दिल्ली के दक्षिण में अरावली पहाड़ियों से आने वाले बरसाती पानी के तेज बहाव को रोकने और भूजल स्तर को बढ़ावा देने के लिए रिज क्षेत्र देवली, छतरपुर, जौनापुर,गदाईपुर, आयानगर, डेरा- माण्डी, महिपालपुर, रंगपुरी, असौला गांव आदि की हद में भूजल पुनरभरण और मिट्टी के कटाव रोकने के लिए बांध बनाए गए। ये सभी बांध दिल्ली प्रशासन के सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण विभाग की योजनाओं के तहत बनाए गए।गौरतलब रहे असौला गांव के बरसाती नाले के साथ बसे परिवारों के लिए बना नारकीय जीवन का अभिशाप किसी कुदरत की देन नहीं, बल्कि दिल्ली प्रशासन के सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण विभाग, वन विभाग और राजस्व विभाग की अनियमितताओं की देन हैं। जिसके फलस्वरूप किसी भी समय की एक घन्टे की बारीश, खासतौर पर सावन- भादों महीने में बरसात का पानी नाले में एकत्रित हुए मल-मूत्र के साथ घरों में घुस जाता रहा हैं। आज भी प्रशासन इस सब पर मौन धारण किए हुए हैं। आखिर क्यों और कब तक? इस समस्या के चलते, हर साल हजारों-हजार का नुकसान उठाने के लिए मजबूर हैं पीड़ित परिवार।गौतम ने बताया कि इस समस्या की कहानी आज से लगभग 40-45 साल पहले शुरूआत हुई। असौला गांव के बरसाती बांध में अरावली पहाड़ियों की तरफ से आने वाले बरसाती पानी व पहले से एकत्रित पानी के दबाव में बांध टुट गया। उस समय नाले के साथ बसे परिवारों के कच्चे- पक्के घर के साथ घरेलु समान भी बह गया। बांध के तीव्र पाने के बहाव में मुख्य सड़क पर बने दो पुल तथा इर्द गिर्द की आधा किलोमीटर से ज्यादा सड़क का टुकड़ा भी बह गए। इस परिस्थिति से निपटने के लिए, उस समय के दिल्ली प्रशासन के मुखिया को मिलिट्री की सहायता लेनी पड़ी। क्षतिग्रस्त सड़क पर लोहे का अस्थायी पुल का निर्माण करवाना पड़ा।read more:https://pahaltoday.com/woman-posing-as-a-bride-flees-after-administering-a-sedative-remains-at-large-even-after-a-month-and-a-half/उस समय के कार्यकारी पार्षद (विकास) ने घटनास्थल का दौरा किया, और पीड़ित परिवारों को स्थायी आवास के लिए भूमि देने के निर्देश दिए गए। निर्देशों का अता पता नहीं कहा गए। हर साल समस्या से लड़ने के लिए पीड़ित परिवारों को अपने हाल पर छोड दिया दिल्ली सरकार ने।आश्चर्यजनक बात यह हैं कि क्षेत्र के भू-माफिया और राजस्व विभाग, वन विभाग और सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण विभाग की सांठ-गांठ से असौला गांव के ज्यादातर जोहड, पोखर, चरागाह, तालाब, कुआं, पंचायत/ ग्राम पंचायत की जमीन, बरसाती बांध की लगभग 300 मीटर चौड़ाई और लगभग एक किलोमीटर के बरसाती बांध के दोनों तरफ की जमीन पर अवैध अतिक्रमण और निर्माण कार्य तथा खरीद फरोख्त के चुंगल से असौला गांव के खसरा नम्बर 47 पर बनी ब्रिटिश काल की पुलिस चौकी भी अपने आप को बचा न सकी। लगता हैं दिल्ली का राजस्व विभाग पिछले कई साल से असौला गांव व ईद गिर्द के अंतर्गत आने वाली बरसाती नाले की जमीन को मिल्कियत में तब्दील कर, मुआवजा भुगतान करने के उपरांत, शायद नाले के नाम पर जमीन अधिग्रहण कर बरसाती नाले को बनाने की किसी योजना को अंजाम दे सके। आज से सर्दियों पहले भी अरावली पहाड़ियों की तरफ से आने वाला बरसाती पानी बिना किसी नुकसान के हरियाणा की चला जाता था। ऐसा नहीं, असौला गांव के बरसाती बांध टुटने के उपरांत उत्पन्न समस्या से दिल्ली सरकार के मुखिया अनभिज्ञ हैं। उन्हें क्या फर्क पड़ता है कि हर एक घन्टे की बारीश का पानी मल-मूत्र के साथ असौला गांव के बरसाती नाले के साथ बसे परिवारों के घरों घुस कर पानी तबाही मचाता हैं, कितने ही मकानों में दरार पड़ने की खबर दिल्ली के अखबारों में छपती हैं। अखबार की कतरन सन्तरी- मंत्री की टेबल पर जाती हैं। उसपर कार्यवाही करने की बजाय सरकारी फाइल में दफन हो जाती हैं।गौतम ने बताया कि इतने लम्बे समय के दौरान बरसात के समय एक बार दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री मदन लाल खुराना ने अवश्य दौरा किया। उन के निर्देश पर नाले के उपर पुलिया बनायी गई । पिछले एक दशक पूर्व क्षेत्रीय विधायक बलराम तंवर ने मुख्य सड़क से कुछ दूरी तक पक्के नाले का निर्माण कराया गया। इस सब के बावजूद समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई हैं।राष्ट्रीय नागरिक पार्टी ने इस समस्या के समाधान के लिए देश की राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, तथा दिल्ली के उपराज्यपाल को ज्ञापन भेजकर दिल्ली में किसी प्रकार के मुआवजा भुगतान के लिए 21 सदस्यीय कमिटी गठित करने की मांग की गई। कमेटी सुनिश्चित करे कि जिस जमीन का भुगतान किया जाएगा, वह जमीन ग्राम पंचायत, ग्राम सभा, जोहड, कुंआ, चारागाह, तालाब, पोखर ,बांध या बरसाती नाले की जमीन पर अवैध अतिक्रमण, निर्माण के खरीद फरोख्त तो नही हुआ। इस का आधार 1950 बनाए जाए।