krishna kumar tiwari
धरती की यह चीख किसी दूर के भविष्य की चेतावनी नहीं है, यह हमारे वर्तमान की हकीकत है।यदि हमने आज अपनी जीवनशैली, अपनी नीतियों और अपनी प्राथमिकताओं को नहीं बदला, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। भारत निश्चित रूप से जलवायु आपातकाल की दहलीज़ पर खड़ा है, और इस दहलीज़ को पार करके तबाही की ओर बढ़ने से रोकने की ज़िम्मेदारी हम सबकी है। सरकार को जहां बड़े नीतिगत बदलाव करने होंगे, वहीं आम नागरिकों को भी ‘कंज्यूमरिज्म’ (अंधाधुंध उपभोक्तावाद) को छोड़कर ‘सस्टेनेबिलिटी’ (सतत जीवन शैली) को अपनाना होगा। पानी की हर बूंद को बचाना, पेड़ लगाना और कचरे का सही प्रबंधन करना अब विकल्प नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व की शर्त बन चुका है।प्रकृति ने हमें जीवन दिया है; अब समय आ गया है कि हम प्रकृति को जीवन दें। धरती की चीख को सुनिए, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।आज जब हम इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में जी रहे हैं, तो प्रकृति केवल बदलाव के संकेत नहीं दे रही, बल्कि वह ज़ोर-ज़ोर से चीख रही है। कभी भीषण गर्मी से पिघलती सड़कें, कभी शहरों को डुबाती अप्रत्याशित बाढ़, तो कभी बंजर होते खेत—यह सब इस बात का प्रमाण हैं कि पर्यावरण का संतुलन पूरी तरह डगमगा चुका है। दुनिया के सबसे घने बसे भूभागों में से एक, हमारा देश भारत, आज इस संकट के केंद्र में खड़ा है।ऐसे में यह सवाल उठाना बेहद लाज़मी और गंभीर हो जाता है कि: क्या भारत जलवायु आपातकाल की दहलीज़ पर खड़ा है?
– बदलती ऋतुएँ और टूटते रिकॉर्ड: एक कड़वी हकीकत
भारत की पहचान छह ऋतुओं वाले देश के रूप में रही है, लेकिन अब यह चक्र पूरी तरह बिगड़ चुका है। सर्दियां छोटी और कम ठंडी हो रही हैं, जबकि गर्मियां न केवल लंबी हो रही हैं बल्कि जानलेवा स्तर तक पहुंच चुकी हैं। हाल के वर्षों में भारत के कई शहरों में तापमान ने 48°C से 50°C के आंकड़े को छू लिया है। ‘हीटवेव’ (लू) अब केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दक्षिण और तटीय इलाकों को भी झुलसा रही है। जब हम “गीले बल्ब के तापमान”) की बात करते हैं—जो गर्मी और उमस का वह खतरनाक संयोजन है जहां इंसानी शरीर पसीने के ज़रिये खुद को ठंडा नहीं रख पाता—तो भारत के कई हिस्से उस सीमा को पार करने के करीब पहुंच रहे हैं। यह स्थिति केवल असुविधाजनक नहीं, बल्कि जानलेवा है।read more:https://pahaltoday.com/district-supply-officer-inspected-the-farmer-registry-camp/
– पानी का संकट: कहीं सूखा, कहीं सैलाब-जलवायु परिवर्तन का सबसे सीधा और क्रूर प्रहार भारत के जल चक्र पर हुआ है। भारत आज एक अजीबोगरीब विरोधाभास से जूझ रहा है—एक तरफ देश का एक बड़ा हिस्सा सूखे और पानी की किल्लत से तड़प रहा है, तो दूसरी तरफ अचानक आने वाली बाढ़ पूरे के पूरे शहरों को मलबे में तब्दील कर रही है।
- ग्लेशियरों का पिघलना: हिमालय, जिसे दुनिया का “तीसरा ध्रुव” कहा जाता है, बहुत तेज़ी से पिघल रहा है।गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी सदानीरा (हमेशा बहने वाली) नदियों को पानी देने वाले ये ग्लेशियर अगर इसी रफ्तार से सिकुड़ते रहे, तो आने वाले दशकों में उत्तर भारत में पानी का भयंकर अकाल पड़ सकता है।अतिवृष्टि और शहरों का डूबना: मॉनसून का मिजाज पूरी तरह बदल गया है। अब पूरे महीने की बारिश महज दो या तीन दिनों में हो जाती है। मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु और दिल्ली जैसे महानगर हर साल “शहरी बाढ़ का शिकार हो रहे हैं, जिससे अरबों रुपये का नुकसान होता है और जनजीवन ठप हो जाता है।
भारत की आत्मा गांवों में बसती है और हमारी आधी से अधिक आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है। जलवायु परिवर्तन सीधे तौर पर भारत की खाद्य सुरक्षा पर हमला कर रहा है।जब मॉनसून देरी से आता है या ज़रूरत से ज़्यादा बरस जाता है, तो फसलें बर्बाद हो जाती हैं। बेमौसम ओलावृष्टि और चक्रवातों ने किसानों की कमर तोड़ दी है। गेहूं और धान जैसी मुख्य फसलों की उत्पादकता में कमी आने की आशंका बढ़ गई है। यदि तापमान में इसी तरह वृद्धि होती रही, तो देश में भुखमरी और कुपोषण का संकट गहरा सकता है। किसान कर्ज के जाल में फंस रहे हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था खोखली हो रही है।जलवायु परिवर्तन केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है, यह एक बहुत बड़ा सामाजिक और आर्थिक संकट भी है। समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण भारत के तटीय इलाके, जैसे कि सुंदरबन का क्षेत्र, धीरे-धीरे डूब रहे हैं।वहां रहने वाले हजारों लोग अपनी ज़मीन खो चुके हैं और शहरों की तरफ पलायन करने को मजबूर हैं।
इसी तरह, बुंदेलखंड जैसे इलाकों से सूखे के कारण बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है। इन लोगों को ‘जलवायु शरणार्थी’ कहा जाता है।जब लाखों लोग अपने घरों को छोड़कर शहरों की गंदी बस्तियों में रहने को मजबूर होंगे, तो इससे शहरों के संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा और सामाजिक तनाव पैदा होगा।लेकिन क्या यह काफी है? ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है:कंक्रीट के जंगल: हमारे शहरों का विकास पर्यावरण को ताक पर रखकर हो रहा है। आर्द्रभूमि तालाब और जंगलों को काटकर बहुमंजिला इमारतें बनाई जा रही हैं, जो बाढ़ और गर्मी को और बढ़ाती हैं। नीतियों और क्रियान्वयन में अंतर: कागज़ पर कड़े कानून होने के बावजूद नदियों में प्रदूषण, अवैध खनन और पेड़ों की कटाई धड़ल्ले से जारी है।
– आपातकाल की घोषणा की ज़रूरत“जलवायु आपातकाल” घोषित करने का मतलब केवल डराना नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य पूरी प्रशासनिक व्यवस्था और समाज को युद्ध स्तर पर काम करने के लिए प्रेरित करना है। जब किसी देश में वित्तीय या सुरक्षा आपातकाल लगता है, तो सारे संसाधन उस समस्या को सुलझाने में लगा दिए जाते हैं। ठीक वैसी ही गंभीरता हमें पर्यावरण के प्रति दिखानी होगी।