कलम से क्रांति, कलम से ही भ्रांति,

मनुष्य को प्रकृति ने अनेक वरदान दिए हैं, किंतु उनमें सबसे विलक्षण वरदान  वाणी और शब्द हैं। शब्द ही मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग पहचान देते हैं। भारतीय चिंतन परंपरा में कहा गया  अक्षर कभी नष्ट नहीं होते।शब्द समय की सीमाओं को लाँघकर पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं। इसी कारण लेखनी को तलवार से अधिक शक्तिशाली माना गया है। तलवार केवल शरीर को घायल करती है, जबकि शब्द मन, मस्तिष्क और आत्मा तक को झकझोर देते हैं। इसलिए यह कहा गया है कि बोलने से पहले सौ बार सोचो, और लिखने से पहले हजार बार।लेखनी सृजन का भी माध्यम है और विनाश का भी। कलम से क्रांति भी जन्म लेती है और भ्रांति भी फैलती है। इतिहास साक्षी है कि विचारों ने साम्राज्यों को बदला है, क्रांतियों को जन्म दिया है और सभ्यताओं की दिशा निर्धारित की है। महान फ्रांसीसी चिंतक वोल्टेयर का कथन है विचारों की शक्ति तलवार से कहीं अधिक स्थायी होती है। इसी भाव को अंग्रेज़ी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने अपने लेखन से सिद्ध किया। उनके शब्द सीधे पाठकों के हृदय में उतर जाते थे। शब्दों की यही संवेदनशीलता उन्हें विश्व साहित्य के शिखर पर स्थापित करती है।भारतीय साहित्य की परंपरा भी शब्दों की इसी दिव्य शक्ति की साक्षी है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस के माध्यम से न केवल भक्ति का अमृत प्रवाहित किया, बल्कि भारतीय समाज को नैतिकता, मर्यादा और मानवता का मार्ग भी दिखाया। कबीर ने सहज और लोकभाषा में ऐसे दोहे रचे जो आज भी सामाजिक चेतना के दीपक हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय॥यह केवल काव्य नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन-दर्शन है। मुंशी प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों और कहानियों के माध्यम से समाज की पीड़ा को शब्द दिए। उनकी लेखनी ने शोषितों, किसानों और वंचितों की आवाज़ बनकर साहित्य को जनजीवन से जोड़ा। देवकीनंदन खत्री की चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति ने लाखों लोगों को हिंदी सीखने के लिए प्रेरित किया। यह किसी लेखक की लेखनी की सबसे बड़ी सफलता कही जा सकती है।
आधुनिक हिंदी साहित्य में अज्ञेय ने भाषा को नई संवेदनशीलता और बौद्धिक ऊँचाई प्रदान की। उनकी शब्दावली भले ही गंभीर रही हो, किंतु उसका प्रभाव पाठकों के अंतर्मन तक पहुँचता है। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने लिखा था शब्द जब अन्याय के विरुद्ध उठते हैं, तब वे क्रांति बन जाते हैं। यही साहित्य का वास्तविक उद्देश्य भी है। राजनीति और कूटनीति में शब्दों का महत्व और भी बढ़ जाता है। एक शब्द युद्ध का कारण बन सकता है तो दूसरा शांति का सेतु। इतिहास में अनेक अवसर ऐसे आए जब नेताओं के भाषणों ने समाज को दिशा दी, तो अनेक बार असावधान वक्तव्यों ने हिंसा और वैमनस्य को जन्म दिया। कूटनीति में तो एक-एक शब्द को अत्यंत सावधानी से चुना जाता है, क्योंकि उसका अर्थ केवल भाषा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राष्ट्रों के संबंधों को भी प्रभावित करता है।
महाभारत का प्रसंग इसका सशक्त उदाहरण है। द्रौपदी के कटु वचनों और अपमान की घटनाओं ने अंततः महायुद्ध का मार्ग प्रशस्त किया। दूसरी ओर भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों ने अर्जुन के संशय को दूर कर धर्म और कर्तव्य का मार्ग प्रशस्त किया। यह शब्दों की ही शक्ति थी। आज के डिजिटल युग में शब्दों की शक्ति और भी बढ़ गई है। सोशल मीडिया पर लिखा गया एक वाक्य लाखों लोगों तक कुछ ही क्षणों में पहुँच जाता है। एक असत्य सूचना समाज में भ्रम, भय और हिंसा फैला सकती है, जबकि एक सकारात्मक संदेश लाखों लोगों को प्रेरित कर सकता है। इसलिए लेखन और वक्तव्य दोनों में संयम, सत्य और उत्तरदायित्व अनिवार्य हैं। महात्मा गांधी ने कहा था सत्य और अहिंसा केवल कर्म में ही नहीं, वाणी में भी दिखाई देनी चाहिए। स्वामी विवेकानंद युवाओं से कहते थे—ऐसा बोलो जिससे लोगों में आत्मविश्वास जागे, निराशा नहीं। आचार्य विनोबा भावे का मानना था कि वाणी वही श्रेष्ठ है जो मनुष्य और समाज दोनों का कल्याण करे। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी शब्दों का महत्व अत्यंत गहरा है। विश्व के बड़े राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्षों के वक्तव्य कई बार युद्ध और शांति के बीच की दूरी तय करते हैं। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में संवाद, संयम और कूटनीतिक भाषा की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। भारत की पहचान विश्व में शांति, सह-अस्तित्व और संवाद की संस्कृति के कारण रही है। यही कारण है कि अनेक अंतरराष्ट्रीय विवादों में भारत को विश्वसनीय मध्यस्थ के रूप में देखा जाता है।read more:https://pahaltoday.com/after-hearing-the-arguments-of-advocate-girish-srivastava-and-examining-the-file-sufficient-grounds-for-bail-were-found/भारतीय संस्कृति ने सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का संदेश दिया है। हमारी संत परंपरा, साहित्य और दर्शन मधुर वाणी, संतुलित भाषा और सद्विचारों को सामाजिक विकास का आधार मानते हैं। शब्द तभी सार्थक हैं जब वे मनुष्य को जोड़ें, तोड़ें नहीं; आशा जगाएँ, निराशा नहीं; शांति स्थापित करें, संघर्ष नहीं। आज आवश्यकता इस बात की है कि विशेषकर युवा पीढ़ी सोशल मीडिया, सार्वजनिक जीवन और व्यक्तिगत व्यवहार में शब्दों का चयन अत्यंत सावधानी से करे। कम बोलना, अधिक सोचना और सार्थक लिखना ही व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान है।
अंततः यही कहा जा सकता है कि संसार पर वही व्यक्ति स्थायी प्रभाव छोड़ता है जो अपने शब्दों का विवेकपूर्ण प्रयोग करना जानता है। गलत शब्द संबंध तोड़ सकते हैं, समाज में विद्वेष फैला सकते हैं और विनाश का कारण बन सकते हैं; जबकि मधुर, संतुलित और सत्यनिष्ठ शब्द टूटे हुए मनों को जोड़ सकते हैं, युद्ध को शांति में बदल सकते हैं और मानवता को नई दिशा दे सकते हैं।
कलम केवल स्याही से नहीं चलती, वह विचारों, विवेक, संवेदना और उत्तरदायित्व से चलती है। इसलिए लिखिए भी सोच-समझकर, बोलिए भी तौल-तौलकर क्योंकि कलम से क्रांति भी जन्म लेती है और कलम से ही भ्रांति भी।

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