मुड़ा-तुड़ा मोज़ा

कस्बे के उस पुराने मुख्य डाकघर की बगल वाली गली में एक जर्जर मकान इस तरह खड़ा था जैसे सरकारी व्यवस्था का कोई पुराना इस्तीफा। उसके ऊपरी कमरे में जंग लगा लोहे का एक बड़ा ट्रंक रखा था जो मुंशी बृजमोहन जी के जीवन की एकमात्र ठोस उपलब्धि थी। उस कमरे में रहने वाले मुंशी जी हर रोज सुबह जगते ही सबसे पहले उस भारी ट्रंक का ताला इस श्रद्धा से खोलते थे जैसे कोई भ्रष्ट अधिकारी अपनी काली कमाई की तिजोरी खोलता हो। वे उसमें सबसे नीचे दबाकर रखा हुआ ऊन का एक पुराना और मुड़ा-तुड़ा मोज़ा बाहर निकालते थे जो अपनी स्थिति में मुंशी जी के चरित्र जैसा ही पारदर्शी हो चुका था। मोज़े का रंग धूप में इस तरह उड़ चुका था जैसे चुनाव के बाद नेता के वादे उड़ जाते हैं और उसकी एड़ी के पास एक छोटा सा सुराख था जिसे धागे से इस तरह सिया गया था जैसे फटे हुए संविधान पर कोई पैबंद लगाया गया हो। बृजमोहन जी उस मोज़े को अपने हाथों में थामकर घंटों उस पर उँगलियाँ फेरते और चेहरे पर वैसी ही बेताबी लाते जैसी कोई बेरोजगार युवक रोजगार दफ्तर की खिड़की पर लाता है। आस-पड़ोस के लोग जब भी उन्हें उस फटे मोज़े को सहलाते देखते तो फुसफुसाने लगते कि मुंशी जी की मति अब उम्र के साथ सठिया चुकी है क्योंकि इस देश में गरीबी और पागलपन के बीच का अंतर केवल एक फटे हुए कपड़े का ही होता है। जब भी डाकिया रामरतन डाक बाँटने आता तो बृजमोहन जी सीढ़ियों से नीचे इस तरह दौड़ते जैसे जनता राहत पैकेज की ओर दौड़ती है और बड़ी उम्मीद से पूछते कि क्यों रे रामरतन आज उस बड़े शहर से कोई पैगाम आया या आज भी मेरी खाली हथेली पर तू सिर्फ सरकारी हमदर्दी ही रखेगा। रामरतन अपनी खाकी टोपी ठीक करता और एक लंबी ठंडी साँस भरकर सिर झुका लेता जैसे वह खुद भी व्यवस्था का एक लाचार पुर्जा हो।मुंशी जी की इस अजीब आदत का रहस्य उस पूरे मोहल्ले के लिए एक ऐसी अबूझ पहेली था जिसका हल शायद किसी सीबीआई जाँच में भी न मिले। उनके इकलौते बेटे मानस को बड़े शहर के एक बहुत नामी कॉर्पोरेट दफ्तर में बहुत बड़ा पद मिले आठ साल बीत चुके थे पर वह पद शायद इतना बड़ा था कि वहाँ से पिता की गरीबी दिखाई देना बंद हो गई थी। मानस जब छोटा था तो बृजमोहन जी कचहरी में अर्जीनवीसी करके एक-एक पैसा इस तरह जोड़ते थे जैसे कोई मक्खी गुड़ पर चिपकती है ताकि बेटे की पढ़ाई में कोई कमी न रह जाए। मोहल्ले के किराना दुकान वाले बनवारी लाल जब भी मुंशी जी को उस मोज़े को निहारते देखते तो चुटकी लेते हुए कहते कि मुंशी जी अब उस फटे मोज़े को ट्रंक से बाहर निकालकर फेंक क्यों नहीं देते क्योंकि आपका साहबजादा अब लाखों रुपये कमाता है और बड़े शहर के वातानुकूलित बंगले में रहता है जहाँ नैतिकता की गर्मी की कोई जरूरत नहीं होती। बृजमोहन जी बनवारी की बात सुनकर बुरा मानने के बजाय केवल एक धीमी सी कड़वी मुस्कान बिखेर देते जो किसी असफल क्रांति जैसी लगती थी और अपनी कांपती आवाज में उत्तर देते कि बनवारी भाई इस मोज़े के तानों-बानों में जो गरमाहट छुपी है वह इस दुनिया के किसी भी अमीर के शोरूम में नहीं मिल सकती क्योंकि वहाँ केवल ठंडी और बिकाऊ सभ्यता मिलती है। वे कहते कि जब तक मेरा मानस इस मोज़े का दूसरा जोड़ा मुझे वापस नहीं लौटा देता तब तक यह ट्रंक यूँ ही खुला रहेगा और मेरी आँखें इस राह पर बिछी रहेंगी जैसे किसी फाइल पर रिश्वत का इंतजार होता है।ठंड का मौसम अब अपने चरम पर था और बर्फीली हवाएँ खिड़की के शीशों से टकराकर वैसी ही कनकनी पैदा कर रही थीं जैसी किसी ईमानदार आदमी के घर में पुलिस की दस्तक करती है। बृजमोहन जी हर शाम उस मुड़े-तुड़े मोज़े को अपनी छाती से चिपकाकर बिस्तर पर इस तरह लेट जाते जैसे वह मोज़ा नहीं बल्कि उनकी बुढ़ापे की पेंशन हो। एक दिन दफ्तर के काम से शहर से आए एक नए युवा वकील साहब बृजमोहन जी से किसी पुराने अदालती कागज के सिलसिले में मिलने पहुँचे जो शायद मुंशी जी की जवानी की किसी गलती का प्रमाण था। वकील साहब ने देखा कि कमरे के कोने में खुला पड़ा वह जंग लगा ट्रंक पूरी तरह से खाली था और उसमें केवल वह एक पुराना मोज़ा ही बड़ी हिफाजत से मखमली कपड़े पर रखा हुआ था जैसे वह किसी शहीद की आखिरी निशानी हो। वकील साहब से रहा नहीं गया और उन्होंने बहुत ही उत्सुक होकर पूछा कि मुंशी जी आपके पास कोई धन-दौलत या संपत्ति तो दिखाई नहीं देती फिर इस जंग लगे लोहे के भारी ट्रंक में आप केवल एक फटे हुए मोज़े को इस तरह पहरा देकर क्यों रखे हुए हैं जैसे यह कोई गुप्त परमाणु सूत्र हो। बृजमोहन जी ने चश्मे के ऊपर से वकील को इस तरह देखा जैसे कोई अनुभवी न्यायाधीश किसी झूठे गवाह को देखता है और अपनी सूखी हथेलियों को आपस में रगड़ते हुए बोले कि वकील साहब यह कोई साधारण मोज़ा नहीं बल्कि मेरे बेटे के उस सफर की पहली सीढ़ी है जिसकी बदौलत आज वह शहर की ऊँची इमारतों में बैठकर वैसे ही हुकूमत चला रहा है जैसे कोई मदारी बंदर नचाता है।बृजमोहन जी ने बात आगे बढ़ाते हुए उस मोज़े की पूरी दास्तान बयान करना शुरू किया जो असल में एक गरीब पिता के शोषण की गाथा थी। उन्होंने बताया कि जब मानस बहुत छोटा था और कड़ाके की ठंड में स्कूल जाता था तो उसके पास पहनने को ऊनी मोज़े नहीं होते थे और मैंने अपनी आखिरी बचत से ऊन का गोला खरीदा था जो शायद मेरी आत्मा की ही एक कतरन थी। मैंने रात-रात भर जागकर अपने हाथों से उसके लिए यह मोज़े बुने थे जैसे कोई कवि अपनी आखिरी कविता बुनता है। बृजमोहन जी की आँखों में नमी तैरने लगी और वे बोले कि मानस जब बड़ा हुआ और पहली बार शहर में बड़े इंटरव्यू के लिए जाने लगा जहाँ इंसान की कीमत उसके कपड़ों से आँकी जाती है तो उसने इसी मोज़े की जोड़ी को पहनकर अपने कदम घर से बाहर निकाले थे। जाते वक्त उसने कहा था कि बापू मैं बहुत जल्द अपनी पहली कमाई से आपके लिए भी ऐसा ही गरम मोज़ा लेकर आऊँगा पर शायद पहली कमाई ही इंसान की याददाश्त छीन लेती है।read mpre:https://pahaltoday.com/woman-posing-as-a-bride-flees-after-administering-a-sedative-remains-at-large-even-after-a-month-and-a-half/पास खड़े डाकिया रामरतन ने टोकते हुए कहा कि लेकिन काका आठ साल में आपका बेटा एक बार भी आपसे मिलने नहीं आया और न ही उसने आज तक आपको कोई मोज़ा या खत भेजा जैसे उसने अपनी जड़ों में तेजाब डाल दिया हो। रामरतन ने पूछा कि आप कब तक इस झूठे वादे को अपने सीने से लगाकर इस ट्रंक की रखवाली करते रहेंगे जैसे कोई ट्रस्टी किसी खाली खजाने की करता है। बृजमोहन जी ने कड़े स्वर में कहा कि रामरतन तू मेरी औलाद के चरित्र पर सवाल मत उठा क्योंकि वह अब एक सफल आदमी है और सफल आदमी के पास पिता के लिए समय नहीं होता यह आधुनिक धर्मशास्त्र का पहला नियम है।आखिरकार वह दिन भी आ गया जब शहर से एक बहुत ही भव्य और चमचमाती काली गाड़ी उस तंग गली में आकर इस तरह रुकी जैसे किसी गंदी नाली के किनारे कमल खिल जाए। गाड़ी का दरवाजा खुला और उसमें से सूट-बूट पहने एक कड़क इंसान बाहर निकला जिसके पीछे दो बॉडीगार्ड हाथों में बड़े-बड़े चमड़े के सूटकेस थामे चल रहे थे जैसे वे कोई महान सभ्यता का बोझ उठा रहे हों। मोहल्ले के लोग यह देखकर दंग रह गए कि बृजमोहन जी का बेटा मानस आखिरकार आठ साल बाद अपने घर लौट आया था जो अब एक बाप का बेटा नहीं बल्कि एक कॉर्पोरेट पुर्जा लग रहा था। मानस सीधे सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर कमरे में पहुँचा जहाँ बृजमोहन जी कांपते हाथों से उसी पुराने मोज़े को अपनी जेब में छिपाने की कोशिश कर रहे थे जैसे कोई मध्यमवर्गीय आदमी अपनी शर्म छिपाता है। मानस ने अपने पिता के पैर छुए और अपने सुरक्षाकर्मियों को इशारा करके वे बड़े सूटकेस मेज पर रखवा दिए जैसे वह अपने पिता पर एहसान की कोई नई किस्त जमा कर रहा हो। मानस ने बहुत ही गर्व से मुस्कुराते हुए कहा कि बापू देखिए आज आपका बेटा कितना सफल हो गया है कि उसने भावनाओं का गला घोंटकर शहर के सबसे बड़े इलाके में आपके लिए एक बहुत बड़ा बंगला खरीदा है। उसने कहा कि इस सूटकेस में देश-विदेश के सबसे महंगे ब्रांडेड कपड़े और ऊनी मोज़ों के दर्जन भर पैकेट हैं जिन्हें पहनकर आप अपनी गरीबी को ढंक सकते हैं।बृजमोहन जी ने उन महंगे सूटकेसों की तरफ एक नजर भी नहीं डाली क्योंकि उनकी आँखों में अब भी वह पुराना मोह बाकी था जो आधुनिकता में वर्जित है। उन्होंने अपनी कांपती उँगलियों से अपनी जेब से वह पुराना मुड़ा-तुड़ा मोज़ा निकालकर मानस के चमचमाते बूटों के पास रख दिया जो सभ्यता के संघर्ष का प्रतीक लग रहा था। बृजमोहन जी ने रुँधे हुए गले से पूछा कि मानस मुझे इन कीमती सूटकेसों और महंगे कपड़ों से कोई सरोकार नहीं है क्योंकि कपड़ा तन ढंकता है मन नहीं। उन्होंने पूछा कि बस मुझे इतना बता दे कि इस मोज़े का दूसरा जोड़ा कहाँ है जो तू आठ साल पहले अपने पैरों में पहनकर इस घर से गया था और जिसके बदले में तूने अपनी पहचान बेची थी। मानस के चेहरे की बनावटी रंगत अचानक उड़ गई और उसने झिझकते हुए अपनी आँखें नीचे झुका लीं जैसे कोई भ्रष्ट नेता पकड़े जाने पर झुकता है। मानस ने हिचकिचाते हुए धीमी आवाज में उत्तर दिया कि बापू जब मैं शहर के उस बड़े कॉर्पोरेट दफ्तर में पहली बार गया तो वहाँ मेरे सहकर्मियों ने मेरे इस हाथ से बुने फटे मोज़े का बहुत मज़ाक उड़ाया था क्योंकि वहाँ हाथ का काम और दिल का दर्द दोनों ही आउटडेटेड फैशन हैं। उसने कहा कि मुझे अपने इस पिछड़ेपन पर इतनी शर्मिंदगी महसूस हुई कि मैंने दफ्तर के बाहर वाले डस्टबिन में उस दूसरे मोज़े को अपनी संवेदनाओं के साथ ही फेंक दिया था। बृजमोहन जी का शरीर यह कड़वा सच सुनते ही सुन्न पड़ गया और उनकी आँखों से अश्रुओं की धारा इस तरह बह निकली जैसे कोई बांध टूट गया हो। बृजमोहन जी ने कांपते हाथों से उस लोहे के ट्रंक का भारी ढक्कन हमेशा के लिए धड़ाम से बंद कर दिया और रोते हुए बोले कि मानस तूने सिर्फ वह मोज़ा नहीं फेंका था बल्कि उस बाप की रातों की नींद और उस मन्नत को कचरे में फेंक दिया था जिसने तुझे इंसान बनाने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया था। उन्होंने कहा कि अब इन महंगे मोज़ों को वापस ले जा क्योंकि यहाँ इस बंद ट्रंक में अब केवल एक बाप के टूटे हुए अभिमान की मय्यत बंद है और इस देश में मय्यत पर नए कपड़े नहीं कफन चढ़ाए जाते हैं।

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