भिवानी से इंकार, चाहिए जिला हिसार

 डॉ. सत्यवान सौरभ
लोकतंत्र केवल मतदान की व्यवस्था का नाम नहीं है, बल्कि यह जनता की जरूरतों, सुविधाओं और आकांक्षाओं के अनुरूप शासन चलाने की सतत प्रक्रिया भी है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासनिक सीमाएँ स्थायी नहीं होतीं। समय, परिस्थितियों, जनसंख्या, विकास और जनसुविधा की आवश्यकताओं के अनुसार उनका पुनर्गठन किया जाता है। प्रशासनिक इकाइयों का निर्माण इसलिए किया जाता है ताकि नागरिकों को शासन और सरकारी सेवाओं तक आसान पहुँच मिल सके। यदि कोई प्रशासनिक व्यवस्था जनता के लिए सुविधा के बजाय असुविधा का कारण बनने लगे, तो उसके पुनर्विचार की आवश्यकता स्वाभाविक और न्यायसंगत हो जाती है। हरियाणा के सिवानी उपमंडल को जिला भिवानी से अलग कर जिला हिसार में शामिल करने की मांग इसी प्रकार की एक व्यावहारिक, तार्किक और जनहितकारी मांग है, जो पिछले लगभग दस वर्षों से लगातार उठाई जा रही है।यह मांग किसी राजनीतिक लाभ, क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा या भावनात्मक आवेग का परिणाम नहीं है। इसके पीछे सिवानी क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, परिवहन व्यवस्था, आर्थिक गतिविधियाँ, सामाजिक संबंध और प्रशासनिक आवश्यकताएँ जैसे अनेक ठोस कारण हैं। अगस्त 2016 में कुछ जागरूक नागरिकों और समाजसेवियों द्वारा प्रारंभ किया गया यह अभियान धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र की सामूहिक आवाज बन गया। उस समय यह एक विचार था, लेकिन आज यह हजारों लोगों की साझा आकांक्षा का स्वरूप ग्रहण कर चुका है।इस मांग की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी निरंतरता और जनाधार है। आंदोलन की औपचारिक शुरुआत अगस्त 2016 में हुई, जब छह जागरूक नागरिकों—बड़वा के प्रमुख समाजसेवी महेंद्र लखेरा, सुनील सिंहमार (एडवोकेट), लाल सिंह ‘लालू’, डॉ. सत्यवान सौरभ, सुरेंद्र भुक्कल और मुकेश भुक्कल—ने मिलकर इस प्रश्न को व्यक्तिगत असुविधा से ऊपर उठाकर जनहित के मुद्दे के रूप में सामने रखा। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह पहल आने वाले वर्षों में सिवानी की सामूहिक चेतना का स्वर बन जाएगी। प्रारंभ में यह संघर्ष कुछ बैठकों, ज्ञापनों और विचार-विमर्श तक सीमित रहा, लेकिन जैसे-जैसे आम लोगों ने अपनी रोजमर्रा की समस्याओं को इस मांग से जुड़ा पाया, वैसे-वैसे आंदोलन का दायरा बढ़ता गया। किसानों, व्यापारियों, विद्यार्थियों, कर्मचारियों और सामाजिक संगठनों ने इस मुद्दे को अपना समर्थन देना शुरू किया। परिणामस्वरूप यह अभियान किसी व्यक्ति, समिति या संगठन विशेष की पहल न रहकर पूरे सिवानी उपमंडल की साझा आवाज़ बन गया। लगभग एक दशक से शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक ढंग से जारी यह संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि यह मांग किसी क्षणिक भावना का परिणाम नहीं, बल्कि क्षेत्र की वास्तविक आवश्यकताओं और जनसुविधा से जुड़ा एक गंभीर विषय है।यदि इस विषय को भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो सिवानी का हिसार से जुड़ाव कहीं अधिक स्वाभाविक प्रतीत होता है। सिवानी क्षेत्र के अनेक गाँव हिसार के अपेक्षाकृत निकट हैं, जबकि भिवानी उनसे काफी दूर पड़ता है। कई स्थानों पर हिसार की दूरी लगभग 25 से 30 किलोमीटर है, जबकि भिवानी पहुँचने के लिए 65 से 70 किलोमीटर या उससे अधिक का सफर तय करना पड़ता है। यह अंतर केवल दूरी का नहीं है, बल्कि समय, धन और श्रम का भी है। एक सामान्य नागरिक, किसान, विद्यार्थी या व्यापारी के लिए यह अतिरिक्त दूरी उसकी दैनिक दिनचर्या और आर्थिक स्थिति पर सीधा प्रभाव डालती है। प्रशासनिक कार्यों के लिए जब लोगों को अधिक समय और संसाधन खर्च करने पड़ें, तो यह व्यवस्था की उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।परिवहन व्यवस्था की दृष्टि से भी सिवानी का जीवन हिसार से अधिक जुड़ा हुआ दिखाई देता है। हिसार के लिए नियमित बस सेवाएँ, साझा वाहन और अन्य परिवहन साधन अपेक्षाकृत अधिक उपलब्ध हैं।read more:https://pahaltoday.com/pm-modi-calls-for-women-empowerment-calls-women-reservation-a-historic-opportunity/ लोग दैनिक कार्यों, शिक्षा, रोजगार और व्यापार के लिए आसानी से हिसार आ-जा सकते हैं। इसके विपरीत भिवानी की यात्रा कई बार अधिक समय लेने वाली और असुविधाजनक साबित होती है। अनेक लोगों को बसें बदलनी पड़ती हैं या लंबे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। प्रशासनिक दृष्टि से किसी क्षेत्र को ऐसे जिले से जोड़ना जहाँ पहुँचने में जनता को कम समय और कम खर्च लगे, सुशासन की मूल भावना के अनुरूप माना जाता है।सिवानी क्षेत्र की शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं पर दृष्टि डालें तो स्थिति और अधिक स्पष्ट हो जाती है। उच्च शिक्षा के लिए विद्यार्थी बड़ी संख्या में हिसार का रुख करते हैं। विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, तकनीकी संस्थान और अन्य शैक्षणिक सुविधाएँ हिसार में केंद्रित हैं। इसी प्रकार विशेष चिकित्सा सेवाओं, बड़े अस्पतालों और विशेषज्ञ डॉक्टरों के लिए भी लोगों की प्राथमिक निर्भरता हिसार पर है। जब किसी क्षेत्र की अधिकांश जनसंख्या अपनी प्रमुख आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्वाभाविक रूप से किसी एक शहर की ओर जाती हो, तो प्रशासनिक व्यवस्था को भी उस वास्तविकता को समझना चाहिए। वर्तमान स्थिति में प्रशासनिक आदेश भिवानी से संचालित होते हैं, जबकि जीवन की आवश्यकताएँ हिसार से पूरी होती हैं। यही विरोधाभास वर्षों से जनता को असुविधा का सामना करने के लिए मजबूर कर रहा है।आर्थिक दृष्टि से भी सिवानी का जुड़ाव हिसार से गहरा है। किसानों की कृषि उपज, व्यापारियों के व्यावसायिक संबंध, बाजारों की गतिविधियाँ और रोजगार के अवसर बड़ी मात्रा में हिसार से जुड़े हुए हैं। हिसार क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है और सिवानी के लोग स्वाभाविक रूप से उससे जुड़े हुए हैं। किसी भी क्षेत्र का आर्थिक प्रवाह जिस दिशा में हो, प्रशासनिक संरचना को भी उस दिशा के अनुरूप बनाने पर विचार किया जाना चाहिए। इससे विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में सुविधा होती है और क्षेत्रीय विकास को गति मिलती है।सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी सिवानी और हिसार के बीच गहरा संबंध दिखाई देता है। पारिवारिक रिश्ते, सामाजिक संपर्क, विवाह संबंध, शैक्षणिक आदान-प्रदान और सांस्कृतिक गतिविधियाँ दोनों क्षेत्रों को एक-दूसरे से जोड़ती हैं। लोकजीवन, बोली-बानी और सामाजिक व्यवहार में भी पर्याप्त समानता देखने को मिलती है। प्रशासनिक सीमाएँ यदि सामाजिक वास्तविकताओं के अनुरूप हों तो जनता और शासन के बीच संवाद अधिक प्रभावी बनता है। इसके विपरीत यदि प्रशासनिक सीमाएँ लोगों की वास्तविक जीवन-शैली से मेल न खाएँ तो वे केवल औपचारिक सीमाएँ बनकर रह जाती हैं।इस आंदोलन की एक और विशेषता यह है कि यह पूरी तरह शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और रचनात्मक रहा है। वर्षों से लोगों ने ज्ञापनों, बैठकों, जनसंवादों और सामाजिक अभियानों के माध्यम से अपनी बात सरकार तक पहुँचाने का प्रयास किया है। किसी प्रकार के टकराव या उग्रता के बिना जनहित के मुद्दे को निरंतर जीवित रखना लोकतांत्रिक परिपक्वता का उदाहरण है। यही कारण है कि यह मांग आज केवल कुछ लोगों का विचार नहीं, बल्कि व्यापक जनमत का रूप ले चुकी है।इस आंदोलन को एक स्पष्ट पहचान उस नारे ने दी, जो वर्षों से सिवानी क्षेत्र की जनभावना को स्वर देता आया है—“भिवानी से है इंकार, हमको चाहिए जिला हिसार।” यह डॉ. सत्यवान सौरभ द्वारा लिखित केवल एक नारा नहीं, बल्कि क्षेत्र की भौगोलिक वास्तविकता, प्रशासनिक सुविधा और जन-आकांक्षा का संक्षिप्त घोष है। यही कारण है कि यह नारा चौपालों, सामाजिक बैठकों और जनसभाओं में लोगों की जुबान पर चढ़ गया और आंदोलन की वैचारिक पहचान बन गया।आज जब सरकारें “ईज ऑफ लिविंग” और “ईज ऑफ गवर्नेंस” की बात करती हैं, तब सिवानी का प्रश्न उन सिद्धांतों की वास्तविक परीक्षा बन जाता है। यदि कोई प्रशासनिक परिवर्तन हजारों लोगों का समय बचा सकता है, सरकारी सेवाओं तक उनकी पहुँच आसान बना सकता है, आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित कर सकता है और जनता को अधिक सुविधा प्रदान कर सकता है, तो उस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। प्रशासनिक पुनर्गठन का उद्देश्य भी यही होता है कि शासन जनता के अधिक निकट पहुँचे और नागरिकों को कम से कम कठिनाई का सामना करना पड़े।सिवानी को जिला हिसार में शामिल करने की मांग किसी के विरोध की राजनीति नहीं है, बल्कि सुविधा, व्यवहारिकता और प्रशासनिक न्याय की मांग है। यह मांग किसी जिले की प्रतिष्ठा घटाने या बढ़ाने का प्रश्न नहीं है, बल्कि जनता की वास्तविक जरूरतों को स्वीकार करने का आग्रह है। लोकतंत्र में शासन की संवेदनशीलता इसी बात से प्रमाणित होती है कि वह जनता की समस्याओं को सुनने और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने का साहस रखता है।लगभग एक दशक से उठ रही यह आवाज आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी 2016 में थी। समय के साथ इसके समर्थन में वृद्धि हुई है और इसके पक्ष में तर्क और अधिक मजबूत हुए हैं। अब यह केवल एक नारा नहीं रहा—“भिवानी से है इंकार, चाहिए जिला हिसार”—बल्कि यह सिवानी क्षेत्र की सामूहिक आकांक्षा, भौगोलिक वास्तविकता और प्रशासनिक न्याय की मांग का प्रतीक बन चुका है। सरकार के लिए यह अवसर है कि वह जनभावनाओं, भौगोलिक सच्चाइयों और प्रशासनिक व्यवहारिकता को ध्यान में रखते हुए इस विषय पर गंभीर विचार करे। यदि शासन वास्तव में जनता की सुविधा और सुशासन के सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध है, तो सिवानी की इस दशक पुरानी, शांतिपूर्ण और न्यायसंगत मांग को सुनना और उस पर सकारात्मक निर्णय लेना समय की आवश्यकता है।

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