डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
मैंने काँपते हाथों से कमरे का पुराना आईना साफ किया ताकि अपने चेहरे पर लगी उस अंतिम धूल को देख सकूं। पर जैसे ही रोशनी उस कांच पर पड़ी, मेरा गला सूख गया और आँखों से आँसू नहीं, बल्कि रूह का लहू रिसने लगा। आईने के भीतर कोई इंसानी चेहरा नहीं था, बल्कि साठ साल तक इस घर को अपना खून-पसीना देने वाले मेरे अपने जिस्म की जगह सींकों का एक सूखा, जर्जर और बिखरा हुआ बंडल खड़ा था, जिसकी रीढ़ की हड्डी पूरी तरह टूट चुकी थी। तड़के सुबह जब कूड़ा उठाने वाली गाड़ी का हॉर्न बजा, तो मालिक ने मुझे हाथ भी नहीं लगाया। उन्होंने पैर से ढकेलकर मेरी सींकों जैसी देह को एक काले प्लास्टिक के बैग में बंद किया और वैक्यूम क्लीनर की नई आवाज के शोर में बाहर फेंक दिया।read more:https://pahaltoday.com/mohsina-kidwai-passes-away-an-era-has-come-to-an-end/मैं गाड़ी के मलबे में दबा उस पुरानी झाड़ू को ढूंढ रहा था, ताकि उससे पूछ सकूं कि जब इंसान खुद एक झाड़ू में तब्दील हो जाता है, तब इस मतलबी दुनिया में उसके पुनरुद्धार का टेंडर कौन पास करता है।