उसकी पहचान को बचाने में लगा दिया। आज आवश्यकता इस बात की है कि उनकी विरासत केवल पुस्तकों तक सीमित न रह जाए, बल्कि देश के युवाओं और विशेषकर जनजातीय समाज के बीच पहुंचे। इसी सोच के साथ यह विशाल जनजातीय सांस्कृतिक समागम आयोजित किया जा रहा है।जनजातीय समाज की सबसे बड़ी पहचान उसकी संस्कृति, उसकी बोली, उसके रीति-रिवाज और प्रकृति के साथ उसका गहरा संबंध है। सदियों से यह समाज प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीता आया है। भगवान बिरसा मुंडा ने इन्हीं मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष किया था। इसलिए हम चाहते हैं कि देशभर के जनजातीय समाज को दिल्ली के लाल किला मैदान में एक मंच पर लाकर भारत को उसकी वास्तविक सांस्कृतिक विविधता की झलक दिखाई जाए। प्रश्न- इस महोत्सव से पहले भी जनजातीय महोत्सव हुए, उनसे अलग यह कैसे है? उत्तर- पहले भी कई संस्थानों और संगठनों द्वारा जनजातीय महोत्सव आयोजित किए गए हैं, लेकिन यह आयोजन अपने स्वरूप और व्यापकता के कारण विशेष है। मैं किसी पुराने आयोजन की आलोचना नहीं करूंगा, लेकिन इस समागम में हमने यह प्रयास किया है कि देश की अधिकतम जनजातियां इसमें भाग लें। भारत में लगभग 705 जनजातियां हैं और उनमें से लगभग 500 जनजातीय समूहों की भागीदारी इस समागम में सुनिश्चित की गई है। अंडमान-निकोबार से लेकर नॉर्थ ईस्ट तक, केरल से  लेकर राजस्थान तक, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक तक हर क्षेत्र से जनजातीय समाज यहां पहुंच रहा है। यह केवल मंचीय प्रस्तुति भर नहीं है, बल्कि ऐसा अवसर है जहां देश की विविध जनजातीय संस्कृतियां एक-दूसरे से संवाद करेंगी। लोग एक-दूसरे के रहन-सहन, परंपराओं, लोककलाओं और जीवन दर्शन को समझ सकेंगे। प्रश्न- इस समागम में देश के किन-किन राज्यों से जनजातीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित की गई है? उत्तर- लगभग सभी जनजाति बहुल राज्यों से समुदाय इसमें भाग ले रहे हैं। नॉर्थ ईस्ट के राज्यों के अलावा राजस्था न, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल से भी बड़ी संख्या में लोग शामिल हो रहे हैं। मैं आपको एक भावुक दृश्य बताना चाहता हूं। अंडमान-निकोबार से लोग दो-तीन दिन पहले ही निकल चुके हैं। कई समुदायों के लोग चार-चार दिन तक जहाज की यात्रा करके और फिर चेन्नई तथा कोलकाता से अलग-अलग ट्रेनों के माध्यम से दिल्ली पहुंच रहे हैं। कई लोग ऐसे हैं जो पहली बार अपने गांव और जंगलों से निकलकर देश की राजधानी देखने आ रहे हैं। यह केवल यात्रा नहीं है, बल्कि भारत की विविध संस्कृतियों का एक-दूसरे से मिलन है। प्रश्न- कोई ऐसी जनजाति जो पहली बार शामिल हो रही है? उत्तर- अंडमान-निकोबार की ग्रेट अंडमानी जनजाति के लोग भी इस आयोजन में शामिल हो रहे हैं, जिनकी संख्या आज बहुत कम बची है। यह अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण बात है क्योंकि देश के अधिकांश लोगों ने शायद उनका नाम तक नहीं सुना होगा। इसके अलावा वहां रहने वाले कुछ अन्य समुदाय भी आ रहे हैं जिनके पूर्वज अंग्रेजों के समय में सड़क और विकास कार्यों के लिए वहां गए थे।read more:https://pahaltoday.com/initiatives-are-being-taken-to-start-24-hour-medical-services-at-the-old-hospital/ हमारा प्रयास है कि जिन समुदायों की पहचान धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है, उन्हें राष्ट्रीय मंच मिले और देश उन्हें समझ सके। प्रश्न- आधुनिकता के इस दौर में कई जनजातीय भाषाएं और लोककलाएं लुप्त हो रही हैं। कोई ऐसी लोककला जिन्हें बचाने की जरूरत है, जिसमें यह समागम मदद कर रहा है? उत्तर- अगर हम गंभीरता से देखें तो पाएंगे कि भारत की मूल ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक चेतना का बहुत बड़ा हिस्सा जनजातीय समाज और वनों से जुड़ा हुआ है। चाहे आयुर्वेद की बात हो, वनस्पतियों की पहचान हो, धातु विज्ञान हो या प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की कला जनजातीय समाज के पास अद्भुत अनुभव और ज्ञान है। ऋषि चरक ने भी अपनी रचनाओं में लिखा था कि वनस्पतियों और जड़ी-बूटियों की वास्तविक पहचान वनवासी समाज ही कर सकता है। आज भी जनजातीय समाज के पास औषधीय पौधों का ऐसा ज्ञान है, जिसे आधुनिक समाज पूरी तरह समझ नहीं पाया है। अगर आप इंजीनियरिंग की दृष्टि से देखें तो अगरिया जनजाति आज भी कच्चे लोहे को छोटी भट्टी में उस तापमान तक ले जाती है, जहां बड़े-बड़े स्टील प्लांट लोहे को पिघलाकर स्टील बनाते हैं। यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि गहरी तकनीकी समझ है। आज दुनिया पर्यावरण संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन कम करने की बात करती है, लेकिन जनजातीय समाज सदियों से प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जी रहा है। जंगलों में रहने के बावजूद वे केवल उतना ही लेते हैं जितनी आवश्यकता होती है। यह समागम उन्हीं लोककलाओं, भाषाओं, ज्ञान परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने का प्रयास है जिन्हें आधुनिकता की दौड़ में धीरे-धीरे भुलाया जा रहा है। प्रश्न- युवाओं को जोड़ने हेतु कोई प्रयास? उत्तर- सबसे बड़ी चुनौती आज युवाओं को उनकी जड़ों से जोड़ने की है। लंबे समय तक जनजातीय समाज के इतिहास और उनके महापुरुषों को उचित स्थान नहीं मिला। अंग्रेजी लेखकों ने जानबूझकर उनके संघर्षों और योगदान को इतिहास में दबा दिया। भगवान बिरसा मुंडा के बारे में भी कुछ वर्ष पहले तक बहुत कम जानकारी उपलब्ध थी, लेकिन अब धीरे-धीरे जनजातीय समाज के नायकों और उनके संघर्षों को सामने लाया जा रहा है। विभिन्न संगठनों द्वारा उनके जीवन पर पुस्तकें लिखी जा रही हैं और गांव-गांव तक पहुंचाई जा रही हैं। जब युवाओं को यह पता चलता है कि उनके पूर्वजों ने देश की स्वतंत्रता और समाज की रक्षा के लिए कितना बड़ा योगदान दिया था, तो उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे राष्ट्र की मुख्यधारा से और मजबूती से जुड़ते हैं। आज आवश्यकता इस बात की भी है कि हम जनजातीय समाज को समझने का प्रयास करें। हर जनजाति की अपनी भाषा, अपनी बोली और अपनी सांस्कृतिक संरचना है। यदि हमें उनके बीच विकास की योजनाएं सफल करनी हैं तो पहले उनकी भाषा और उनकी संवेदनाओं को समझना होगा। कई बार गलत विचारधाराएं इसलिए प्रभावी हो जाती हैं क्योंकि वे सबसे पहले जनजातीय समाज की भाषा सीखती हैं और उनके बीच संवाद स्थापित करती हैं। जबकि मुख्यधारा समाज यह प्रयास कम करता है। इसलिए सबसे जरूरी है विश्वास, संवाद और सम्मान का रिश्ता बनाना। प्रश्न- इस आयोजन की बड़ी चुनौती क्या है? उत्तर- सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कई ऐसे जनजातीय समुदाय इस कार्यक्रम में शामिल हो रहे हैं जिन्होंने जीवन में कभी ट्रेन तक नहीं देखी थी और अब पहली बार ट्रेन में बैठकर दिल्ली पहुंच रहे हैं। कल्पना कीजिए, जो लोग सदियों से जंगलों और पहाड़ों के बीच रहते आए हैं, वे पहली बार देश की राजधानी में आ रहे हैं। यह केवल एक आयोजन नहीं बल्कि भावनात्मक और ऐतिहासिक क्षण है। इतिहास गवाह है कि जब-जब देश और समाज को आवश्यकता पड़ी, वनवासी समाज सबसे पहले उसके साथ खड़ा हुआ। चाहे महाराणा प्रताप के संघर्ष में राणा पूंजा का साथ हो या शिवाजी के युद्धों में मावलों का योगदान वनवासी समाज ने हमेशा राष्ट्र की रक्षा में अपनी भूमिका निभाई है। आज वही समाज अपने वनों से निकलकर दिल्ली आ रहा है। ऐसे में दिल्ली के लोगों में भी उत्साह और अपनापन दिखाई दे रहा है। लोग पूरे मन से उनके स्वागत की तैयारी कर रहे हैं। मुझे लगता है कि यह केवल सांस्कृतिक समागम नहीं, बल्कि भारत की आत्मा से पुनः जुड़ने का अवसर है।

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