कद, काठी और लाठी

डॉ सुरेश कुमार मिश्रा
जंतर-मंतर की उस सीली, ऐतिहासिक और ठंडी सड़क पर जब खाकी वर्दी की लाठियों ने अपना भयानक नृत्य शुरू किया, तो हवा में सिर्फ चीखें और भागते जूतों की चाप तैर रही थी। हर कोई अपनी हड्डियों को साबुत बचाकर ले जाने की जुगत में बदहवास भाग रहा था। तभी भीड़ के उस भयानक खौफनाक समंदर के बीच एक लड़का रुका जैसे बहती नदी में कोई भारी पत्थर ज़मीन पकड़ ले। उसने भागना छोड़ दिया, अपनी मुट्ठियाँ ढीली कीं और अपना निहत्था शरीर उस खाकी आंधी के हवाले कर दिया। जब दनादन लाठियाँ पड़ने लगीं, तो वह रोया नहीं, न ही उसने रहम की भीख माँगी। उसने अपनी आँखों में एक जलता हुआ सन्नाटा भरकर सिपाहियों से बस इतना कहा, “मारो यार, कब तक मारोगे? जब तक तुम्हारी बांहें न टूट जाएँ या मेरी साँसें न थम जाएँ, मारते रहो।”
उस खौफनाक लम्हे में, जब पहला वार उस लड़के की पीठ पर पड़ा, तो दर्द की कोई लकीर हवा में नहीं खिंची, बल्कि लड़के के शरीर और उस सख्त शीशम की लाठी के बीच एक खामोश, भीतर तक हिला देने वाली बातचीत शुरू हो गई। लाठी ने अचरज से थरथराते हुए पूछा, “अरे पगले, तू भाग क्यों नहीं रहा? तेरे आगे-पीछे वाले तो हवा से बातें कर रहे हैं, अपनी खाल बचाने को तिलमिला रहे हैं, तू क्यों पत्थर की मूरत बना खड़ा है?” लड़के की रीढ़ की हड्डी पर लाठी का दूसरा निशान छप चुका था, पर उसके चेहरे पर एक आतिशी मुस्कान थी। लड़के के शरीर ने कराहते हुए मगर बुलंद आवाज़ में जवाब दिया, “भागे तो वो, जिसके पास खोने के लिए अभी कुछ बचा हो। तुम मेरी जिन हड्डियों को तोड़ने आई हो, वो कागज़ी डिग्रियों का बोझ सहते-सहते पहले ही जर्जर हो चुकी हैं। मारो, कि तुम्हारी ये कठोरता शायद मेरी आत्मा के इस खालीपन को कुछ देर के लिए भर दे।”read more:https://worldtrustednews.in/suheldevs-legacy-was-not-their-choice-they-preferred-the-ghazi-miyan-fair-and-that-is-why-the-opposition-met-its-downfall-cm-yogi/लाठी ने गुस्से और तिलमिलाहट में एक और करारा वार उसकी छाती पर किया, लेकिन लड़का अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ, जैसे कोई जिद्दी खंभा। लाठी ने फिर फुसफुसाकर कहा, “तुझे दर्द नहीं होता क्या? मेरी एक-एक चोट से इंसान गिरकर घुटने टेक देता है, रोते-रोते अपनी माँ को याद करता है। तू किस मिट्ठी का बना है भाई?” लड़के के जिस्म से बहते खून ने उस पुरानी सड़क को रंगना शुरू कर दिया था। उसने एक भारी साँस ली और गहरी उपेक्षा से कहा, “दर्द? दर्द तो तब होता था जब हर सुबह रिजेक्शन लेटर आता था और बाप की बूढ़ी आँखें मुझसे नज़रें चुराती थीं। यह लाठी तो मेरे बेकारी के उस अंतहीन अवसाद से बहुत हल्की है। यह खाकी का डंडा तो मुझे बस यह एहसास दिला रहा है कि मैं अभी ज़िंदा हूँ, मरा नहीं हूँ।”अब लाठी चलाने वाले का हाथ भी थकने लगा था और डंडे की चमड़ी पर भी लड़के के पसीने और खून की नमी आने लगी थी। लाठी अब प्रहार नहीं कर रही थी, बल्कि वो खुद उस लड़के के अडिग ज़मीर के आगे काँप रही थी। लाठी ने सहमकर कहा, “तू मुझे हरा रहा है दोस्त! मैं सरकार की ताकत का प्रतीक होकर भी आज तेरे सामने लाचार हूँ। तेरे इस निहत्थे जिस्म ने मेरी कड़क को मोम बना दिया है। बता, तू चाहता क्या है? यह सत्ता का तंत्र बहुत क्रूर है, यह तुझे इतिहास के पन्नों में एक मामूली गिट्टी की तरह कुचल देगा।” लड़के ने फटी हुई कमीज़ से अपने माथे का पसीना और खून पोंछा, उसकी आँखों में पूरे देश के बेबस युवाओं का दर्द छलक आया। वह बोला, “मैं कुछ माँगने नहीं आया हूँ। मैं तो बस इस तंत्र के मुँह पर अपनी लाचारी की वसीयत लिखने आया हूँ।”इस अद्भुत और रोंगटे खड़े कर देने वाले संग्राम में ऐसा लगा मानो लाठी अब छटपटाने लगी हो। उसने रुँधे गले से कहा, “तू रोता क्यों नहीं? अगर तू एक बार रो दे, चीख पड़े, तो शायद यह खाकी हाथ रुक जाएँ, शायद यह तमाशा खत्म हो जाए!” लड़के ने एक कड़वी, कलेजे को चीरने वाली हँसी हँसते हुए कहा, “रोऊँ? अब तो आँखों के सारे आँसू ज़माने की बेरुखी में सूख चुके हैं। हमारी आँखों में अब आँसू नहीं, तेज़ाब बहता है। अगर आज रो दिया, तो मेरी हार नहीं होगी, इस देश के हर उस लड़के की हार होगी जो सुबह चार बजे उठकर दौड़ लगाता है और रात को भूखे पेट सोता है। तुम मारते रहो, तुम्हारी लाठी टूट जाएगी, सिपाही की कलाई में ऐंठन आ जाएगी, पर मेरी इस चमड़ी के नीचे जलती आग कभी नहीं बुझेगी।”सूरज ढल रहा था और जंतर-मंतर की सड़क पर एक सन्नाटा पसार गया। लाठी अब पूरी तरह से बेदम होकर ज़मीन पर टिक चुकी थी और लड़का वहीं खड़ा था—घायल, लहूलुहान, मगर पूरी तरह अजेय। लाठी ने टूटते हुए आखिरी बार फुसफुसाया, “तू जीत गया भाई, मेरी लकड़ी की अकड़ तेरे हाड़-मांस के सब्र के आगे हार गई।” लड़के ने आसमान की तरफ देखा, जहाँ शाम का धुंधलका गहरा रहा था। उसने अपने टूटे हुए कंधों को सीधा किया और मुस्कुराते हुए मन ही मन कहा,’यह देश भी कितना अजीब है, जहाँ युवाओं को अपना वजूद साबित करने के लिए डिग्रियां नहीं, पुलिस की लाठियों के निशान दिखाने पड़ते हैं।’

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