फुटपाथ: चलना अधिकार ही नहीं, सुरक्षित अनुभव भी होना चाहिए

अनिकेत सिंह
फुटपाथ पर सुरक्षित रूप से चलना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है। किसी भी आधुनिक शहर की पहचान केवल चौड़ी सड़कों और तेज रफ्तार यातायात से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वहां पैदल चलने वालों के लिए कितनी सुरक्षित और सुविधाजनक व्यवस्था उपलब्ध है। दुर्भाग्य से भारत के अधिकांश शहरों में पैदल यात्रियों की सुरक्षा आज भी गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है।
हाल ही में एक सड़क दुर्घटना मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि फुटपाथ पर चलना नागरिकों का मूलभूत अधिकार है और उन्हें सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना सरकार तथा स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है। विशेष रूप से बुजुर्गों, दिव्यांगों और दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए सुरक्षित फुटपाथ जीवन की आवश्यकता हैं, न कि कोई अतिरिक्त सुविधा।विभिन्न अध्ययनों और सर्वेक्षणों से यह तथ्य सामने आया है कि भारत में पैदल चलना लगातार जोखिमपूर्ण होता जा रहा है। सड़क सुरक्षा संबंधी रिपोर्टों के अनुसार देश में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली कुल मौतों का बड़ा हिस्सा पैदल यात्रियों का है। वर्ष 2018 से 2023 के बीच डेढ़ लाख से अधिक पैदल यात्रियों ने दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाई। परिवहन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022 में 32,825 तथा वर्ष 2023 में 35,221 पैदल यात्रियों की मृत्यु हुई। यह स्थिति बताती है कि पैदल यात्रियों की सुरक्षा को लेकर अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।कर्नाटक के एक मामले में पांच वर्षीय बालक की सड़क दुर्घटना में मृत्यु के बाद सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन को फुटपाथ तथा सड़क सुरक्षा के संबंध में आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए। यह मामला केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि देशभर की शहरी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।read more:https://pahaltoday.com/census-of-india-will-be-digital-in-2027-in-bhadohi/फुटपाथों की सबसे बड़ी समस्या अतिक्रमण है। अनेक शहरों में फुटपाथ रेहड़ी-पटरी, अस्थाई निर्माण और अवैध पार्किंग की चपेट में हैं। कई स्थानों पर दोपहिया और चारपहिया वाहन सीधे फुटपाथ पर खड़े कर दिए जाते हैं, जिससे पैदल चलने वालों को मजबूरन सड़क पर उतरना पड़ता है। परिणामस्वरूप दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।दूसरी बड़ी समस्या फुटपाथों की खराब गुणवत्ता है। नई सड़कों के साथ फुटपाथ तो बनाए जाते हैं, लेकिन उनका रखरखाव नहीं हो पाता। टूटी टाइलें, गड्ढे और असमतल सतहें विशेष रूप से बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए खतरा बन जाती हैं। कानूनों की कमी नहीं है, कमी उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है।दुनिया के कई देशों ने पैदल यात्रियों को प्राथमिकता देकर उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। जापान और सिंगापुर के फुटपाथ विश्व के सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। वहां दृष्टिबाधितों के लिए विशेष टेक्टाइल टाइलें, दिव्यांगों के लिए सुगम मार्ग, वर्षा और धूप से बचाव हेतु शेड तथा वाहनों को रोकने के लिए मजबूत अवरोधक बनाए गए हैं। उद्देश्य केवल लोगों को चलने की सुविधा देना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक अनुभव प्रदान करना है।भारत में भी समय आ गया है कि फुटपाथों को शहरी विकास की परिधि से निकालकर केंद्र में रखा जाए। जब तक पैदल चलने वाला व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं करेगा, तब तक किसी भी शहर को वास्तव में नागरिक-अनुकूल नहीं कहा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी एक महत्वपूर्ण अवसर है। आवश्यकता इस बात की है कि सरकारें, स्थानीय निकाय और समाज मिलकर ऐसे फुटपाथ विकसित करें, जहां चलना मजबूरी नहीं, बल्कि सुखद अनुभव बने।

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