बहराइच ( नानपारा )l आधुनिक परिवहन व्यवस्था के विस्तार के साथ ही पारंपरिक हाथ से चलने वाले पैडल रिक्शों का अस्तित्व धीरे-धीरे समाप्त होने की कगार पर है। सीएनजी ऑटो, ई-रिक्शा, बैटरी चालित वाहन और निजी कारों के बढ़ते उपयोग ने हाथ पैडिल रिक्शा चालकों की आजीविका पर गहरा असर पड़ा है।
एक समय हुआ करता था जब लोग तांगे की सवारी पसंद करते थे समय के साथ शोले में बसंती तांगेवाली प्रसिद्ध हुई वर्ष 2010 के बाद धीरे-धीरे तांगे की सवारी समाप्त हो गई l हाथ की स्टेरिंग और पैडल से चलने वाले रिक्शे पहले खूब चलते थे संपन्न लोग रिक्शा पर बैठते थे और रिक्शा चालक पैडल चला कर सवारियों को खींच कर ले जाते थे रिक्शा चालक की खून पसीने की कमाई हुआ करती थी परंतु आधुनिक युग के चलते धीरे-धीरे पैडल रिक्शा भी समाप्त होने को है यह रिक्शा कहीं कहीं दिख जाते हैं l read more:https://pahaltoday.com/retired-teachers-and-shikshamitras-honored-at-baragaon-brc/
पिछले 35 वर्षों से पैडल रिक्शा चलाकर लोगों को उनके गंतव्य स्थान तक पहुंचाने वाले ग्राम गुलाल पुरवा निवासी रिक्शा चालक गुलाम सब्बीर बताते हैं कि अब उन्हें पहले की तरह सवारियां नहीं मिलतीं दिन भर भटकने को मजबूर हैं उनका कहना है कि बदलते समय में यात्री पैडल रिक्शे की अपेक्षा सीएनजी ऑटो, ई-रिक्शा या अन्य आधुनिक वाहनों से यात्रा करना अधिक पसंद करते हैं। इसके कारण उनकी आमदनी लगातार घटती जा रही है।गुलाम सब्बीर के अनुसार स्थिति इतनी कठिन हो गई है कि रिक्शा चलाकर मिलने वाली आय से परिवार का भरण-पोषण भी संभव नहीं हो पा रहा है। उन्होंने बताया कि परिवार के सदस्यों को किसी तरह इधर-उधर से सहायता लेकर जीवनयापन करना पड़ रहा है। बढ़ती महंगाई और घटती आय ने उनके सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है।उन्होंने सरकार से मांग की है कि वर्षों से पैडल रिक्शा चलाकर जीवनयापन करने वाले लोगों के लिए विशेष सहायता योजना चलाई जाए। उनका कहना है कि यदि उन्हें स्वरोजगार, ई-रिक्शा, लघु व्यवसाय या अन्य रोजगार के लिए आर्थिक सहायता एवं प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए तो वे सम्मानपूर्वक अपने परिवार का पालन-पोषण कर सकेंगे।स्थानीय लोगों का मानना है कि तकनीकी बदलाव के इस दौर में पारंपरिक रोजगार से जुड़े लोगों के पुनर्वास और वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था करना आवश्यक है, ताकि कोई भी परिवार आजीविका के संकट का सामना न करे।