डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
वह जो कमरे के कोने में रखी मेज पर चाय की प्याली से उठती हुई भाप है न, वह असल में भाप नहीं है। वह मेरे भीतर बची हुई आखिरी गर्माहट का वेंटिलेटर है। लोग कहते हैं कि मैं बदल गया हूँ, थोड़ा बहुत ख़राब हो गया हूँ। पर सच मानिए, इस चमचमाती, सलीके से इस्त्री की हुई दुनिया में थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए। अगर आप बिल्कुल ठीक हैं, तो यकीन मानिए आप किसी कारखाने में बने प्लास्टिक के पुतले हैं, जिसमें दिल की जगह बस एक खाली खोखलापन धड़कता है।मैं एक दफ्तर में काम करता हूँ। दफ्तर क्या है, एक आलीशान कब्रगाह है जहाँ हर सुबह जिंदा लोग अपनी लाशें लेकर हाजिरी लगाने आते हैं। मेरे बॉस, तिवारी जी, एक ऐसे जीव हैं जिनकी मुस्कान देखकर लगता है जैसे किसी गिद्ध ने अभी-अभी एक ताज़ा शिकार देखा हो। उनकी आँखों में फाइलों के पन्ने तैरते हैं और ज़ुबान पर सिर्फ एक ही तकियाकलाम रहता है, “मैनेज करो।”मैंने भी मैनेज करना सीख लिया था। इतना मैनेज किया कि अपनी रीढ़ की हड्डी को रबर का बना दिया। जब वे डांटते, मैं मुस्कुराता। जब वे चाय मंगाते, मैं बिस्कुट का पैकेट भी अपनी जेब से खोल देता। मैं इस सड़ी हुई व्यवस्था का सबसे बेहतरीन, सबसे ‘सच्चा’ और सबसे ‘सफल’ पुर्जा बन चुका था। घर पर बूढ़ी माँ खांसती रहती, तो मैं कहता, “माँ, थोड़ा मैनेज करो, इस महीने टारगेट पूरा नहीं हुआ तो इंसेंटिव नहीं मिलेगा।” पत्नी की आँखों में जब मायूसी का कुहरा जमता, तो मैं उसे ईएमआई के नए वाशिंग मशीन का सपना चखा देता। मैं बिल्कुल ठीक था। मशीन की तरह परफेक्ट।फिर एक दिन वह हुआ, जिसने मेरी ‘परफेक्ट’ जिंदगी में पहला छेद किया।दफ्तर की इमारत के ठीक बाहर, उस चिलचिलाती धूप में जहाँ तारकोल पिघल रहा था, एक पिल्ला कंक्रीट के मलबे के नीचे दबा हुआ था। उसकी टांग टूट चुकी थी।read more:https://pahaltoday.com/a-unique-initiative-by-the-teachers-of-pm-shri-samvilian-vidyalaya-to-show-family-like-affection-towards-the-students/ वह रो नहीं रहा था, बस उसकी आँखें किसी मूक गवाह की तरह इंसानी बस्तियों को देख रही थीं। लंच ब्रेक में सब तमाशा देख रहे थे। कोई वीडियो बना रहा था, कोई कह रहा था, “नगर निगम वाले कितने लापरवाह हैं।”तिवारी जी ने खिड़की से थूकते हुए कहा, “छोड़ो यार, दुनिया में रोज हज़ारों मरते हैं। अपना काम देखो।”मैंने भी अपनी टाई सीधी की और मुड़ने लगा। लेकिन तभी उस पिल्ले की धुंधली होती आँखों में मुझे अपनी माँ की खाँसी, अपनी पत्नी की खामोशी और अपनी खुद की मर चुकी आत्मा का चेहरा दिखाई दे गया। लगा जैसे कोई भीतर से चीख रहा हो कि अगर आज नहीं रुके, तो तुम सचमुच ‘वो’ हो जाओगे, यानी हमेशा के लिए पत्थर।मैंने दौड़कर उस मलबे को हटाया। नुकीले पत्थरों ने मेरी उंगलियों को चीर दिया। खून की लाल धार मेरी सफेद कमीज के कफ पर फैल गई, ठीक वैसे ही जैसे किसी कोरे कागज पर बदनामी की स्याही गिरती है। मैंने उस कीचड़ और खून से सने जीव को छाती से लगा लिया।दफ्तर में सन्नाटा पसर गया। तिवारी जी का चेहरा ऐसा हो गया जैसे उन्होंने रसगुल्ले की जगह नीम का पत्ता चबा लिया हो। उन्होंने चिल्लाकर कहा, “पागल हो गए हो? तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है! क्लाइंट मीटिंग है तुम्हारी पांच मिनट में।”मैंने मुस्कुराकर कहा, “हाँ सर, थोड़ा बहुत खराब तो होना ही चाहिए।”उस दिन मेरी नौकरी चली गई। शाम को जब मैं घर लौटा, तो हाथ में न तो सैलरी का चेक था और न ही तरक्की का लेटर। था तो बस एक लंगड़ाता हुआ पिल्ला और फटी हुई कमीज। रास्ते भर लोग मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैं कोई जीता-जागता अजूबा हूँ।घर का दरवाजा खुला। माँ व्हीलचेयर पर बैठी थी। पत्नी ने जब मुझे इस हाल में देखा, तो उसकी आँखों में आंसू आ गए। उसने मुझसे यह नहीं पूछा कि नौकरी का क्या हुआ या अब घर का खर्च कैसे चलेगा। उसने बस आगे बढ़कर मेरे खून से सने हाथों को अपने आंचल से पोंछना शुरू कर दिया।”तुम बहुत खराब हो गए हो,” उसने रोते हुए मुस्कुराकर कहा।”हाँ,” मैंने उसकी आँखों के समंदर में डूबते हुए कहा, “क्योंकि जब तक अच्छा था, तब तक तुम दोनों की तकलीफें मुझे दिखाई ही नहीं देती थीं।”उस रात, पहली बार महीनों बाद मुझे नींद आई। सिरहाने वो पिल्ला सोया था, जो अब पूरी तरह सुरक्षित था। बाहर तेज बारिश हो रही थी, जैसे आसमान इस शहर के सारे ‘अच्छे और संस्कारी’ पाखंडियों के पाप धो रहा हो। मैं नौकरी हार चुका था, समाज की नजरों में एक नाकाम और ‘खराब’ इंसान बन चुका था, लेकिन खिड़की से आती ठंडी हवा जब मेरे चेहरे को छूकर गुजरी, तो मेरे भीतर का इंसान जी उठा था।अजीब सौदा है न इस दुनिया का? यहाँ इंसान बने रहने के लिए आपको थोड़ा सा खराब होना पड़ता है। सो, मैं थोड़ा सा खराब हो गया। और यकीन मानिए, इस सड़े हुए समाज के मुहावरे में नाकामयाब होकर, अंदर से जिंदा रहने का जो सुकून है, वो दुनिया के किसी भी कामयाब पुर्जे के हिस्से में कभी नहीं आ सकता।