वीरेंद्र बहादुर सिंह
सरकारी दफ्तरों में ऐसा माहौल था, मानो किसी की शादी हो रही हो।एक अधिकारी ने कहा, “बॉस के लिए 35 लाख रुपए वाली कार हमें छह महीने पहले खरीदनी थी, लेकिन तब आर्डर रोक दिया था। अब नई कार का आर्डर दे दो।”क्लर्क ने पूछा, “नई कार का बजट कितना रखें?”अधिकारी झल्लाते हुए बोला, “अरे मूर्ख, अब युद्ध खत्म हो गया है। पेट्रोल-डीजल के भंडारण पर लगी पाबंदियां हट गई हैं। जितने चाहो उतने गैस सिलेंडर देने की घोषणा भी हो चुकी है। अरे भाई, हॉर्मुज की खाड़ी फिर से खुल गई है, तो अब नई-नई गाड़ियां खरीदो। युद्ध से पहले साहब के लिए 35 लाख की कार लेनी थी, अब युद्ध के बाद 45 लाख वाली मंगाओ।”क्लर्क बोला, “साहब, लेकिन वह जो नया सर्कुलर आया था कि अब पेट्रोल की जगह केवल ईवी (इलेक्ट्रिक) कार ही खरीदी जाएगी, उसका क्या करेंगे?”अधिकारी बोला, “अरे मेरे भोले भाई, अगर सब लोग ईवी चलाने लगेंगे, तो सरकार का एक लीटर पेट्रोल में पौना लीटर एथेनॉल मिलाने का इरादा कैसे पूरा होगा? पेट्रोल वाली ही गाड़ी मंगाओ।”उधर दूसरे सरकारी आफिस में भी खूब हलचल मची हुई थी। सचिव मंत्रीजी से पूछने आए, “सर, आपको गांव में पानी की टंकी के चबूतरे की पहली ईंट रखने के भूमिपूजन कार्यक्रम में जाना है। काफिले में कितनी गाड़ियां रखी जाएं?”मंत्रीजी ने गला साफ करते हुए पूछा, “युद्ध से पहले मेरे काफिले में कितनी गाड़ियां होती थीं?”सचिव ने कहा, “साहब, पहले आपके काफिले में कुल 27 गाड़ियां चलती थीं। फिर मितव्ययिता के उपाय घोषित हुए तो उन्हें घटाकर 24 कर दिया गया था।”मंत्रीजी फिर गला साफ करते हुए बोले, “तो अब मेरे काफिले में 37 गाड़ियां रखो। मुझे कोई ज्यादा ठाठबाट का शौक नहीं है, लेकिन जनता को यह संदेश तो मिलना चाहिए कि अब किफायत के दिन खत्म हो गए हैं।”इतने में मंत्रीजी की धर्मपत्नी आ गईं। उन्होंने कहा, “मैं सोच रही थी कि अगर आपके ट्रंप साहब अब खुश हों, तो हम भी सोना खरीदना शुरू कर दें?”read more:https://pahaltoday.com/on-the-147th-foundation-day-of-the-bjp-workers-lit-lamps-and-paid-tribute-to-great-men/
मंत्रीजी भावुक होकर बोले, “सिर्फ हमारे ही नहीं, तुम्हारे भी नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के ट्रंप साहब अब पूरी तरह खुश हैं। तुम तुरंत जाओ और चंदन हार बनवा लो।”फिर उन्होंने सचिव से कहा, “जरा सर्राफा व्यापारियों के संगठन से बात करके मेरा सार्वजनिक सम्मान समारोह रखवाइए। वहां मैं घोषणा कर दूंगा कि विश्व मंच पर देश का प्रभाव बनाए रखने के लिए सोना खरीदना कितना जरूरी है।”हालांकि, एक दूसरे सरकारी आफिस में माहौल थोड़ा तनावपूर्ण था। बॉस ने घोषणा की, “अब किफायत के दिन खत्म हो गए हैं, इसलिए पूरे साल में जितने विदेश दौरे करने थे, वे सब मैं अगले एक महीने में ही कर लूंगा। तैयारियां शुरू कर दो।”लेकिन उनका अकाउंट आफिसर उदास चेहरा लेकर आया। उसने कहा, “बॉस, विदेश यात्राओं के लिए बजट निकालना थोड़ा मुश्किल हो रहा है।”बॉस ने पूछा, “क्यों? क्या तुम भी इजराइल की तरह चाहते हो कि युद्ध चलता ही रहे?”अकाउंट आफिसर बोला, “सर, ऐसी बात नहीं है। लेकिन आपके विदेश दौरों के लिए जो बजट बचाकर रखा था, वह सारा ‘किफायत अभियान’ का प्रचार करने के लिए इन्फ्लुएंसर्स से ढेर सारी रीलें बनवाने में खर्च हो गया।”बॉस ने लंबी सांस लेते हुए कहा, “जाने दो, वैसे भी इस समय यूरोप में बहुत गर्मी है। फिर कभी चले जाएंगे।”(किफायत तो सरकार को केवल कुछ समय के लिए करनी थी। आम जनता के हिस्से में तो युद्ध से पहले भी और युद्ध के बाद भी, हमेशा किफायत से जीना ही लिखा है।)