विकास खंड कार्यालय का वह विशाल मुख्य प्रवेश द्वार दरअसल भ्रष्टाचार की एक ऐसी अभेद्य गुफा है जहाँ घुसते ही नैतिकता का दम घुट जाता है और फाइलें मोक्ष की तलाश में वर्षों तक भटकती रहती हैं। वहाँ लगे बरगद के पेड़ के नीचे सतहत्तर साल के रामचरित बाबा रोज़ दोपहर बारह बजे एक ऐसे जिद्दी सत्य की तरह जम जाते थे जिसे प्रशासन की झाड़ू रोज़ बुहारने की कोशिश करती पर नाकाम रहती। उनके हाथों में लाल रंग की वह छोटी प्लास्टिक की खिलौना बाल्टी दरअसल हमारे तंत्र की खोखली रीढ़ का जीवंत नमूना थी जिसका पेंदा किसी ईमानदार अफ़सर के वादे की तरह गायब था। ब्लॉक का नया अर्दली जब भी उन्हें धूप में बैठा देखता तो पानी की बोतलों का झोला इस गर्व से संभालता जैसे वह गंगा को बोतल में बंद कर लाया हो और ठहाका लगाकर कहता कि बाबा जब इस फूटी लाल बाल्टी में एक बूंद सरकारी करुणा नहीं टिक सकती तो इसे रोज़ यहाँ अफ़सरों के ज़मीर की तरह क्यों सजाए बैठते हो। रामचरित बाबा अपनी धुंधली आँखों से दफ़्तर की सीढ़ियों की ओर देखते जहाँ से झूठ रेशमी लिबास पहनकर नीचे उतरता था और शांत स्वर में कहते कि बेटा यह बाल्टी केवल फूटा हुआ खिलौना नहीं है बल्कि इस पूरे जल निगम की वह सूखी हुई नियत है जो प्यास का विज्ञापन तो छपवाती है पर पानी पिलाना भूल जाती है।
दफ़्तर में टहलने वाले ठेकेदार और पंच बाबा का मज़ाक ऐसे उड़ाते जैसे वे खुद सत्य के सबसे बड़े अवतार हों जबकि उनकी खुद की आत्मा कागजों के दलदल में धंसी हुई थी। उन्हें लगता था कि बाबा का दिमाग सठिया चुका है क्योंकि इस तंत्र में केवल वही आदमी समझदार माना जाता है जो बहती गंगा में हाथ धोने की कला जानता हो और बाबा तो सूखी पाइपलाइन की वकालत कर रहे थे। रामचरित बाबा अपनी फटी हुई धोती से उस बाल्टी को ऐसे पोंछते मानो वह सरकारी फाइल का कोई दाग साफ कर रहे हों।read more:https://pahaltoday.com/villagers-upset-over-garbage-dumping-staged-a-protest-at-the-district-collectorate/ब्लॉक के कर्मचारी उन्हें एक हठी बुजुर्ग मानकर वैसे ही अनदेखा कर देते थे जैसे चुनाव के बाद नेता अपने वादों को भूल जाता है। दफ़्तर का बड़ा बाबू जब भी फाइलों का वह पुलिंदा लेकर निकलता जिसमें विकास की कब्र दफन होती थी तो बाबा अपनी लाठी के सहारे उम्मीद की वैशाखी टिकाकर खड़े हो जाते। बाबू गुस्से में चश्मा उतारकर ऐसे डांटता जैसे वह ब्रह्मा का अवतार हो और बाबा कोई तुच्छ कीट हों। वह कहता कि जब तक भूजल विभाग की एनओसी और ठेकेदार की रिश्वत रूपी रिपोर्ट का संगम नहीं होगा तब तक कागज़ का रथ आगे नहीं बढ़ेगा।गाँव के लोग सोचते थे कि बाबा शायद पुराना लगान माफ़ कराने का स्वांग रच रहे हैं क्योंकि आज के युग में बिना किसी स्वार्थ के सरकारी दफ़्तर की धूल फाँकना किसी पागलपन से कम नहीं समझा जाता। तभी एक दिन जिले के मुख्य विकास अधिकारी महोदय अपने लाव-लश्कर के साथ वैसे ही पधारे जैसे किसी पुराने खंडहर में अचानक बिजली चमक जाए। साहब की गाड़ी देखते ही अफ़सरों में वैसी ही भगदड़ मच गई जैसी राशन की दुकान पर कालाबाज़ारी करने वालों में मचती है। निरीक्षण के बाद जब साहब ने बाबा को देखा तो अपनी संवेदनशील छवि का विज्ञापन करने के लिए तुरंत उनके पास पहुँच गए क्योंकि जनता के बीच फोटो खिंचवाना भी तो सेवा का ही एक अंग है। साहब ने दुलार से पूछा कि बाबा इस धूप में यह फूटी बाल्टी क्यों थामे हैं क्या आपके गाँव में नल से जल की गंगा नहीं बह रही।रामचरित बाबा ने अपनी सूजी हुई आँखों से साहब की वर्दी के पीछे छिपे इंसान को तलाशने की कोशिश की और वह बाल्टी साहब के आगे ऐसे फैला दी जैसे वह पूरे तंत्र का कटोरा हो। उन्होंने कहा कि साहब अगर न्याय की स्याही अभी सूखी नहीं है तो इस बाल्टी के पेंदे पर छपा वह नंबर पढ़ लीजिए जो आपकी फाइलों में सुनहरे भविष्य की गारंटी देता है। साहब ने देखा तो उस पर जल निगम की वह शाही मुहर लगी थी जो पत्थरों को भी प्यासा रख सकती है। बाबा की आँखों से निकले आंसू उस बाल्टी के छेद से वैसे ही गिर रहे थे जैसे आम आदमी की उम्मीदें सरकारी योजनाओं की छलनी से बाहर गिर जाती हैं। बाबा बोले कि साहब तीन साल पहले अफ़सरों ने कागज़ों में समंदर खोद दिए और पाइपलाइन बिछा दी पर जब मेरी पोती ने नल खोला तो पानी के बदले यह खिलौना बाल्टी निकली जो ठेकेदार की सबसे बड़ी ईमानदारी थी। वह मासूम उस तपती दोपहर में दूर सूखे कुएं में पानी खोजने गई और गहराई में गिरकर वैसी ही गुम हो गई जैसे सरकारी राहत कोष में पैसा गुम हो जाता है। मैं रोज़ यह फूटी बाल्टी यहाँ इसलिए लाता हूँ ताकि आपकी व्यवस्था के इस बहरे कान को बता सकूँ कि फाइलों का नल आज भी सूखा है और आपकी तरक्की का पेंदा गायब है। यह सुनते ही साहब का हाथ कांप गया और पूरे ब्लॉक में वह सन्नाटा पसर गया जो अक्सर किसी बड़े घोटाले के पर्दाफाश होने के बाद छा जाता है।