नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों के पेशे की स्वतंत्रता को न्यायपालिका की स्वतंत्रता के समान महत्वपूर्ण बताते हुए कहा है कि किसी अधिवक्ता के पेशेवर आचरण या कथित कदाचार पर निर्णय लेने का अधिकार केवल संबंधित बार काउंसिल के पास है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी बाहरी एजेंसी या संस्था किसी वकील के पेशेवर आचरण पर नकारात्मक टिप्पणी दर्ज नहीं कर सकती और न ही उसे अपने स्तर पर ब्लैकलिस्ट कर सकती है। read more:https://khabarentertainment.in/staff-nurse-accuses-blood-center-operator-of-sexual-harassment-intimidation-and-mental-harassment-case-registered/जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि यदि किसी वकील के खिलाफ पेशेवर लापरवाही या कदाचार की शिकायत हो, तो संबंधित संस्था को सीधे कार्रवाई करने के बजाय बार काउंसिल ऑफ इंडिया या संबंधित राज्य बार काउंसिल से संपर्क करना चाहिए।अदालत ने यह भी कहा कि बैंक किसी अधिवक्ता का नाम अपनी कॉशन लिस्ट में डालकर उसे ब्लैकलिस्ट नहीं कर सकते। यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई जिसमें एक अधिवक्ता ने गलत कानूनी राय देने के आरोप में केनरा बैंक द्वारा उनका नाम कॉशन लिस्ट में शामिल किए जाने को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि यदि बैंक को वकील के पेशेवर आचरण पर आपत्ति थी, तो उसे इस संबंध में बार काउंसिल के समक्ष शिकायत करनी चाहिए थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह, जिन्हें न्यायालय ने एमिकस क्यूरी (अदालत की सहायता करने वाले अधिवक्ता) नियुक्त किया था, की उस दलील से भी सहमति जताई कि पेशेवर कदाचार के आरोपों की जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार कानून के तहत केवल बार काउंसिल के पास है।
सुप्रीम कोर्ट ने बदलते कानूनी परिवेश में अधिवक्ताओं के निरंतर प्रशिक्षण और कौशल विकास की आवश्यकता पर भी बल दिया। अदालत ने न्यायाधीशों के लिए कार्यरत राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी की तर्ज पर वकीलों के लिए एक राष्ट्रीय विधि अकादमी (नेशनल लीगल एकेडमी) स्थापित करने का सुझाव दिया। साथ ही बार काउंसिल ऑफ इंडिया को अपनी अनुशासनात्मक व्यवस्था की प्रभावशीलता और विश्वसनीयता का प्रदर्शन ऑडिट (परफॉर्मेंस ऑडिट) कराने तथा आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने का भी निर्देश दिया, ताकि न्याय व्यवस्था में लोगों का विश्वास और मजबूत हो सके।