अनिकेत सिंह
क्या दुनिया एक और भूराजनीतिक टकराव की ओर बढ़ रही है? ईरान और वेनेजुएला के बाद अब क्या क्यूबा अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताओं के केंद्र में आ गया है? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हालिया बयान ने इन सवालों को फिर से चर्चा में ला दिया है। ट्रम्प ने संकेत दिया है कि भविष्य में क्यूबा में अमेरिकी हस्तक्षेप की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि उनकी पहली पसंद शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन होगी, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर अन्य विकल्प भी खुले हैं। इसी टिप्पणी ने अंतरराष्ट्रीय हलकों में नई बहस छेड़ दी है। क्यूबा अमेरिका के फ्लोरिडा तट से केवल 90 मील दूर स्थित है। यही भौगोलिक निकटता उसे अमेरिकी रणनीतिक चिंताओं के केंद्र में रखती है। शीत युद्ध के दौरान क्यूबा मिसाइल संकट ने दुनिया को परमाणु युद्ध के मुहाने तक पहुंचा दिया था। आज परिस्थितियां भले बदल गई हों, लेकिन अमेरिका की सुरक्षा और प्रभाव क्षेत्र को लेकर उसकी सोच में बहुत बदलाव नहीं आया है। वाशिंगटन नहीं चाहता कि उसके पड़ोस में ऐसी राजनीतिक व्यवस्था मजबूत हो, जो उसके प्रभाव को चुनौती दे सके।ट्रम्प समर्थकों का तर्क है कि क्यूबा की मौजूदा व्यवस्था लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि अमेरिका लोकतंत्र के नाम पर अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करना चाहता है। इसलिए बहस केवल राजनीतिक व्यवस्था की नहीं, बल्कि प्रभाव और नियंत्रण की भी है। ट्रम्प स्वयं को हमेशा ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं, जो जटिल समस्याओं का समाधान निकाल सकता है। क्यूबा उनके लिए सिर्फ विदेश नीति का विषय नहीं, बल्कि एक राजनीतिक अवसर भी है। यदि वहां किसी प्रकार का परिवर्तन होता है तो उसे वे अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं। इससे यह संदेश भी जाएगा कि जहां पूर्ववर्ती अमेरिकी प्रशासन सफल नहीं हुए, वहां उन्होंने परिणाम हासिल किए। आर्थिक दबाव का बढ़ता दायरा अमेरिका लंबे समय से क्यूबा पर विभिन्न आर्थिक प्रतिबंध लागू किए हुए है। हाल के महीनों में दबाव और बढ़ाया गया है। नए प्रतिबंध, वित्तीय गतिविधियों की निगरानी और राजनीतिक दबाव के जरिए वाशिंगटन ऐसी परिस्थितियां बनाने का प्रयास कर रहा है, जिनसे सरकार पर दबाव बढ़े और जन असंतोष उभरे। यही रणनीति पहले वेनेजुएला के मामले में भी देखी गई थी, आर्थिक दबाव, राजनीतिक अलगाव और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश। क्यूबा को लेकर अमेरिकी चिंता केवल उसकी आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं है। इसके पीछे बड़ा भूराजनीतिक समीकरण भी काम करता है। अमेरिका नहीं चाहता कि रूस या चीन कैरेबियन क्षेत्र में अपनी रणनीतिक उपस्थिति मजबूत करें। वाशिंगटन की नजर में यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है। किसी प्रतिद्वंद्वी शक्ति की अमेरिकी सीमा के निकट बढ़ती सक्रियता भविष्य में चुनौती बन सकती है। इसलिए क्यूबा का मुद्दा अक्सर मास्को और बीजिंग से जुड़ जाता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका वास्तव में सैन्य कार्रवाई पर विचार कर रहा है? फिलहाल इसका कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है। ट्रम्प ने युद्ध की घोषणा नहीं की, लेकिन सैन्य विकल्पों से इनकार भी नहीं किया। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे बयान अक्सर दबाव की रणनीति का हिस्सा होते हैं। उनका उद्देश्य विरोधी पक्ष को यह संदेश देना होता है कि यदि परिस्थितियां नहीं बदलीं तो आगे और कठोर कदम उठाए जा सकते हैं।read more:https://pahaltoday.com/the-strait-of-hormuz-will-not-be-opened-by-agreement-alone-removing-marine-mines-will-take-time/कई विश्लेषकों के अनुसार ट्रम्प की नीति वेनेजुएला मडल से प्रभावित दिखाई देती है, दबाव बढ़ाना, अलग-थलग करना और राजनीतिक परिवर्तन की मांग को मजबूत करना। हालांकि क्यूबा की राजनीतिक संरचना, अंतरराष्ट्रीय संबंध और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वेनेजुएला से अलग हैं। इसलिए वहां किसी भी बड़े परिवर्तन की प्रक्रिया आसान नहीं होगी। अभी न तो किसी सैन्य अभियान की घोषणा हुई है और न ही युद्ध की स्थिति बनी है। फिर भी ट्रम्प के बयान ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या अमेरिका अपने पड़ोस में बड़ा राजनीतिक बदलाव चाहता है? क्या क्यूबा पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव और बढ़ेगा? या यह केवल दबाव की कूटनीति है? इन सवालों के जवाब भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि क्यूबा एक बार फिर अमेरिकी विदेश नीति के केंद्र में आ गया है। और जब अमेरिका, क्यूबा, रूस और चीन एक ही समीकरण में दिखाई दें, तो दुनिया की नजरें स्वाभाविक रूप से उसी दिशा में टिक जाती हैं। अब देखना यह है कि ट्रम्प की यह चेतावनी केवल राजनीतिक संदेश साबित होती है या कैरेबियन में किसी बड़े भूराजनीतिक संघर्ष की प्रस्तावना बनती है।