परिंदा और दरिंदा

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
हल्की-हल्की बारीश के बीच नामपल्ली के चौराहे पर उस्मान भाई के होटल की उस पाया-टूटी बेंच पर बैठकर जब मैं अमजद भाई और उनकी बेगम शकीला का वो पूरा माजरा देख रहा था, तो कसम खुदा की, मेरे कलेजे में एक अजीब सा हौल उठ गया था। लगा कि इस बैंगन की मेरी दुनिया में कोई एक मर्द तो मिला जिसके गुर्दे में सच बोलने का दम है, जिसने ज़माने की परवाह किए बिना अपनी रूह की आवाज़ सुनी। अमजद भाई ने जो बात बोली थी, वो सीधे सीने को चीरती हुई आर-पार हो गई थी, मानो किसी ने जलते हुए कोयले पर ठंडे पानी के छींटे मार दिए हों। पर मियाँ, ये हमारा मुल्क है, यहाँ सच का तमाशा देखने सब जमा हो जाते हैं, लेकिन जब उसी सच की हिफ़ाज़त करने की बारी आती है, तो सब अपने-अपने घरों के किवाड़ बंद कर लेते हैं। यहाँ सच को जितनी जल्दी लोग ‘किरकिरी’ करके तालियों के शोर में आसमान पर चढ़ाते हैं, उतनी ही जल्दी उसे सियासत की सूली पर भी लटका देते हैं। खैर, अमजद भाई के उस फैसले के बाद शकीला भाभी का वो काली चादर का साया तो हमेशा के लिए छूट गया, मानो किसी परिंदे को जिंदगी भर के पिंजरे से रिहाई मिल गई हो। वो खुले सर, कजरारे नैनों में थोड़ी सी झिझक और ढेर सारी शर्म लिए राशन की दुकान से लेकर तरकारी मंडी तक दिखने लगीं, जहाँ उनकी खुली ज़ुल्फ़ें हवा में आज़ादी का कसीदा पढ़ती थीं। शुरुआत में तो मोहल्ले के रऊडीशीटरों ने आँखें तरेरीं, बुड्ढियों की कानाफूसी का बाज़ार गर्म हुआ। नौजवानों की नज़रों में आवारागर्दी की नई चमक दिखाई देने लगी। पर धीरे-धीरे लोगों ने इसे अमजद भाई का भेजा सरक गया है सोचकर हजम कर लिया, क्योंकि इस शहर में लोग हर रोज़ एक नया तमाशा देखते हैं और पुराने को भूल जाते हैं। हमारे इलाक़े के बड़े नेता जी, जिन्हें लोग ‘छोटे नेता जी’ कहते थे क्योंकि बड़े वाले तो सीधे मलाई डकारते थे, वो हाथ जोड़े, कड़क इस्त्री का कुर्ता चमकाते हुए हमारी तंग गली में पधारे। उनके साथ चार-छह चमचे थे, जो बात-बात पर ऐसे आवाज़ाँ लगाते थे कि उनके हलक में कोई पुराना भोंपू फिट हो, जो सिर्फ़ आक़ा की तारीफ़ में ही बजना जानता हो। नेता जी की नज़र सीधे अमजद भाई के मकान पर पड़ी, जहाँ वो बरामदे में बैठे हुए एक पुराना अखबार पढ़ रहे थे, मानो दुनिया की हलचल से बेखबर अपनी ही धुन में मशगुल हों। नेता जी ने लपककर उनके हाथ थाम लिए और अपनी बनावटी बत्तीसी चमकाते हुए बोले, “अरे अमजद भाई! आप तो शेर-ए-दकन निकले मियाँ, वो जो कॉलेज-वॉलज में हिजाब को लेकर रोज़ का किच-किच चल रहा है न, उसमें आपका मिसाल तो हमें हर स्टेज पर देना चाहिए। आपने पुरानी तौर-तरीकों की बेड़ियाँ काट दीं, देश को आप जैसे ‘प्रोग्रेसिव’ लोगों की बहुत ज़रूरत है, आप ही तो इस बेकार दुनिया के असली चराग़ हो।read more:https://pahaltoday.com/major-changes-in-india-in-12-years-welfare-of-poor-and-deprived-sections-pm-modi/#google_vignette” अमजद भाई ने अखबार नीचे किया, उनकी आँखें, जिन्हें ज़माना पागल कहता था, इस समय बर्फ़ की तरह ठंडी और गहरी थीं, जिनमें सामने खड़े नेता का खोखलापन साफ़ झलक रहा था। उन्होंने नेता जी का हाथ आहिस्ते से झटक दिया और अपनी मँजी हुई दकनी ज़बान में बोले, “नेता जी, मैंने अपनी बेगम का नकाब अपनी अकल से हटवाया, क्योंकि मुझे यह दोगलापन और दिखावा पसंद नहीं था, इसका आपके इलेक्शन और आपकी इस गंदी सियासत से क्या लेना-देना?” नेता जी हर तालाब का पानी पिए हुए घाघ सियासतदान थे, ऐसे झटकों से उनका सफ़ेद कुर्ता मैला नहीं होता था, बल्कि उनकी मुस्कुराहट और गहरी हो जाती थी। वो बोले, “अरे मियाँ, तुम सीधे-साधे आदमी हो, तुम इस खेल की बारीकियों को नहीं समझोगे, ये भाईचारे और क़ौमी एकता का मामला है। स्कूल-कॉलेज में सब एक जैसे दिखने चाहिए, सब एक रंग में ढलेंगे, तभी तो हमारा ये मुल्क आगे बढ़ेगा, सेक्युलरिज्म इसी चिड़िया का नाम है।” तभी घर के भीतर से शकीला भाभी पानी का गिलास लेकर आईं, उनका सर खुला था और माथे पर शिकन की ऐसी लकीरें थीं जो साफ़ कह रही थीं कि यह सो कॉल्ड आज़ादी उन्हें अंदर ही अंदर दीमक की तरह खाए जा रही है। नेता जी ने पानी का गिलास लिया, एक घूँट भरा और उनकी तरफ़ देखकर बोले, “देखा! यही तो असली आज़ादी है, अब आप बिल्कुल ,हमारे जैसी दिखती हैं।” ‘हमारे जैसी’ ये दो लफ़्ज़ सुनते ही अमजद भाई के चेहरे का खून सूख गया, मानो किसी ने उनके ज़मीर पर तेज़ाब की बूंदें गिरा दी हों।नेता जी तो पानी पीकर अपनी पलटन के साथ आगे बढ़ गए, लेकिन शाम को चारमीनार के पास बने मैदान में एक बहुत बड़ी रैली होना था। मैं भी वहाँ पहुँच गया, जहाँ लाउडस्पीकर अपनी पूरी ताक़त से चीख रहे थे और नेता जी स्टेज पर दहाड़ रहे थे, “भाइयों और बहनों! तालीम के उजले पन्नों पर ये मजहब का रंग नहीं चलेगा, हमें बराबरी चाहिए। हमारे इलाक़े के अमजद भाई ने अपनी बेगम का पर्दा हटाकर ये साबित कर दिया कि नई सोच क्या होती है, हम ऐसी चीज़ों को हमेशा के लिए नेस्तनाबूद कर देंगे।” भीड़ ने तालियाँ पीटीं, ‘क्या बात है’ के नारे लगे और सद्भावना के नाम पर नफ़रत का ऐसा तगड़ा लेप लगाया जा रहा था कि लग रहा था सारा शहर इसी उजाले में जलकर राख हो जाएगा। अगले दिन सुबह-सुबह पूरे महल्ले में कब्रिस्तान जैसा सन्नाटा पसरा था, पुलिस के सायरन गूँज रहे थे और हवा में बारूद की बू थी। पता चला कि रात को किसी दूसरी पार्टी के गुंडों ने, जिन्हें इस ‘बराबरी’ से अपनी सियासत का सूपड़ा साफ़ होता दिख रहा था, उन्होंने अमजद भाई के घर पर पत्थरों की भारी बारिश कर दी थी और गली के नुक्कड़ पर खड़े लोग फुसफुसा रहे थे कि अमजद ने अपनी रवायतों का जनाज़ा निकाला है।मैं नंगे पैर भागता हुआ अमजद भाई के घर पहुँचा, दरवाजे पर काँच के टुकड़े ऐसे बिखरे थे जैसे किसी की पाक उम्मीदों के जनाज़े के फूल हों, जो पैरों के नीचे आकर किरकिरा रहे थे। अमजद भाई आँगन में चुपचाप बैठे थे, और शकीला भाभी कोने में घुटनों में सिर दिए इस कदर सिसक रही थीं कि पत्थरों का दिल भी पिघल जाए, उनके रोने की आवाज़ हवा में मिलकर एक अजीब सी मरसिया बन चुकी थी। मैंने कांपती आवाज़ में पूछा, “अमजद भाई, ये क्या गज़ब हो गया, आपने तो जो किया, वो हक था, फिर ये बेगुनाही की सज़ा क्यों?” अमजद भाई ने सिर उठाया, उनकी आँखों में वो पुराना ग़ुस्सा नहीं था, बल्कि एक रूह कँपा देने वाला खालीपन था, वो हँसे, एक ऐसी हँसी जो रोने से ज़्यादा डरावनी और कलेजा चीरने वाली थी। वो रुआंसी आवाज़ में बोले, “मियाँ! इस मुल्क में जब कोई औरत अपनी मर्जी से या अपने शौहर के कहने पर पर्दा हटाती है, तो वो आज़ाद नहीं होती, वो सिर्फ़ एक पार्टी के पोस्टर का चेहरा बन जाती है। और जब वही औरत डर के मारे दोबारा खुद को छुपाना चाहती है, तो वो दूसरी पार्टी का ,वोट बैंक बन जाती है। यहाँ औरत की ज़ात कोई इंसान नहीं है मियाँ… वो सिर्फ़ चुनाव की होर्डिंग है।”इतना कहकर अमजद भाई उठे, उनके पैर ऐसे भारी थे जैसे मौत की तरफ़ बढ़ रहे हों, उन्होंने अंदर जाकर कमरे का संदूक खोला और जब बाहर आए, तो उनके हाथों में एक नया, लंबा, स्याह सूती दुपट्टा था। उन्होंने वो कपड़ा अपनी जार-जार रोती हुई बेगम की तरफ़ बढ़ा दिया, तो बेगम ने भीगी आँखों से, हिचकियाँ लेते हुए देखा और पूछा, “ये क्या है, आपने ही तो कहा था कि अब कभी खुद को कैद मत करना?” अमजद भाई ने आसमान की तरफ़ देखा, जहाँ सूरज की रोशनी पत्थरों के टुकड़ों पर खून की तरह चमक रही थी, और कांपती आवाज़ में बोले, “ओढ़ लो बेगम… ओढ़ लो, कल तक तुम सिर्फ़ मेरी शरीक-ए-हयात थीं, तो मैंने हक़ से तुम्हारा नकाब हटवा दिया था, लेकिन आज तुम इस पूरे देश की सियासत का अखाड़ा बन चुकी हो। कल तक तुम्हारी जंग सिर्फ़ मुझसे थी, आज तुम्हारी जंग इस पूरे समाज के दरिंदों से है, मैं तुम्हें पाखंड से तो बचा सकता हूँ, लेकिन इन भेड़ियों के जबड़ों से नहीं बचा सकता। स्कूल, कॉलेज और इस संसद में जब तक ये लोग बराबरी का नौटंकी करेंगे, तब तक तुम जैसी चिड़ियों को इसी पिंजरे में दम तोड़ना पड़ेगा, ओढ़ लो… कम से कम ये पत्थर सीधे तुम्हारे चेहरे को तो लहूलुहान नहीं करेंगे।” उनकी बीवी ने कांपते, ठंडे पड़ चुके हाथों से वो कपड़ा दोबारा अपने सर पर डाल लिया और वो कजरारे नैन फिर से उस अंधेरी चादर के पीछे दफ़न हो गए। अमजद भाई ने मेरी तरफ़ देखा, उनकी आँखों से आँसू का एक कतरा टपका और बोले, “चलो मियाँ, आटो का टाइम हो गया होगा, काम पे नहीं जाना है क्या?” मैं बुत बना खड़ा रहा, सियासत का धंधा चमक चुका था, मजहब के ठेकेदार जीत चुके थे और वो परिंदा जो अभी उड़ना सीख ही रहा था, फिर से एक बेजान परछाई बन चुका था, क्योंकि जब पिंजरा ही जान बचाने की आख़िरी गारंटी बन जाए, तो परिंदा खुद अपने हाथों से अपने पर कतर लेता है और उम्र भर की ख़ामोशी ओढ़ लेता है।

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