बघाड़ू भूमि प्रकरण में प्रशासन की कार्रवाई पर हाईकोर्ट की लगी मुहर

सोनभद्र। दुद्धी तहसील के बघाड़ू गांव में जनजातीय भूमि के बैनामों से जुड़े प्रकरण में जिला प्रशासन की कार्रवाई को इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत मिली है। न्यायालय ने राजस्व प्रशासन द्वारा विवादित बैनामों को कानूनन शून्य घोषित कर भूमि को सरकारी खाते में निहित किए जाने की कार्रवाई में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। प्रशासन के अनुसार जांच के बाद रजिया उर्फ नन्हकी के नाम कराए गए बैनामों से संबंधित 40 गाटों की करीब 5.7142 हेक्टेयर भूमि को ग्राम सभा में निहित किया गया था। जिलाधिकारी चर्चित गौड़ के अनुसार बघाड़ू में जनजातीय समाज की जमीनों की खरीद-फरोख्त से संबंधित प्रकरण सामने आने के बाद राजस्व अभिलेखों और बैनामों की जांच कराई गई। प्रशासन का आरोप है कि बहादुर अली से निकाह के बाद रजिया की पहचान और सामाजिक स्थिति से जुड़े तथ्यों को छिपाकर अनुसूचित जनजाति के नाम पर भूमि खरीदने के लिए दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। प्रशासन की कार्रवाई के विरुद्ध रजिया की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी, जिस पर सुनवाई के बाद अदालत ने प्रशासनिक आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया। उपलब्ध न्यायालय संबंधी रिपोर्टों के मुताबिक अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल जन्म से किसी समुदाय से होना पर्याप्त नहीं हैय संबंधित व्यक्ति का जनजातीय रीति-रिवाजों और समुदाय से वास्तविक जुड़ाव भी मामले के तथ्यों के आधार पर देखा जा सकता है। प्रशासन का कहना है कि बघाड़ू प्रकरण में भूमि संरक्षण से जुड़े प्रावधानों के तहत कार्रवाई की गई है। इससे पहले प्रशासनिक जांच में रजिया के नाम कई बैनामे सामने आने की जानकारी भी सार्वजनिक हुई थी। दिसंबर 2025 में सामने आई रिपोर्टों में रजिया के नाम 34 और एक अन्य महिला नन्हकी के नाम 14 बैनामों की जांच और उन्हें निरस्त करने की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया था।

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अब जन उपयोगी कार्यों की तैयारी
जिलाधिकारी ने बताया कि ग्राम सभा में निहित भूमि का उपयोग क्षेत्र के लोगों के हित में किए जाने की योजना है। प्रस्तावित कार्यों में बच्चों के लिए खेल का मैदान और बारात घर का निर्माण शामिल है। इसके साथ ही समाज सुधारक बिरसा मुंडा की प्रतिमा स्थापित करने तथा शेष भूमि पर आवश्यक शासकीय भवनों के निर्माण की दिशा में भी कार्रवाई की जा रही है।
जनजातीय रीति-रिवाज से जुड़ाव पर अदालत ने किया विचार
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह सवाल भी उठा कि लंबे समय तक दूसरे धर्म और सामाजिक परिवेश में रहने के बाद संबंधित व्यक्ति द्वारा अनुसूचित जनजाति से मिलने वाले विधिक संरक्षण का दावा किन परिस्थितियों में किया जा सकता है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल जाति प्रमाणपत्र ही निर्णायक नहीं होता, बल्कि जनजातीय परंपराओं, रीति-रिवाजों और संबंधित समुदाय से सामाजिक जुड़ाव सहित पूरे तथ्यात्मक परिदृश्य को देखा जाना आवश्यक है।

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