दूसरों की खुशी में

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 
ज़िंदगी कभी-कभी उस पक्की सड़क की तरह हो जाती है, जो साफ़-सुथरी और संवरी हुई तो दिखती है, पर उसके ठीक बगल में एक गहरी खाई होती है। यह कहानी भी उसी खाई के मुहाने पर खड़ी है, जहाँ एक तरफ़ ज़िम्मेदारी का बोझ था और दूसरी तरफ़ मासूमियत की बेबसी। एक ढलती हुई दोपहर में, जब सूरज की किरणें खेतों में सोने की तरह बिखरी हुई थीं, तब उस गहरी, संकरी खाई के एक छोर पर चार छोटे-छोटे बत्तख के बच्चे और उनकी माँ बेबस खड़े थे। खाई इतनी गहरी थी कि उन नन्हें कदमों के लिए उसे पार करना आसमान से तारे तोड़ने जैसा था। माँ बत्तख ने फड़फड़ाकर खाई लांघी और सड़क पर आ खड़ी हुई, मानो कह रही हो कि ‘चले आओ, दुनिया बहुत ख़ूबसूरत है।’ लेकिन उन बच्चों के लिए वह खाई एक ऐसी दीवार थी जिसे लाँघना उनके बूते का नहीं था। वे चीं-चीं करते हुए जीवन की इस पहली बड़ी परीक्षा के सामने सहमे खड़े थे, मानो कह रहे हों कि हर राह दिखाने वाला राह पार कराने वाला नहीं होता।read more:https://khabarentertainment.in/cunning-man-arrested-for-pressuring-woman-into-marriage-through-blackmail/ठीक उसी वक़्त, उस साफ़ सड़क पर एक सफ़ेद, रोएँदार पिल्ला मटकता हुआ आया। वह कोई बड़ा समाजसेवी नहीं था, न ही उसके पास दुनिया को बदलने की कोई बड़ी योजना थी। वह तो बस ज़िंदगी को उसके पूरे शबाब में जी रहा था। उसकी आँखें कंचों जैसी साफ़ थीं और उसकी पूँछ में एक अजीब सी बेफ़िक्री का आलम था। जब उसने खाई के उस पार तड़पते बच्चों को देखा, तो उसकी बेफ़िक्री हवा हो गई। वहाँ कोई तमाशा नहीं चल रहा था, बल्कि ज़िंदगी और उम्मीद के बीच एक जंग चल रही थी। पिल्ला थोड़ी देर ठिठका, उसने स्थिति का जायजा लिया। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक तैरने लगी कि अब क्या होगा? क्या वह भी इंसानों की तरह सिर्फ़ तमाशा देखकर आगे बढ़ जाएगा या फिर अपनी मासूमियत का कोई नया अध्याय लिखेगा?अगला पल दिल थाम देने वाला था। पिल्ले ने एक पल की भी देरी नहीं की और अपनी जान की परवाह किए बिना उस गहरी खाई के ऊपर अपने अगले पैर टिका दिए। उसका शरीर एक जीवित पुल बन गया। यह एक ऐसा पुल था जिसके पास कोई सीमेंट नहीं था, कोई लोहा नहीं था, बस एक निश्छल दिल था। उसने अपनी पीठ को उस गहरी खाई के ऊपर इस तरह तान दिया, मानो वह कह रहा हो कि ‘चोट लगेगी तो मुझे लगेगी, तुम बस पार हो जाओ।’ हवा ठहर सी गई थी, पत्तों ने हिलना बंद कर दिया था।  माहौल इस कदर गहराया कि अगर पिल्ले का पैर ज़रा सा भी फिसलता, तो वह और वे मासूम बच्चे उस गहरी खाई में समा जाते। पर उसने हार नहीं मानी, वह अंगद के पैर की तरह जम गया।तभी एक-एक करके वे चारों बत्तख के बच्चे उस जीती-जागती पीठ पर चढ़ने लगे। उनके छोटे-छोटे पैर जब पिल्ले की मुलायम पीठ को छू रहे थे, तो ऐसा लग रहा था मानो कोई कलाकार कैनवास पर ज़िंदगी के सबसे ख़ूबसूरत रंग उकेर रहा हो। एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखते हुए, वे बच्चे पिल्ले की पीठ को सीढ़ी बनाकर खाई के इस पार यानी सुरक्षित सड़क पर आने लगे। आख़िरी बच्चे के पैर रखते ही पिल्ले ने अपनी पूरी ताक़त झोंक दी और उन सबको सड़क पर सुरक्षित पहुँचा दिया। यह दृश्य देखकर ऐसा लगा मानो वक़्त रुक गया हो और प्रकृति इस निस्वार्थ प्रेम के सामने नतमस्तक हो गई हो। इंसानी दुनिया में जहाँ लोग दूसरों की कमज़ोरियों पर हँसते हैं, वहाँ इस बेज़ुबान ने अपनी जान जोखिम में डालकर इंसानियत का एक ऐसा पाठ पढ़ा दिया था जिसे देखकर किसी भी सहृदय व्यक्ति की आँखें भर आई। जैसे ही सारे बच्चे सुरक्षित सड़क पर आ गए, पिल्ले ने एक छलाँग लगाई और खाई से बाहर आ गया। उसने अपनी पूँछ हिलाई, मानो कह रहा हो कि ‘काम ख़त्म, अब चलो खेलें।’ तभी माँ बत्तख उसके पास आई और उसने पिल्ले को गले से लगा लिया। वह एक ऐसा आलिंगन था जिसमें कृतज्ञता के आंसू थे और एक माँ का अनकहा शुक्रिया था। बत्तख के बच्चे पिल्ले के चारों ओर ऐसे चहकने लगे जैसे वे अपने किसी खोए हुए भाई से मिल रहे हों। यह नज़ारा देखकर सड़क के किनारे खड़े उस आलीशान बंगले के मालिक ने अपनी चमचमाती कार का शीशा नीचे किया, एक पल के लिए इस दृश्य को देखा, और फिर मोबाइल पर किसी को डाँटते हुए आगे बढ़ गया। उसे इस बात का अहसास ही नहीं था कि उसके ठीक बगल में प्रकृति ने स्वार्थ और परमार्थ का सबसे बड़ा नाटक खेल दिया था।आज के दौर में जब इंसान अपने फ़ायदे के लिए अपनों की ही पीठ में छुरा घोंपने से बाज़ नहीं आता, वहाँ एक बेज़ुबान जानवर ने अपनी पीठ को दूसरों के लिए पुल बना दिया। हम इंसानों ने बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ ले लीं, बड़े-बड़े महल बना लिए, पर दिल इतने तंग कर लिए कि किसी की बेबसी देखकर भी हमारे कदम नहीं ठिठकते। हम सोशल मीडिया पर संवेदनाओं का व्यापार करते हैं, पर ज़मीनी हक़ीक़त में हम उस बत्तख की माँ से भी बदतर हैं जो अपने बच्चों को संकट में छोड़कर आगे बढ़ जाती है, और उस पिल्ले से तो हमारी कोई तुलना ही नहीं है जो बिना किसी स्वार्थ के अपना सर्वस्व दांव पर लगा देता है। यह रोएँदार सफ़ेद पिल्ला आज की मतलबी इंसानी सभ्यता के मुंह पर एक ज़ोरदार तमाचा है, जो चीख-चीख कर कह रहा है कि पुल बनने के लिए पत्थरों की नहीं, एक धड़कते हुए और संवेदनशील दिल की ज़रूरत होती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *