सॉफ्ट पोर्न बन रहा है सोशल मीडिया

वीरेंद्र बहादुर सिंह
अभी व्हाट्सऐप यूजर्स का मामला शांत भी नहीं हुआ था कि सरकार ने मेटा कंपनी को इंस्टाग्राम पर अश्लील कंटेंट के मामले में नोटिस थमा दिया। इंस्टाग्राम पर बालयौन शोषण से जुड़े कंटेंट वाला एक विज्ञापन (ऐड) जारी हुआ था। इस विज्ञापन में रेप वीडियो और चाइल्ड पोर्न वीडियो जैसे प्रतिबंधित एवं आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। इसके दृश्य भी निर्धारित मानदंडों का उल्लंघन करते थे। एक मीडिया हाउस ने इस संबंध में शिकायत भी की थी, लेकिन शुरुआत में इंस्टाग्राम ने यह कहकर कोई कार्रवाई नहीं की कि ‘ऐड में कुछ भी गलत नहीं है।’यह विज्ञापन ऐसा था कि उस पर क्लिक करते ही उपयोगकर्ता बेहद सस्ते दाम पर पोर्न वीडियो खरीद सकता था। विज्ञापन पर क्लिक करते ही यूजर को टेलीग्राम या अन्य थर्ड पार्टी प्लेटफार्म पर भेज दिया जाता था, जहां उसे कम कीमत में पोर्न कंटेंट खरीदने के आफर दिए जाते थे। मात्र इंस्टाग्राम ही नहीं, लगभग हर सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अश्लील, घटिया और घृणा पैदा करने वाला कंटेंट बेधड़क अपलोड किया जा रहा है। फालोअर्स बढ़ाने की होड़ में कुछ लोग उत्तेजना पैदा करने वाला कंटेंट पोस्ट कर रहे हैं और सोशल मीडिया का एल्गोरिदम उसे तेजी से फैलाता है।इंस्टाग्राम के रिकमेंडेशन एल्गोरिदम ने ऐसे संवेदनशील और अवैध वीडियो को प्रमोट करने में भी बड़ी भूमिका निभाई। जांच में यह भी सामने आया कि केवल एक नहीं, बल्कि 30 से अधिक ऐसे विज्ञापन प्रदर्शित हो रहे थे। कितने लोगों ने इन विज्ञापनों पर क्लिक किया और कितनों ने पोर्न कंटेंट खरीदा, इसका आधिकारिक विवरण सामने नहीं आया है। हालांकि माना जा रहा है कि बड़ी संख्या में लोगों ने इन पर क्लिक किया होगा। टेलीग्राम पहले से ही ऐसे मामलों को लेकर बदनाम रहा है। अपने बचाव में टेलीग्राम ने कहा कि उसने अपने प्लेटफार्म से 2,74,000 से अधिक ग्रुप और चैनल हटा दिए हैं। सवाल यह नहीं है कि कितने हटाए गए, बल्कि यह है कि अब भी ऐसे कितने ग्रुप और चैनल सक्रिय हैं।सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) मंत्रालय ने मेटा को भेजे गए नोटिस में सवाल उठाया है कि जब इंस्टाग्राम आटोमेटेड सेफ्टी और कंटेंट माडरेशन सिस्टम के दावे करता है, तो फिर इतनी संवेदनशील सामग्री वाले विज्ञापन को मंजूरी कैसे मिल गई? सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के अनुसार सीएसएएम (CSAM—Child Sexual Abuse Material) का प्रसार गंभीर अपराध है। सरकार ने इसी संबंध में मेटा से जवाब मांगा है।मेटा का कहना है कि ऐसे सभी विज्ञापनों को तत्काल ब्लाक कर दिया गया है। कंपनी का यह भी कहना है कि अपराधी उसकी सुरक्षा व्यवस्था को चकमा देने के लिए लगातार नए-नए तरीके अपनाते रहते हैं। लेकिन इस तर्क का सीधा अर्थ यही निकलता है कि कंपनी की सुरक्षा व्यवस्था अभी भी पूरी तरह प्रभावी नहीं है। यह कंटेंट माडरेशन सिस्टम की विफलता भी मानी जाएगी। अब देखना यह है कि मेटा क्या जवाब देता है और सरकार इस मामले में आगे क्या कदम उठाती है।read more:https://pahaltoday.com/aarohi-became-dm-for-a-day-boosted-the-morale-of-the-girl-students/0।सोशल मीडिया पर अश्लील कंटेंट की भरमार जो विवाद सामने आया है, वह एक खास तरह के विज्ञापनों को लेकर है। इसके अलावा भी लगभग हर सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अश्लील कंटेंट की भरमार देखने को मिलती है। सोशल मीडिया पर उपलब्ध अश्लील सामग्री को मोटे तौर पर चार भागों में विभाजित किया जा सकता है।पहला है न्यूडिटी और सेक्सुअल कंटेंट। सोशल मीडिया पर अपलोड होने वाले कंटेंट का एक बड़ा हिस्सा इसी श्रेणी का होता है। कई बार इसे देखकर ऐसा लगता है मानो कोई पोर्न साइट देख रहे हों।दूसरा प्रकार सॉफ्ट पोर्न और सजेस्टिव कंटेंट का है। इस श्रेणी में अर्धनग्न रील्स, उत्तेजक डांस और गुदगुदी पैदा करने वाला कंटेंट शामिल होता है। लड़कियां कपड़े उतारते-उतारते या पहनते-पहनते उत्तेजना पैदा करने वाली बातें करती हों, ऐसी रील्स की सोशल मीडिया पर भरमार है।तीसरा प्रकार डीपफेक और एआई जनरेटेड कंटेंट का है। आधुनिक तकनीक की मदद से अश्लील सामग्री तैयार कर लोगों के सामने परोस दी जाती है। कई बार तो यह पहचानना भी मुश्किल हो जाता है कि कंटेंट वास्तविक है या एआई से तैयार किया गया है।चौथा प्रकार डार्क नेटवर्क और चाइल्ड सेक्सुअल अब्यूज कंटेंट का है। यह सबसे गंभीर श्रेणी है, क्योंकि इसमें बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी आपराधिक सामग्री का प्रसार किया जाता है।कुल मिलाकर देखा जाए तो सोशल मीडिया पर सेक्सुअल और अश्लील कंटेंट लगातार परोसा जा रहा है।सोशल मीडिया पर इस तरह का कंटेंट तेजी से फैलने का सबसे बड़ा कारण उसका एल्गोरिदम है। जिस कंटेंट को ज्यादा देखा जाता है, वही सबसे अधिक लोगों तक पहुंचता है। यूजर किस कंटेंट पर क्लिक करता है, किसे लाइक करता है, किस पर कमेंट करता है और किस वीडियो को कितनी देर तक देखता है, उसके आधार पर उसी प्रकार का कंटेंट बारबार उसके सामने परोसा जाता है।आपने भी यह अनुभव किया होगा कि एक बार किसी विशेष प्रकार का कंटेंट देखने के बाद उसी तरह के वीडियो लगातार दिखाई देने लगते हैं। इतना ही नहीं, जिन लोगों को हम फालो भी नहीं करते, उनकी पोस्ट और रील्स भी हमारे सामने आने लगती हैं।इंस्टाग्राम या किसी अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सर्च बटन पर क्लिक कीजिए, आपको किसी न किसी रूप में अश्लील या उत्तेजक कंटेंट जरूर दिखाई देगा। किशोर और युवा ऐसे कंटेंट की ओर आसानी से आकर्षित हो जाते हैं। एक बार देखने के बाद एल्गोरिदम उन्हें लगातार उसी तरह का कंटेंट दिखाने लगता है।ब्रिटेन के ‘स्काई मीडिया’ के एक सर्वे में 14 से 17 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 50 प्रतिशत किशोरों ने स्वीकार किया था कि बिना कुछ सर्च किए भी सोशल मीडिया के एल्गोरिदम की वजह से उनके सामने सेक्सुअल कंटेंट आ जाता है।आज के अनेक युवा पोर्न कंटेंट की लत का शिकार बनते जा रहे हैं और इसके पीछे सोशल मीडिया पर उपलब्ध अश्लील सामग्री भी एक बड़ा कारण है। ऐसे कंटेंट पर प्रभावी रोक लगाने के लिए सरकार को और अधिक सतर्क तथा सख्त होने की आवश्यकता है।0 किशोरावस्था के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध कब आएगा?कम उम्र के बच्चे और किशोर सोशल मीडिया का सबसे आसानी से शिकार बन जाते हैं। बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षित रहे और वे साइबर बुलिंग तथा डिजिटल एडिक्शन से बच सकें, इसके लिए दुनिया के अनेक देशों ने नाबालिगों के सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध या कड़े नियम लागू किए हैं। दुनिया के लगभग 15 देशों में बच्चों के लिए सोशल मीडिया के संबंध में सख्त प्रावधान लागू किए जा चुके हैं।भारत में भी नाबालिग बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध या आयु।आधारित नियंत्रण लागू करने पर विचार चल रहा है। यह व्यवस्था जितनी जल्दी लागू की जाए, उतना ही बेहतर होगा।आज बच्चे एंडलेस स्क्रॉलिंग का शिकार बन रहे हैं। मोबाइल के बिना उनका दिन नहीं गुजरता। कुछ बच्चे तो सोशल मीडिया पर इतनी सक्रियता दिखाते हैं कि बड़े लोग भी हैरान रह जाएं। देखादेखी की प्रवृत्ति, लाइक्स और फालोअर्स की होड़ तथा लगातार स्क्रीन पर बने रहने की आदत बच्चों को मानसिक तनाव, हीनभावना और डिप्रेशन की ओर धकेल रही है।विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी दे रहे हैं कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है। इसलिए सरकार, सोशल मीडिया कंपनियों, अभिभावकों और समाज, सभी की जिम्मेदारी है कि बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल वातावरण तैयार किया जाए।सिर्फ नोटिस जारी कर देना पर्याप्त नहीं होगा। सोशल मीडिया कंपनियों को अपने कंटेंट माडरेशन सिस्टम को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाना होगा, ताकि अश्लील, हिंसक और बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट पर शुरुआत में ही रोक लगाई जा सके। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर समाज और बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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