डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
बचपन की यादों के किसी कोने में आज भी वह एक दृश्य ठहरा हुआ है- गाँव के सिवान पर लगे मेले की धूल, भपभपाती गर्मी और उस सबके बीच से गुजरती एक पुरानी, चरमराती साइकिल। उस साइकिल के पीछे कैरियर पर बंधी एक बांस की खपच्ची, जिसमें खोंसे हुए रंग-बिरंगे भोंपू, प्लास्टिक की गुड़िया, टिक-टिक करती तीतर-बटेर वाली गाड़ियां और हवा में लहराती लाल-पीली पन्नियों की फिरफिरियां। वो कोई महज खिलौने बेचने वाला नहीं था, वह सीधे अपनी पीठ पर खुशियों का पूरा का पूरा संसार लादे चला आता था। उसकी साइकिल की घंटी बजती थी, तो लगता था जैसे पूरे मोहल्ले के बच्चों के फेफड़ों में नई हवा भर गई हो। लेकिन आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि हम सब बड़े क्या हुए, उस साइकिल वाले की पूरी दुनिया ही कहीं खो गई। अब न वह घंटी सुनाई देती है, न मेले की उस धूल में वह जानी-पहचानी सूरत दिखाई देती है। ऐसा लगता है कि वक्त की तेज रफ्तार ने उस गरीब के पैरों के पैडल ही छीन लिए हैं।ऑनलाइन शॉपिंग वाले इस नए ज़माने में, जहाँ बस एक टच करते ही खुशियाँ पैक होकर घर के दरवाज़े पर सज जाती हैं, वहाँ उस गरीब फेरीवाले की मैली सी पोटली अब कबाड़ का ढेर लगने लगी है। वह हर सुबह उठकर अपनी साइकिल की उतरी हुई चेन चढ़ाता है, जी-तोड़ पैडल मारता है, पर कमबख्त वक्त का पहिया उससे बहुत आगे निकल चुका है। बाज़ार के इस चमचमाते मलबे के नीचे उसकी उम्मीदें और छोटा सा हुनर घुट-घुटकर दम तोड़ चुके हैं। लोग सच ही कहते हैं कि भूखे भजन न होय गोपाला, पर यहाँ तो पूरी ज़िंदगी ही भूख का अंतहीन भजन बन गई है। कलेजा तब फट जाता है जब सोचता हूँ कि जो शख्स दूसरों के बच्चों के होठों पर चंद रुपयों में मुस्कान बिखेरने की ज़िद में अपनी एड़ियाँ घिस देता है, उसके अपने मासूम बच्चे रात को अक्सर भूखे पेट, रोते हुए सो जाते हैं। उसकी उस फटी कमीज़ के मैल और पसीने की गंध में ईमानदारी की आख़िरी गवाही बची है, जिसे यह बेरहम दुनिया देखना ही नहीं चाहती।मेले का मतलब कभी होता था रिश्तों का मिलना, खुशियों का सांझा होना, लेकिन अब मेले भी कॉर्पोरेट हो गए हैं। बड़े-बड़े पंडाल, टिकट वाले झूले और वीआईपी पास के बीच उस साइकिल वाले को गेट के बाहर ही खदेड़ दिया जाता है। ‘भाग यहाँ से, रास्ता मत रोक’ ये दुरदुराने वाले शब्द जब कोई रसूखदार सुरक्षाकर्मी या पुलिसवाला उसे डपटकर बोलता है, तो सिर्फ उसकी साइकिल पीछे नहीं हटती, बल्कि उसका आत्मसम्मान भीतर तक लहूलुहान हो जाता है। वह अपनी ढीली पड़ चुकी चप्पल को घसीटता हुआ, सिर झुकाए किसी पेड़ की छाँव में जा खड़ा होता है।read more:https://pahaltoday.com/barabanki-festival-will-be-inaugurated-from-april-10/ उसकी वह लाचारी, उसका वह मौन विलाप देखकर आसमान का कलेजा भी कांप उठता होगा। उसने कभी किसी से भीख नहीं मांगी, उसने कभी हराम की कमाई नहीं चाही, उसने तो बस अपने पसीने की बूंदों से खिलौने सींचे थे, पर इस बेरहम दुनिया ने उसे उसकी ईमानदारी का यही सिला दिया।अब तो ऐसा लगता है कि वह सिर्फ एक खिलौने बेचने वाला नहीं, बल्कि हमारी गुज़र चुकी मासूमियत का आखिरी कफ़न है जो धीरे-धीरे मैला हो रहा है। हम जितने आधुनिक हो रहे हैं, उतने ही कसाई होते जा रहे हैं। हमें तरस आता है भूखे जानवरों पर, हम सोशल मीडिया पर संवेदनाओं के समंदर बहा देते हैं, पर सामने खड़े उस जीते-जागते मरते हुए इंसान की सिसकी हमारे कानों तक नहीं पहुँचती। उसकी साइकिल का वह जर्जर ढांचा, जिसका हैंडल अब मुड़ चुका है और जिसकी गद्दी फटकर रुई उगल रही है, ठीक उसकी ज़िंदगी का आईना है। वह हर रोज़ सुबह एक नई जंग के लिए निकलता है, यह जानते हुए भी कि इस बाज़ार में उसकी हार पहले से ही तय है।अब तो गलियों में उसकी आवाज़ भी जैसे घुटकर रह गई है। पहले उसकी एक हाक पर पूरा मोहल्ला जीवंत हो उठता था, ‘ले लो बाबू, उड़ने वाली चिड़िया, टिक-टिक घोड़ा!’ अब उसकी वह आवाज़ कलाई घड़ियों के अलार्म और मोबाइल की रील्स के शोर में कहीं दफ़न हो गई है। लोग अपने घरों के ऊंचे दरवाज़े और खिड़कियाँ बंद कर लेते हैं ताकि बाहर की धूल और वह दरिद्रता भीतर न आ सके। वह बंद दरवाजों को देखता है, अपनी सूखी जीभ से होठों को चाटता है और बिना कुछ कहे आगे बढ़ जाता है। उसकी पीठ झुक गई है, बाल समय से पहले सफेद हो गए हैं और हाथों की नसें इस तरह उभर आई हैं जैसे कोई सूखा हुआ दरख्त हो। वह एक जीता-जागता भूत बन चुका है, जो इस इंसानों की बस्ती में अपनी खोई हुई ज़िंदगी ढूंढ रहा है।आखिर में जब वह इतिहास के पन्नों से पूरी तरह गायब हो जाएगा, तब शायद हम उसकी तस्वीरें देखकर कहेंगे कि ‘हाँ, एक दौर ऐसा भी था’। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। हमने अपनी तरक्की की वेदी पर एक बेहद मासूम और ईमानदार वजूद की बलि चढ़ा दी होगी। जब भी कभी किसी पुरानी अलमारी से वह धूल खाती हुई प्लास्टिक की फिरफिरी मिले, तो ठहरकर सोचना जरूर कि इसे बेचने वाले के घर में उस दिन दीया जला था या नहीं। वह साइकिल वाला कोई कहानी का पात्र नहीं है, वह हमारी आँखों के सामने तड़प-तड़प कर दम तोड़ती हुई एक संस्कृति है, जिसकी मौत पर न कोई मातम मनेगा, न कोई आंसू बहाएगा। बस, हवा में उसकी साइकिल की वह आखिरी घंटी कहीं गूंजकर हमेशा-हमेशा के लिए खामोश हो जाएगी और हम अपनी सजी-धजी दुनिया में मगन रहेंगे, यह भूलकर कि किसी का पूरा वजूद हमारी बेरुखी की भेंट चढ़ गया।
बचपन की यादों के किसी कोने में आज भी वह एक दृश्य ठहरा हुआ है- गाँव के सिवान पर लगे मेले की धूल, भपभपाती गर्मी और उस सबके बीच से गुजरती एक पुरानी, चरमराती साइकिल। उस साइकिल के पीछे कैरियर पर बंधी एक बांस की खपच्ची, जिसमें खोंसे हुए रंग-बिरंगे भोंपू, प्लास्टिक की गुड़िया, टिक-टिक करती तीतर-बटेर वाली गाड़ियां और हवा में लहराती लाल-पीली पन्नियों की फिरफिरियां। वो कोई महज खिलौने बेचने वाला नहीं था, वह सीधे अपनी पीठ पर खुशियों का पूरा का पूरा संसार लादे चला आता था। उसकी साइकिल की घंटी बजती थी, तो लगता था जैसे पूरे मोहल्ले के बच्चों के फेफड़ों में नई हवा भर गई हो। लेकिन आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि हम सब बड़े क्या हुए, उस साइकिल वाले की पूरी दुनिया ही कहीं खो गई। अब न वह घंटी सुनाई देती है, न मेले की उस धूल में वह जानी-पहचानी सूरत दिखाई देती है। ऐसा लगता है कि वक्त की तेज रफ्तार ने उस गरीब के पैरों के पैडल ही छीन लिए हैं।ऑनलाइन शॉपिंग वाले इस नए ज़माने में, जहाँ बस एक टच करते ही खुशियाँ पैक होकर घर के दरवाज़े पर सज जाती हैं, वहाँ उस गरीब फेरीवाले की मैली सी पोटली अब कबाड़ का ढेर लगने लगी है। वह हर सुबह उठकर अपनी साइकिल की उतरी हुई चेन चढ़ाता है, जी-तोड़ पैडल मारता है, पर कमबख्त वक्त का पहिया उससे बहुत आगे निकल चुका है। बाज़ार के इस चमचमाते मलबे के नीचे उसकी उम्मीदें और छोटा सा हुनर घुट-घुटकर दम तोड़ चुके हैं। लोग सच ही कहते हैं कि भूखे भजन न होय गोपाला, पर यहाँ तो पूरी ज़िंदगी ही भूख का अंतहीन भजन बन गई है। कलेजा तब फट जाता है जब सोचता हूँ कि जो शख्स दूसरों के बच्चों के होठों पर चंद रुपयों में मुस्कान बिखेरने की ज़िद में अपनी एड़ियाँ घिस देता है, उसके अपने मासूम बच्चे रात को अक्सर भूखे पेट, रोते हुए सो जाते हैं। उसकी उस फटी कमीज़ के मैल और पसीने की गंध में ईमानदारी की आख़िरी गवाही बची है, जिसे यह बेरहम दुनिया देखना ही नहीं चाहती।मेले का मतलब कभी होता था रिश्तों का मिलना, खुशियों का सांझा होना, लेकिन अब मेले भी कॉर्पोरेट हो गए हैं। बड़े-बड़े पंडाल, टिकट वाले झूले और वीआईपी पास के बीच उस साइकिल वाले को गेट के बाहर ही खदेड़ दिया जाता है। ‘भाग यहाँ से, रास्ता मत रोक’ ये दुरदुराने वाले शब्द जब कोई रसूखदार सुरक्षाकर्मी या पुलिसवाला उसे डपटकर बोलता है, तो सिर्फ उसकी साइकिल पीछे नहीं हटती, बल्कि उसका आत्मसम्मान भीतर तक लहूलुहान हो जाता है। वह अपनी ढीली पड़ चुकी चप्पल को घसीटता हुआ, सिर झुकाए किसी पेड़ की छाँव में जा खड़ा होता है।read more:https://pahaltoday.com/barabanki-festival-will-be-inaugurated-from-april-10/ उसकी वह लाचारी, उसका वह मौन विलाप देखकर आसमान का कलेजा भी कांप उठता होगा। उसने कभी किसी से भीख नहीं मांगी, उसने कभी हराम की कमाई नहीं चाही, उसने तो बस अपने पसीने की बूंदों से खिलौने सींचे थे, पर इस बेरहम दुनिया ने उसे उसकी ईमानदारी का यही सिला दिया।अब तो ऐसा लगता है कि वह सिर्फ एक खिलौने बेचने वाला नहीं, बल्कि हमारी गुज़र चुकी मासूमियत का आखिरी कफ़न है जो धीरे-धीरे मैला हो रहा है। हम जितने आधुनिक हो रहे हैं, उतने ही कसाई होते जा रहे हैं। हमें तरस आता है भूखे जानवरों पर, हम सोशल मीडिया पर संवेदनाओं के समंदर बहा देते हैं, पर सामने खड़े उस जीते-जागते मरते हुए इंसान की सिसकी हमारे कानों तक नहीं पहुँचती। उसकी साइकिल का वह जर्जर ढांचा, जिसका हैंडल अब मुड़ चुका है और जिसकी गद्दी फटकर रुई उगल रही है, ठीक उसकी ज़िंदगी का आईना है। वह हर रोज़ सुबह एक नई जंग के लिए निकलता है, यह जानते हुए भी कि इस बाज़ार में उसकी हार पहले से ही तय है।अब तो गलियों में उसकी आवाज़ भी जैसे घुटकर रह गई है। पहले उसकी एक हाक पर पूरा मोहल्ला जीवंत हो उठता था, ‘ले लो बाबू, उड़ने वाली चिड़िया, टिक-टिक घोड़ा!’ अब उसकी वह आवाज़ कलाई घड़ियों के अलार्म और मोबाइल की रील्स के शोर में कहीं दफ़न हो गई है। लोग अपने घरों के ऊंचे दरवाज़े और खिड़कियाँ बंद कर लेते हैं ताकि बाहर की धूल और वह दरिद्रता भीतर न आ सके। वह बंद दरवाजों को देखता है, अपनी सूखी जीभ से होठों को चाटता है और बिना कुछ कहे आगे बढ़ जाता है। उसकी पीठ झुक गई है, बाल समय से पहले सफेद हो गए हैं और हाथों की नसें इस तरह उभर आई हैं जैसे कोई सूखा हुआ दरख्त हो। वह एक जीता-जागता भूत बन चुका है, जो इस इंसानों की बस्ती में अपनी खोई हुई ज़िंदगी ढूंढ रहा है।आखिर में जब वह इतिहास के पन्नों से पूरी तरह गायब हो जाएगा, तब शायद हम उसकी तस्वीरें देखकर कहेंगे कि ‘हाँ, एक दौर ऐसा भी था’। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। हमने अपनी तरक्की की वेदी पर एक बेहद मासूम और ईमानदार वजूद की बलि चढ़ा दी होगी। जब भी कभी किसी पुरानी अलमारी से वह धूल खाती हुई प्लास्टिक की फिरफिरी मिले, तो ठहरकर सोचना जरूर कि इसे बेचने वाले के घर में उस दिन दीया जला था या नहीं। वह साइकिल वाला कोई कहानी का पात्र नहीं है, वह हमारी आँखों के सामने तड़प-तड़प कर दम तोड़ती हुई एक संस्कृति है, जिसकी मौत पर न कोई मातम मनेगा, न कोई आंसू बहाएगा। बस, हवा में उसकी साइकिल की वह आखिरी घंटी कहीं गूंजकर हमेशा-हमेशा के लिए खामोश हो जाएगी और हम अपनी सजी-धजी दुनिया में मगन रहेंगे, यह भूलकर कि किसी का पूरा वजूद हमारी बेरुखी की भेंट चढ़ गया।