हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पर आईआईएमसी की शोध पत्रिका ‘संचार माध्यम’ के विशेषांक का विमोचन

नई दिल्ली,  आज हम ऐसे दौर में हैं जब शिक्षित और अशिक्षित की परिभाषा बदल चुकी है। अब केवल लिखना-पढ़ना ही शिक्षित होने की निशानी नहीं है। नित्य नई चीजें सीखना और खुद को ज्ञान के नए परिदृश्य में परिवर्तित करते जाना आवश्यक हो गया है। जो प्रौद्योगिकी पहले हजारों वर्षों में परिवर्तित होती थी वो अब वर्षों और महीनों में बदल रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस दौर में आप इन्हीं बदलावों में से कोई सपना देखें और उस सपने को साकार करने के लिए अपना पूरी ताकत लगा दें। तभी आप हिंदी के पहले अखबार ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ की तरह एक अमिट लकीर खींच पाएँगे। यह कहना है राज्य सभा के उपसभापति श्री हरिवंश का। वे मंगलवार को भारतीय जन संचार संस्थान की प्रतिष्ठित शोध पत्रिका ‘संचार माध्यम’ के हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों की यात्रा पर केंद्रित विशेषांक का विमोचन कर रहे थे। इस अवसर पर आईआईएमसी की कुलपति डॉ. प्रज्ञा पालीवाल गौड़ एवं सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में संयुक्त सचिव डा के के निराला भी उपस्थित थे।
इस मौके पर श्री हरिवंश ने ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को रेखांकित करते हुए इस दिशा में संचार, शोध एवं नवाचार की आवश्यकताओं पर बल दिया। उन्होंने कहा कि यह स्किल के जरिए जीवन को बदलने का दौर है।read more:https://khabarentertainment.in/the-light-of-learning-culture-and-creativity-an-unforgettable-saga-of-the-second-convocation-with-udaan-2026/ साथ ही उन्होंने आर्थिक परिवर्तन के महत्त्व पर बल देते हुए कहा कि आर्थिक परिवर्तन ही अन्य बदलावों की दिशा तय करती है। इस दिशा में पिछले कुछ सालों में भारत ने तेजी के काम किया है, चाहे वो हाई स्पीड रेल हो या नये पोर्ट या फिर अन्य आधारभूत संरचनाएं।श्री हरिवंश ने यह भी कहा कि “आज नयी पत्रकारिता में अपार संभावनाएं हैं। इस सूचना क्रांति के दौर में आप यदि अपना और देश का भविष्य संवारना चाहते हैं तो नए ढंग से काम करने की और लीक से हटकर नया रास्ता बनाना होगा। यह पत्रकारिता का धर्म है कि आमजन तक छोटी-छोटी सूचनाओं को भी संप्रेषित करे ताकि देशहित के मुद्दों पर आम सहमति बन सके। इस दृष्टि से संचारकों को राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझना पड़ेगा।”
आईआईएमसी की कुलपति डॉ. प्रज्ञा पालीवाल गौड़ ने बताया कि संचार माध्यम के विशेषांक में हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों की यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर अकादमिक एवं पत्रकारिता जगत के दिग्गजों द्वारा चर्चा की गई है। उन्होंने बताया कि ‘संचार माध्यम’ जहाँ पत्रकारिता की उभरती हुई नवीन प्रवृत्तियों पर सतत नजर रखता है, वहीँ भारतीय ज्ञान परंपरा में से कुछ बिखरे हुए मोतियों को संकलित कर उन्हें आधुनिक प्रवृत्तियों के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने में भी पीछे नहीं रहता।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *