स्नेहा सिंह
पुणे में जन्मी सुष्मिता कनेरी को उनके माता-पिता ने बचपन से ही कड़ी मेहनत और आत्मनिर्भरता के संस्कार दिए थे। उन्होंने पुणे के विश्वकर्मा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की, लेकिन उनके मन में एक दुविधा थी। इसका कारण यह था कि वह स्कूल के दिनों से ही छोटे-बड़े सामाजिक कार्यों में सक्रिय थीं। जब वह स्कूल में कक्षा मॉनिटर थीं, तब सहपाठियों से धन एकत्र कर पांच सौ रुपए जुटाए और एक अनाथालय को दान दिए थे। ऐसे सेवा कार्यों के कारण उनमें आम लोगों के संघर्षों और समस्याओं के प्रति जागरूकता आई तथा संस्थाओं के साथ मिलकर समाजसेवा करने की इच्छा भी विकसित हुई।
साल 2020 में जब वे सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनीं, तब उनके पास नौकरी का प्रस्ताव था, लेकिन स्थिर कैरियर चुनने के बजाय उन्होंने 2021 में ‘गुल्लक’ नामक क्राउडफंडिंग प्लेटफ़ॉर्म शुरू किया। उन्होंने सोचा कि भारत की समृद्ध, लेकिन धीरे-धीरे लुप्त होती कलाओं के लिए कुछ किया जाना चाहिए। इसी दौरान 2021 में उन्हें तेलंगाना जाने का अवसर मिला, जहां वे निर्मल कला के कारीगरों से मिलीं। निर्मल कला चार सौ वर्ष पुरानी चित्रकला परंपरा है। इसमें सागौन (टीकवुड) पर नक्काशी करके उसमें रंग भरे जाते हैं। पूरी प्रक्रिया अत्यंत जटिल होती है, लेकिन इसकी कीमत बहुत कम आंकी जाती है। इस कला के कारीगरों के चेहरों पर निराशा साफ दिखाई देती थी। जब सुष्मिता ने एक कारीगर से पूछा कि क्या वह अपने बेटे को इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करेगा, तो उसने क्रोधित होकर कहा कि वह चाहता है कि उसका बेटा कोई अच्छी नौकरी करे। उसी क्षण सुष्मिता कनेरी को महसूस हुआ कि भारत की इन कलाओं और कारीगरों को सशक्त बनाने की आवश्यकता है। इस अनुभव ने उन्हें लुप्त होती कलाओं को समझने के लिए भारत-यात्रा करने के लिए प्रेरित किया। भारत भ्रमण के बाद उन्होंने 2023 में ‘गुल्लाकारी’ की स्थापना की। इसके माध्यम से वह कारीगरों को ग्राहकों से जोड़ने, उनकी आजीविका को बेहतर बनाने और लुप्तप्राय कलाओं के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने का कार्य करती हैं। उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश की थोलू बोम्मालता कला, जिसमें चमड़े से नृत्य करती कठपुतलियां बनाई जाती हैं। सुष्मिता ने इन कारीगरों को कॉरपोरेट ग्राहकों के लिए थ्री-डी मुद्रित लोगो वाले लैंपशेड बनाने का प्रशिक्षण दिया। वे तकनीक का उपयोग किसी कला को बदलने के लिए नहीं, बल्कि उसे आधुनिक समय के अनुरूप अधिक प्रासंगिक बनाने के लिए करती हैं। थोलू बोम्मालता में पहले बकरी की खाल का उपयोग होता था, लेकिन अब उसके स्थान पर पर्यावरण-अनुकूल सामग्री का उपयोग किया जाता है। हालांकि इसके लिए कारीगरों को समझाना आसान नहीं था। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ की कावड़ कला के आज केवल दस-बारह कारीगर ही बचे हैं और वे भी साठ वर्ष से अधिक आयु के हैं। कावड़ कला में पौराणिक कथाओं को चित्रों के माध्यम से दर्शाया जाता है।read more:https://pahaltoday.com/american-president-under-siege/ इस कला को संरक्षित करने के लिए क्यूआर कोड जोड़े गए, जिनकी सहायता से दर्शक प्रत्येक पैनल को स्कैन करके उसकी कहानी सुन सकते हैं। इस प्रकार प्राचीन शिल्प को डिजिटल कहानी-कथन से जोड़ दिया गया। सुष्मिता का मानना है कि कॉरपोरेट संस्थाएं भी अपनी यात्रा और इतिहास को कावड़ कला के माध्यम से प्रस्तुत कर सकती हैं। निर्मल चित्रकला, थोलू बोम्मालता, कावड़ कला के अलावा वह मध्य प्रदेश की गोंड कला, पश्चिम बंगाल की टेराकोटा कला, ताड़ के पत्तों और घास से टोपी व टोकरियां बनाने की बुनाई कला, राजस्थान की मिनिएचर कला तथा कर्नाटक की चित्रा कला जैसी अनेक पारंपरिक कलाओं को बचाने का प्रयास कर रही हैं। उन्होंने महाराष्ट्र के समुद्री तटवर्ती क्षेत्रों में रहने वाले कटकरी आदिवासी समुदाय की महिलाओं को मोमबत्तियां बनाना सिखाया। साथ ही आदिवासी संस्कृति को दर्शाने वाली मोमबत्तियां तैयार करना और टिकाऊ पैकेजिंग करना भी सिखाया। आज वहाँ की अनेक महिलाएं प्रति माह तीन से चार हजार रुपए कमा रही हैं और उनकी आंखों में उज्ज्वल भविष्य के सपने हैं। सुष्मिता कनेरी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कारीगर समुदाय अपनी कला अगली पीढ़ी को सौंपने में हिचकिचाता है, क्योंकि उन्हें डर है कि इससे आर्थिक स्थिरता नहीं मिलेगी। हालांकि अब स्थिति बदल रही है। गुल्लाकारी आज नौ राज्यों में तेरह लुप्तप्राय कलाओं के संरक्षण के लिए काम कर रही है। पिछले दो वर्षों में सौ कारीगरों को स्थाई आय मिलने लगी है। लगभग एक हजार कारीगर इससे जुड़े हुए हैं। तेरह से अधिक कंपनियां उनके साथ जुड़ी हैं और बड़े पैमाने पर कॉरपोरेट गिफ्टिंग के ऑर्डर भी मिल रहे हैं। इन कलाओं का उपयोग टेबलवेयर, पेन स्टैंड, स्टेशनरी, लैंपशेड, ऑर्गेनाइजर, कोस्टर, डायरी और टोट बैग बनाने में किया जाता है, जिनकी कीमत 25 रुपए से लेकर 2,000 रुपए तक होती है। वह कार्यशालाओं का आयोजन भी करती हैं, जिनमें कारीगर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। आज उनका वार्षिक कारोबार लगभग पचास लाख रुपए का है। शुरुआती दिनों को याद करते हुए सुष्मिता कहती हैं कि उनके माता-पिता चाहते थे कि वह कोई नौकरी करें, लेकिन वे तकनीकी शिक्षा का उपयोग सामाजिक परिवर्तन के लिए करना चाहती थीं। आज 26 वर्ष की आयु में मिली उनकी सफलता पर उनके माता-पिता को गर्व है।