वॉर स्ट्रेस : युद्ध की बेचैनी में जीते 55 करोड़ लोगों की संतापभरी दुनिया

स्नेहा सिंह 

21वीं सदी में टेक्नोलाझजी का ऐसा अभूतपूर्व विकास हुआ है कि एक क्लिक में सारी सुविधाएं मिल जाती हैं। रोजमर्रा की जरूरतों की सारी सहूलियतें स्मार्टफोन से जुड़ चुकी हैं। मिनटों में तैयार भोजन, घर का सामान, कपड़े, जूते, क्या नहीं मिलता? लेकिन शांति आनलाइन आर्डर नहीं की जा सकती। सुविधाएं बेशक बढ़ी हैं, पर 21वीं सदी में मानसिक अशांति बढ़ी है, हर पल बेचैनी बढ़ी है। धैर्य खत्म हो रहा है। छोटी-छोटी बात पर चिढ़ जाने वाला इंसान एक क्षण भी मोबाइल के बिना अकेला नहीं रह सकता। दुनिया भर में पहले कभी न हुई इतनी मानसिक समस्याएं पैदा हुई हैं। कैरियर की दौड़ में सफल होने की होड़ में बेचैनी बढ़ती जा रही है। शायद इंसान ने शांति के बदले सुविधा का सौदा किया है। बदली हुई लाइफस्टाइल के कारण आई व्यग्रता, अनिश्चित भविष्य की लगातार चिंता, नौकरी-धंधे में लगातार प्रतिस्पर्धात्मक माहौल, ज्यादा कमाई पाने के लिए क्षमता से अधिक काम, व्यक्तिगत संबंधों में आने वाले उतार-चढ़ाव, पारिवारिक संबंधों में घटती सहनशीलता, बदलता मौसम, कम हुई नींद, आर्थिक-सामाजिक कारण, अकेलापन, सोशल मीडिया के कारण लगातार दूसरों से होती तुलना जैसे अनेक कारणों से आज दुनिया में 200 करोड़ लोग तनाव में जी रहे हैं। कुछ तनाव अस्थाई होते हैं। कोई मानसिक पीड़ा देने वाली परिस्थिति पैदा हो तो तनाव आता है और फिर उससे व्यक्ति अपने आप बाहर निकल जाता है। 100 करोड़ से अधिक लोगों को गंभीर मानसिक व्याधि है और उनमें से 36 करोड़ तो अत्यंत गंभीर मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं, फिर भी उपचार केवल 27 प्रतिशत लोगों को ही मिलता है। क्रॉनिक स्ट्रेस से हर साल डेढ़ लाख लोगों की मौत होती है। वैश्विक स्तर पर लगभग सात लाख लोग आत्महत्या कर लेते हैं और उसमें डिप्रेशन, बेचैनी खलनायक की भूमिका में हैं।read more:https://pahaltoday.com/kgmc-team-inspected-the-arrangements-of-jal-jeevan-mission-in-jarota/
तनाव की ऐसी साइलेंट महामारी जैसी भयावह तस्वीर और तनाव बढ़ाने वाले अनेक कारणों के बीच महाशक्तियों की सत्ता-भूख ने एक और कारण जोड़ दिया है युद्ध। दुनिया में सैकड़ों सैनिकों और करोड़ों लोगों को युद्ध का तनाव होता है। इस वॉर स्ट्रेस से मानसिक बेचैनी बढ़ी है। युद्ध मोर्चे पर लगातार तैनात रहने वाले हजारों सैनिक हर साल तनाव से आत्महत्या करते हैं। आमने-सामने के हमलों में परिवारजन खो देने वाले कितने ही लोग आजीवन बेचैनी में जीवन बिताते हैं। इस वर्ष अमेरिका-ईरान, इजरायल-हमास, इजरायल-हिजबुल्लाह, रूस-यूक्रेन, अफगानिस्तान-पाकिस्तान के युद्ध दुनिया में ज्यादा चर्चा में रहे, लेकिन उसके अलावा एक-दो नहीं, 120 सशस्त्र लड़ाइयां दुनिया में चल रही हैं। दुनिया भर में दो देशों के बीच 45 लड़ाइयां चल रही हैं। यूएन मान्य देशों के बीच झगड़ा हो तो उसे अंतरराष्ट्रीय सैन्य विवाद कहा जाता है। सीरिया तो अमेरिका-रूस, ईरान जैसे कई देशों की रणभूमि है। हूती विद्रोही लगातार अमेरिका, इजरायल को निशाना बनाते हैं, इसलिए लाल सागर का मार्ग खूनी बन गया है। मिडिल ईस्ट के देशों में सर्वाधिक विद्रोही समूह सक्रिय हैं। कुर्द विद्रोही तुर्की के खिलाफ मोर्चा खोलते रहते हैं। बलूच पाकिस्तान के खिलाफ दशकों से युद्धरत हैं। अलकायदा, लश्कर-ए-तैयबा, इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकी संगठन हमले करके पूरी दुनिया में खून बहाते हैं। मिडिल ईस्ट के बाद अगर कोई सबसे ज्यादा सुलगता भूभाग है तो वह अफ्रीका है। अफ्रीका के अलग-अलग देशों में लगभग 35 सशस्त्र संघर्ष चल रहे हैं। उनमें से कई अंतरराष्ट्रीय स्तर के नहीं हैं, इसलिए ज्यादा चर्चा नहीं होती। इनमें से कई आंतरिक झगड़े हैं, लेकिन उनमें लाखों निर्दोष लोगों का खून बह रहा है। अलग-अलग लड़ाइयों में ढाई लाख लोग जान गंवा चुके हैं और लाखों घायल हुए हैं। कुछ रिपोर्टों में तो युद्ध का शिकार बनने वालों का आंकड़ा 10 लाख तक बताया जाता है। युद्ध के कारण करोड़ों लोग बेघर हो जाते हैं। कुछ बदनसीब लोगों को रातोंरात पलायन करना पड़ता है। उनकी संपत्ति नष्ट कर दी जाती है, इसलिए उन्हें दूसरे देशों में जान बचाकर भागना पड़ता है। दो-एक वर्षों में 4.24 करोड़ लोग युद्धों के कारण बेघर हुए हैं और अब जान जोखिम में डालकर किसी दूसरे देश में शरण खोज रहे हैं। 21वीं सदी में युद्धों के कारण दर-दर भटकने वाले लोगों का कुल आंकड़ा 12 करोड़ तक पहुंच चुका है। ऐसे युद्धों-अशांति-अराजकता-हिंसा के बीच जो मानसिक पीड़ा होती है, उसे पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसआर्डर कहा जाता है। दुनिया में इस प्रकार की बेचैनी लेकर जीने वाले लोगों का आंकड़ा दिन-ब-दिन बहुत बड़ा होता जा रहा है। 1930 के बाद तनाव की परिभाषा बनी थी। उसके लक्षण पहचाने जाने लगे थे। उससे प्रेरित होकर दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान पहली बार सैनिकों में वॉर स्ट्रेस की चर्चा हुई थी। वर्षों तक युद्ध मोर्चे पर रहने वाले सैनिकों में डिप्रेशन का प्रमाण देखा गया था। बहुत से सैनिक लगातार युद्ध की स्थिति, हिंसा और मृत्यु देखकर आत्महत्या कर लेते थे। लंबे युद्ध से लौटे ब्रिटेन के डेढ़ लाख सैनिकों का मानसिक समस्याओं का उपचार करना पड़ा था।read more;https://pahaltoday.com/cdos-intensive-inspection-strict-instructions-on-quality-nutrition-and-cleanliness-in-schools/उस समय सैनिकों को होने वाले मानसिक विकार को ही वॉर स्ट्रेस कहा जाता था। कई देशों की सेनाओं में तो सैनिक आत्महत्या कर ले तो उसे कमजोर मन की निशानी माना जाता था। उच्च सैन्य अधिकारी सैनिकों की मानसिक स्थिति की पूरी तरह उपेक्षा करते थे। मनोविज्ञान उस दौर में विकसित हो रहा था। कई मनोवैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि मानसिक तनाव झेल रहे सैकड़ों सैनिक दुश्मनों के सामने मौत को गले लगा लेते थे। वर्षों तक युद्ध मोर्चे पर रहने से उनमें जीवन जीने का उत्साह ही मर चुका था।जब सैनिकों के तनाव की ही खास चर्चा नहीं होती थी, तब नागरिकों को कैसी मानसिक यातना झेलनी पड़ती है, उसकी कहां से चर्चा होती? विश्वयुद्ध के बाद कोरियन वॉर और वियतनाम वॉर में नागरिकों की बेचैनी देखकर मनोवैज्ञानिकों ने निष्कर्ष दिया कि सैनिकों के अलावा नागरिक भी वॉर स्ट्रेस का शिकार बनते हैं।
21वीं सदी में पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसआर्डर का शिकार बने 10 से 18 वर्ष के 35 करोड़ लोगों को बचा लिया गया। 2001 से 2025 के दौरान इसी आयु वर्ग के एक करोड़ लोगों को वॉर स्ट्रेस की पीड़ा झेलनी पड़ी थी और उनमें से चार लाख ने इस तनाव में जान गंवा दी थी। 10 लाख पर युद्ध का आजीवन असर रह गया। अचानक भागना पड़ा या परिवार खो दिया, उसका दुख वे कभी भूल नहीं सके। युद्धग्रस्त क्षेत्रों की कुल आबादी में 26 प्रतिशत लोग वॉर स्ट्रेस का शिकार बनते हैं। इस औसत से देखें तो ईरान की आबादी के ढाई करोड़ लोग आज की तारीख में वॉर स्ट्रेस का शिकार बने होंगे। 20वीं सदी में भले वॉर स्ट्रेस की खास चर्चा नहीं होती थी, फिर भी प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध, उसके बाद कोल्ड वॉर का तनाव, इजरायल-अरब देशों के युद्ध, भारत-चीन, भारत-पाकिस्तान, उत्तर और दक्षिण कोरिया की लड़ाई जैसे अनेक युद्धों के कारण उस समय की 80 प्रतिशत आबादी को युद्ध का डर रहता था। 21वीं सदी में भले 80 प्रतिशत आबादी युद्ध के डर में नहीं जीती, फिर भी इस समय दुनिया में चल रही लड़ाइयों का असर विश्व की कुल आबादी के 25 प्रतिशत पर पड़ता है। 200 करोड़ से अधिक लोग हमले के खतरे के बीच जी रहे हैं और उनमें से 52-55 करोड़ लोग वॉर स्ट्रेस का शिकार बने हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून, लगातार चलती शांति वार्ताएं भी करोड़ों लोगों का तनाव कम नहीं कर पा रही हैं, यह 21वीं सदी के मनुष्य की बदकिस्मती कही जाएगी। 20वीं सदी 25 वर्ष की हुई तब तक एक विश्वयुद्ध हो चुका था। ढाई करोड़ लोग उस युद्ध में मारे गए थे। 21वीं सदी के ढाई दशकों में एक करोड़ से अधिक लोगों की जान युद्ध ले चुका है। 20वीं सदी में 20 करोड़ लोगों ने युद्धों में जान गंवाई थी। 21वीं सदी में उसका पुनरावर्तन न हो तो अच्छा। इस सदी में सुविधा के साथ मानसिक संताप इंसान का पीछा नहीं छोड़ेगा, ऐसा लगता है! 21वीं सदी शांत-सलामत है? कनाडा में जन्मे और अमेरिका में बसे विख्यात मनोवैज्ञानिक-भाषाशास्त्री स्टीवन पिंकर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में ह्यूमन साइकोलाजी पढ़ाते हैं। उन्होंने 2011 में लंबे रिसर्च के बाद द बेटर एंजल्स आफ अवर नेचर : व्हाय वायलेंस हैज डिक्लाइंड नामक पुस्तक लिखी थी। उसमें मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि दुनिया में पिछली सदियों की तुलना में आज ज्यादा शांति-सुरक्षा-सुखसमृद्धि है। उन्होंने 19वीं और 20वीं सदी के युद्धों के आंकड़े इकट्ठे करके कहा था कि पहले एक लाख लोगों में 300 लोग युद्ध में मारे जाते थे। कोरियन युद्ध, वियतनाम वॉर, ईरान-इराक या गल्फ देशों के तनाव के समय यह आंकड़ा घटकर डबल डिजिट में पहुंचा था। यह आंकड़ा 21वीं सदी में औसतन एक लाख लोगों में सिंगल डिजिट तक सीमित हो गया है। 21वीं सदी में एक लाख में एक व्यक्ति युद्ध में मारा जाता है। पिछले एक दशक में और खासकर पिछले पांच वर्षों में जिस तरह दुनिया में तनाव बढ़ा है और युद्धों में मृत्यु संख्या बढ़ रही है, उसे देखते हुए यह औसत खतरे में पड़ गया है। कल्पना कीजिए! अगर आज शांति-सुरक्षा है तो पिछली सदियाँ कैसी भयावह रही होंगी?

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