परोसा गया शून्य

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
पेट की अपनी कोई भाषा नहीं होती, बस एक आदिम जिद होती है जो आंतों के गलियारों में डमरू बजाती रहती है। वह जो हलवाई की दुकान पर खड़ा लड़का है, उसकी आंखों में समोसों के प्रति प्रेम नहीं, बल्कि एक दार्शनिक विराग है। वह जानता है कि तेल में छनती हुई हर टिकिया दरअसल एक देह का रूपांतरण है। लोग कहते हैं भूख मिटती है, पर सच तो यह है कि भूख केवल अपना चोला बदलती है। कभी वह रोटी बनकर थाली में सजती है, तो कभी महत्वाकांक्षा बनकर तिजोरी में दुबक जाती है। “क्या देख रहे हो?” मैंने उस लड़के से पूछा। उसने बिना पलक झपकाए कहा, “साहब, देख रहा हूँ कि लोग आटे की गोलियां निगल रहे हैं या अपनी ही उम्र चबा रहे हैं।” उसकी बातों में वो सादगी थी, जो सीने को चीर देती थी।read more:https://pahaltoday.com/today-bjp-state-president-pankaj-chaudhary-will-interact-with-the-workers/शहर की चमचमाती सड़कों पर गाड़ियां नहीं, बल्कि सुलगती हुई जरूरतें दौड़ रही थीं। एक सफेदपोश सज्जन अपनी मर्सिडीज से उतरे और फुटपाथ पर बैठे फकीर से पूछने लगे, “तुम्हें सबसे ज्यादा क्या चाहिए?” फकीर ने अपनी झुर्रियों में फंसी मुस्कान को बाहर निकाला और बोला, “साहब, भूख के भी व्याकरण होते हैं। किसी को सत्ता की भूख है, किसी को प्रशंसा की, किसी को बस एक ऐसे सन्नाटे की जिसमें वह खुद को सुन सके।” सज्जन ठिठक गए। उन्हें लगा जैसे उनकी मर्सिडीज का इंजन अचानक उपनिषदों की भाषा बोलने लगा है। भूख दरअसल एक शून्य है, जिसे भरने के लिए इंसान पूरी कायनात को निगल जाना चाहता है, फिर भी वह रिक्त ही रहता है। यह मर्म की वह परत है जहाँ पहुँचकर हर तर्क हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता है।शाम ढलते ही रेस्तरां की मेजों पर छुरी-कांटे चलने लगे। मांस के लोथड़ों को काटते हुए लोगों के चेहरों पर जो हिंसक तृप्ति थी, वह किसी युद्ध की विजय से कम न थी। “यह मटन बहुत स्वादिष्ट है,” एक युवती ने कहा। उसके सामने बैठे युवक ने ठंडी आह भरी, “स्वाद केवल जीभ का धोखा है, असल में हम अपनी ही मृत्यु को थोड़ा और स्वादिष्ट बनाने की कोशिश कर रहे हैं।” वहाँ बैठे हर शख्स की अपनी एक अलग भूख थी—कोई अपने अकेलेपन को रायते में घोल रहा था, तो कोई अपनी असफलताओं को तंदूरी रोटी के साथ चबा रहा था। भूख की इस दुनिया में रोटी केवल अनाज का टुकड़ा नहीं, बल्कि अस्तित्व की सबसे बड़ी शर्त बन चुकी थी। एक कोने में बैठा वृद्ध कवि अपनी खाली प्लेट को ऐसे देख रहा था जैसे उसमें कोई ब्रह्मांडीय रहस्य छिपा हो। मैंने करीब जाकर पूछा, “बाबूजी, कुछ मँगवाऊँ?” उन्होंने सिर उठाया, उनकी आँखों में वह पानी था जो नसों से नहीं, बल्कि आत्मा के सूखे कुएं से निकला था। “बेटा, मैंने पूरी उम्र शब्दों को खाया है, और अब शब्द मुझे खा रहे हैं। यह जो पेट की आग है न, यह श्मशान की आग से अधिक पवित्र है क्योंकि यह जीवित रहने का प्रमाण मांगती है।” उनकी आवाज़ में वह पीड़ा थी जो किसी सिसकते हुए सितार से निकलती है। भूख और भक्ति के बीच गजब की जुगलबंदी चल रही थी। हर निवाला एक आहुति थी और हर डकार एक प्रार्थना। शहर के सबसे बड़े रईस ने अपनी वसीयत में लिखा था कि मरने के बाद उसके मुँह में गंगाजल नहीं, बल्कि एक सूखी रोटी का टुकड़ा रखा जाए। लोग हतप्रभ थे। जब वह अंतिम यात्रा पर निकला, तो भीड़ में वही हलवाई का लड़का और फकीर भी थे। सब चुप थे, मानो कोई मौन संगीत बज रहा हो। वह रईस जो दुनिया की हर मेज का मालिक था, आज एक ऐसी भूख लेकर जा रहा था जिसका कोई अंत नहीं था। फूलमालाएं अब बोझ लग रही थीं और मंत्रोच्चार किसी भूखे पेट की गुड़गुड़ाहट जैसा सुनाई दे रहा था। समाज की इस विद्रूपता पर हँसने वाला कोई नहीं था, क्योंकि हर कोई उसी कतार में खड़ा था, अपनी-अपनी थाली में शून्य परोसे हुए।श्मशान के बाहर एक पागल मिट्टी के ढेले बना-बनाकर खा रहा था। मैंने उसे रोका, “यह क्या कर रहे हो? बीमार पड़ जाओगे।” उसने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, “साहब, लोग मरने के बाद इसी मिट्टी में मिल जाते हैं न? मैं बस उन पुरखों को चख रहा हूँ जिन्होंने पूरी जिंदगी पकवान खाए थे। मैं देखना चाहता हूँ कि क्या अमीर की मिट्टी का स्वाद गरीब की मिट्टी से अलग होता है?” उसकी बात सुनकर मेरे भीतर का ‘मैं’ जीते जी मर गया। उस पागल के हाथ में मिट्टी नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का सारांश था। हम जिसे भूख समझ रहे थे, वह दरअसल ईश्वर का वह सबसे बड़ा मज़ाक था, जिसे हम आज तक डकार नहीं पाए।

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