नई दिल्ली,भारतीय ज्ञान-परंपरा, संस्कृत भाषा और श्रीमद्भगवद्गीता के संदेशों को युवा पीढ़ी तक पहुँचाने के उद्देश्य से डॉ. भीमराव अंबेडकर महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग द्वारा संस्कृत-भारती, दिल्ली के सहयोग से अंतरमहाविद्यालय श्लोकोच्चारण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। महाविद्यालय सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में विभिन्न महाविद्यालयों के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने श्रीमद्भगवद्गीता के द्वादश अध्याय ‘भक्तियोग’ के आठ श्लोकों का शुद्ध एवं प्रभावपूर्ण उच्चारण प्रस्तुत किया। प्रतिभागियों के उच्चारण की शुद्धता, स्वर, लय, स्पष्टता, स्मरण तथा प्रस्तुति-कौशल को प्रतियोगिता में विशेष महत्व दिया गया। विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों में संस्कृत भाषा के प्रति रुचि और भारतीय ज्ञान-परंपरा को समझने की उत्सुकता स्पष्ट दिखाई दी। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ भीमराव अंबेडकर महाविद्यालय ,चेयरमैन प्रो. रंजीत बेहेरा ने अपने वक्तव्य में कहा कि संस्कृत भाषा में भारत की हजारों वर्षों की ज्ञान-परंपरा समाहित है इसका अध्ययन युवाओं में संस्कृति और मूल्यों के प्रति नई चेतना जगाता है। विशिष्ठ अतिथि प्रो. बिजेंद्र कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन और दर्शन की पहचान है इसके संरक्षण और संवर्धन की जिम्मेदारी हम सभी की है। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि लवीश कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा कि संस्कृत भाषा हमारे भारत की प्राचीन धरोहर है संस्कृत भाषा ही नहीं बल्कि हमारी परंपरा का आधार है। डॉ भीमराव अंबेडकर महाविद्यालय के संस्कृत विभाग प्रभारी प्रो. सरला भारद्वाज ने अपने वक्तव्य में कहा कि संस्कृति हमारी भाषा ही नहीं बल्कि पहचान का एक स्वरूप है कार्यक्रम की संयोजिका डॉ सुनीता शर्मा ने कहा कि संस्कृत हमारी ज्ञान, संस्कृति और परंपरा की समृद्ध धरोहर है। इसे युवा पीढ़ी से जोड़ना हमारी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।read more:https://pahaltoday.com/demand-to-remove-government-country-liquor-shop-villagers-stage-protest-at-the-collectorate/#google_vignetteतथा इस कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डॉ नीतीश कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा कि संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य, दर्शन, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान की महत्वपूर्ण संवाहक है विद्यार्थियों को संस्कृत के मूल ग्रंथों से जोड़ने के लिए इस प्रकार की गतिविधियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। गीता के श्लोकों का नियमित अध्ययन और उच्चारण विद्यार्थियों में एकाग्रता, स्मरण शक्ति, अनुशासन और आत्मविश्वास को बढ़ाने के साथ भारतीय दर्शन के प्रति उनकी जिज्ञासा को भी विकसित करता है।प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने अपनी प्रतिभा का प्रभावी प्रदर्शन किया। उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों में प्रथम नव्या निराली,मिरान्डा हाउस महाविद्यालय,द्वितीय विघ्नेश,मिरान्डा हाउस महाविद्यालय एवं तृतीय संचित रंजन,डॉ भीमराव अंबेडकर महाविद्यालय को प्राप्त हुआ। विजेताओं को प्रोत्साहित करने के लिए प्रथम पुरस्कार 3,100 रुपये, द्वितीय पुरस्कार 2,100 रुपये तथा तृतीय पुरस्कार 1,100 रुपये की धनराशि तथा तीन सांत्वना पुरस्कार 700 रुपये की नगद धनराशि से हिमांशु ,आयोग,प्रतीक्ष को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के दौरान संस्कृत-भारती, दिल्ली की ओर से वस्तु एवं पुस्तक प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। इसमें संस्कृत साहित्य, भारतीय संस्कृति और ज्ञान-परंपरा से संबंधित पुस्तकों एवं सामग्री को प्रदर्शित किया गया। विद्यार्थियों ने प्रदर्शनी में रुचि दिखाई और संस्कृत साहित्य से संबंधित विभिन्न पुस्तकों की जानकारी प्राप्त की।कार्यक्रम का आयोजन महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. सदानंद प्रसाद, संस्कृत विभाग की प्रभारी प्रो. सरला भारद्वाज तथा संस्कृत विभाग की सहायक आचार्या एवं कार्यक्रम की संयोजिका डॉ. सुनीता शर्मा के मार्गदर्शन में किया गया। विद्यार्थी स्तर पर कार्यक्रम के संचालन एवं समन्वय में शार्दूल पाण्डेय, लक्की,करन, एवं ऋषिकेश ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम ने विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने के साथ मंच पर अपनी प्रतिभा प्रस्तुत करने का अवसर दिया। आयोजकों का मानना है कि आज के तकनीकी और तेजी से बदलते परिवेश में युवाओं को भारतीय ज्ञान-परंपरा से जोड़ना आवश्यक है। ऐसे आयोजन संस्कृत के संरक्षण और संवर्धन के साथ नई पीढ़ी में भारतीय संस्कृति, साहित्य और दर्शन के प्रति रुचि पैदा करने में सहायक होंगे।डॉ. भीमराव अंबेडकर महाविद्यालय में आयोजित यह प्रतियोगिता संस्कृत भाषा को विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी से जोड़ने और भारतीय ज्ञान-परंपरा को युवा पीढ़ी तक पहुँचाने की दिशा में एक सार्थक पहल रही।