स्नेहा सिंह
पिछले कुछ वर्षों में केरल में ऐसे युवाओं की संख्या लगातार बढ़ी है, जो स्वयं नशीले पदार्थों के आदी हैं और प्रतिबंधित मादक एवं मनोत्तेजक पदार्थों की तस्करी में भी शामिल हो रहे हैं। लगभग एक दशक पहले शराब पर नियंत्रण और प्रतिबंध संबंधी नीतियों के बाद राज्य में ड्रग्स की ओर बढ़ते रुझान के संकेत स्पष्ट होने लगे थे। लेकिन अब समस्या और गंभीर हो गई है, क्योंकि सिंथेटिक ड्रग्स के तस्कर कानून प्रवर्तन एजेंसियों से बचने के लिए डिजिटल तकनीक और सोशल मीडिया का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं। इस जानलेवा लत का दायरा अब दक्षिण भारत के अन्य राज्यों तक भी फैलने लगा है।रोजगार महत्वपूर्ण है, लेकिन युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए समय पर रोजगार उससे भी अधिक जरूरी है। जब युवाओं को रोजगार नहीं मिलता, तो वे भटकने लगते हैं। इसी भटकाव के दौरान उनका सामना ड्रग्स तस्करों से हो जाता है। ड्रग माफिया की कार्यप्रणाली के अनुसार पहले बेरोजगार और भटकते युवाओं को अच्छी नौकरी का लालच दिया जाता है।
इसके बाद असली खेल शुरू होता है। उन्हें कूरियर जैसी डिलीवरी का काम सौंपा जाता है, जिसके बदले उन्हें पैसे मिलने लगते हैं। धीरे-धीरे वे स्वयं भी नशे के आदी बन जाते हैं। यहीं से एक खतरनाक दुष्चक्र की शुरुआत होती है।read more:https://khabarentertainment.in/cattle-found-below-standards-and-shortage-of-fodder-observed-during-sdms-surprise-inspection/
कोविड-19 प्रभावित वर्ष 2020-21 के दौरान राज्य में एनडीपीएस कानून के तहत दर्ज मामलों की संख्या में कमी आई थी, लेकिन 2022 में यह संख्या बढ़कर 26,619 हो गई, जबकि 2021 में यह 5,695 थी। वर्ष 2025 में यह आंकड़ा फिर बढ़कर 36,314 तक पहुंच गया। इस दौरान बड़ी मात्रा में तस्करी किए गए मादक पदार्थ भी जब्त किए गए। राज्य की व्यापारिक राजधानी एर्नाकुलम इस समस्या का प्रमुख केंद्र बनी हुई है।कई एजेंसियों के प्रयासों के बावजूद सफलता सीमित रही है। यूडीएफ सरकार ने जून में ‘ऑपरेशन तूफान’ शुरू कर अपने ड्रग विरोधी अभियान को अधिक संगठित और समन्वित बनाने का प्रयास किया।इस पहल के तहत राज्य पुलिस ने दक्षिण भारत के अन्य राज्यों की पुलिस, केंद्रीय एजेंसियों तथा राज्य के शिक्षा, स्वास्थ्य और आबकारी विभागों के साथ मिलकर काम किया। इसके बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। दूसरी ओर ड्रग माफिया भारी मुनाफा कमा रहे हैं और उनका भूमिगत नेटवर्क लगातार फैलता जा रहा है। सरकार की कार्रवाई कछुए की गति से चल रही है, जबकि ड्रग माफिया चीते की रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं।एक समय पंजाब की भी यही स्थिति थी। आज पंजाब में रासायनिक उर्वरकों से उगाए गए गेहूं के कारण कैंसर के मामलों में चिंताजनक वृद्धि हुई है और बड़ी संख्या में युवा ड्रग्स के जाल में फंस चुके हैं।समन्वित कार्रवाई, जनभागीदारी, नशा पीड़ितों के पुनर्वास तथा त्वरित एवं प्रभावी अभियान पर ध्यान केंद्रित करते हुए केरल सरकार ने 15 जुलाई तक लगभग 7,100 मामलों में 7,600 से अधिक ड्रग तस्करों को गिरफ्तार किया है।इनमें अधिकांश बरामदगी सिंथेटिक मादक पदार्थों की रही। चूंकि फोरेंसिक जांच में देरी के कारण कई बार मादक पदार्थों से जुड़े मामलों की सुनवाई प्रभावित होती है, इसलिए वर्तमान अभियान में इस पहलू पर विशेष ध्यान दिया गया है।मादक पदार्थों के तस्करों का नेटवर्क इतना जटिल होता है कि जांच प्रायः केवल छोटे अपराधियों तक ही सीमित रह जाती है। सरकार अब जांच एजेंसियों और समाज को ‘तूफान योद्धा’ के रूप में एकजुट करने का प्रयास कर रही है। साथ ही इस अभियान का उद्देश्य NCORD ढांचे के अंतर्गत राष्ट्रीय खुफिया सूचना साझा करने और समन्वय प्रणाली को मजबूत करना है, जिसमें गिरफ्तार नार्को अपराधियों के NIDAAN डेटाबेस का भी उपयोग किया जा रहा है। विभिन्न खुफिया एजेंसियां भी सरकार को छापेमारी और गिरफ्तारियों में महत्वपूर्ण सहयोग दे रही हैं।फिर भी केरल के युवाओं को ड्रग्स की गिरफ्त से बाहर निकालना आसान नहीं है। केरल के गृह मंत्री रमेश चेन्नीथला संयुक्त प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों से मुलाकात कर रहे हैं। बेहतर समन्वय के लिए राज्य नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की प्रक्रिया में हैं और एक साझा प्लेटफार्म भी विकसित किया जा रहा है।चूंकि ये अवैध गिरोह अपने नेटवर्क के विस्तार, तस्करों की भर्ती, समन्वय और डिलीवरी के लिए लगातार नई तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं, इसलिए आवश्यक है कि केरल अपनी जिला नारकोटिक्स विरोधी स्पेशल एक्शन फोर्स (DANSAF) के कर्मियों के कौशल को नवीनतम मानकों के अनुरूप उन्नत करे। साथ ही इन मामलों की जांच और अभियोजन में किसी भी प्रकार की बाधा न आए, इसके लिए साइबर फोरेंसिक क्षमताओं को मजबूत बनाना भी उतना ही आवश्यक है।