मीनाक्षी मुखर्जी पश्चिम बंगाल में वामपंथ की एक नई आवाज़, SFI से मुख्यधारा तक

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में वामपंथ एक बार फिर युवा नेतृत्व के सहारे अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटा है। इसी कड़ी में मीनाक्षी मुखर्जी एक उभरता हुआ चेहरा बनकर सामने आई हैं, जो अब 2026 के विधानसभा चुनाव में हुगली जिले की उत्तरपाड़ा सीट से सीपीआई(एम) की उम्मीदवार के रूप में मैदान में हैं। उनकी उम्मीदवारी को वाम दलों की नई रणनीति, युवा और जमीनी नेतृत्व को आगे लाने का अहम हिस्सा माना जा रहा है। मीनाक्षी मुखर्जी ने अपनी राजनीतिक यात्रा छात्र राजनीति से शुरू की। वे स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) से जुड़ीं और बाद में 2008 में डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (डीवाईएफआई) में सक्रिय हुईं। शिक्षा, रोजगार और छात्र अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर उन्होंने लगातार आवाज उठाई, जिससे वे जल्द ही वामपंथी राजनीति में पहचान बनाने लगीं। वर्ष 2018 में वे डीवाईएफआई की पश्चिम बंगाल इकाई की अध्यक्ष बनीं और उसी वर्ष सीपीआई(एम) की राज्य समिति में भी शामिल हुईं। 2021 के विधानसभा चुनाव में मीनाक्षी ने नंदीग्राम सीट से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी जैसे दिग्गजों के खिलाफ चुनाव लड़ा था।read more:https://worldtrustednews.in/officials-are-unaware-that-rs-90000-was-withdrawn-in-the-name-of-boring/ हालांकि वे जीत हासिल नहीं कर सकीं, लेकिन उनके आक्रामक प्रचार और जमीनी पकड़ ने उन्हें राज्य स्तर पर पहचान दिलाई। इसके बाद वे विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय रहीं, जिनमें 2021 का ‘नबन्ना अभियान’ और अनीश खान मामले को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन प्रमुख रहे। उत्तरपाड़ा सीट पर इस बार मुकाबला त्रिकोणीय माना जा रहा है, जहां मीनाक्षी का सामना तृणमूल कांग्रेस के कंचक मलिक और भाजपा के दीपांजन चक्रवर्ती से है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव मीनाक्षी मुखर्जी के लिए केवल एक सीट जीतने का अवसर नहीं, बल्कि वामपंथ के पुनरुत्थान की परीक्षा भी है। युवा, आक्रामक और मुद्दा-आधारित राजनीति के चलते मीनाक्षी मुखर्जी को वामपंथ की नई आवाज के रूप में देखा जा रहा है, जिन पर पार्टी ने भविष्य की बड़ी जिम्मेदारियां भी दांव पर लगाई हैं।

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