डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
शाम का कोहरा चारों तरफ अपनी चादर पसार चुका था और रेलवे स्टेशन के किनारे बने चाय के टिन शेड के नीचे लटकती मद्धम बत्ती की रोशनी में सुखदेव बाबा की परछाई किसी ढहते हुए स्तूप की तरह डगमगा रही थी। उनके चेहरे की गहरी झुर्रियों में केवल वक्त की मार नहीं, बल्कि एक रूह कंपा देने वाली टीस और गहरा सन्नाटा छिपा था, जैसे किसी ने उनकी सांसों के भीतर का सब कुछ लूट लिया हो। चाय की दुकान के एक कोने में बेंच पर बैठा मैं उनकी थमी हुई धड़कनों को महसूस कर रहा था, जहां हवा में केतली की भाप कम और किसी आने वाले तूफान की खामोशी ज्यादा मंडरा रही थी। सुखदेव बाबा ने जब अपनी कांपती और सर्द उंगलियों से मेरी कलाई छुई, तो ऐसा लगा मानो कोई उखड़ा हुआ दरख्त गिरने से पहले आखिरी सहारा ढूंढ रहा हो। उनकी आंखों का पानी कब का पथरा चुका था, लेकिन उनके भीतर उमड़ता हुआ रोना सीधे सुनने वाले के कलेजे को चीरता हुआ बाहर आ रहा था। वह रह-रहकर सूनी रेल पटरियों की तरफ देखते और फिर अपने दोनों हाथों को पेट पर ऐसे भींच लेते, जैसे कोई भूखा इंसान अपने भीतर उठने वाले दर्द को दबाने की नाकाम कोशिश कर रहा हो। इस मंजर को देखकर वहां मौजूद हर मुसाफिर का दिल मसोस उठा था, क्योंकि सुखदेव बाबा जैसे धीर-गंभीर बुजुर्ग का इस तरह बिखर जाना किसी मजबूत चट्टान के जमींदोज होने जैसा था।”का बताई बबुआ, भीतर जौन आरी चल रही है, ऊ सिर्फ हम जानते हैं या फिर ऊपर बैठा वह घटघटवासी जानता है।” सुखदेव बाबा की आवाज में पूस की ठंडी हवा जैसी सिहरन और बेबसी दोनों एक साथ गुथी हुई थी। “दुनिया को लगता है कि हम सिर्फ इस अनाथालय की जमीन छिन जाने या कुछ रुपयों की हेराफेरी पर आंसू बहा रहे हैं, पर सच तो यह है कि उन्होंने हमारी रगों से जीने की आखिरी उम्मीद तक निचोड़ ली है।” मैंने उनके गालों पर जमे सूखे आंसुओं को पोंछने के लिए अपना रूमाल आगे बढ़ाया, लेकिन उन्होंने बेहद हताशा से मेरा हाथ हटा दिया और बोले, “यह आंसू नहीं हैं बबुआ, यह तो उस इंसानियत का जनाजा है जिसे हमने अपनी पूरी जवानी गलाकर इस सूनी बस्ती में सहेजा था।” उनकी बातें किसी नुकीले खंजर की तरह सीधे रूह के पार हो रही थीं और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इस टूटे हुए इंसान को किस लफ्ज से संभालूं। वहां खड़ी पूरी भीड़ जैसे जड़ होकर अपनी सुबकियां रोकने की कोशिश कर रही थी, सबकी आंखें डबडबा आई थीं और हर कोई बस उनके मुंह से निकलने वाले एक-एक बोल को कयामत की तरह महसूस कर रहा था।”आप हिम्मत मत हारिए सुखदेव बाबा, आखिर कानून अंधा नहीं होता और गुनाह करने वाला अपनी आखिरी सांस तक जेल की सलाखों के पीछे तड़पेगा।” मैंने जब उन्हें सांत्वना देने के लिए यह कहा, तो सुखदेव बाबा ने एक कड़वी और सर्द मुस्कान के साथ मेरी तरफ देखा, जिसने मेरे पूरे बदन में एक सिहरन पैदा कर दी। “कानून की बात मत करो बबुआ, जब अदालत की रखवाली करने वाले ही सौदागर बन जाएं तो फिर किस चौखट पर जाकर अपना माथा पटकोगे।” सुखदेव बाबा ने अपनी फटी हुई चादर के कोने से माथे का पसीना पोछते हुए कहा, “हमें तो इस बात का मलाल है कि हम उस भेड़िये की फितरत को भांप नहीं पाए जो हमारे साथ हर रोज एक मसीहा का मुखौटा पहनकर बैठता था।” उनकी बोली में माटी की वह सौंधी मगर तड़पती हुई पुकार थी जो सीधे दिल को छलनी कर देती है, जिसमें कोई बनावट नहीं बल्कि एक छलनी की जा चुकी आत्मा की आखिरी चीख थी। तभी अचानक बिजली चली गई और चाय वाले की भट्टी की लाल आंच ने वहां फैले अंधेरे और रुलाई को और ज्यादा डरावना और रहस्मय बना दिया।read more:https://khabarentertainment.in/call-to-embrace-dr-syama-prasad-mookerjees-ideas-bjp-organizes-an-ideological-seminar/“चोरों और धोखेबाजों की सुई तो बहुत छोटी है बाबू जी, यहां तो पूरा का पूरा समंदर ही जहर से नीला हो चुका है।” पास खड़ा चायवाला बर्तन साफ करते हुए अपने आंसुओं को रोक नहीं पाया और सुबकते हुए बीच में बोल पड़ा, जिसने पूरे माहौल के तनाव को और ज्यादा बढ़ा दिया था। “हमने तो सुना है कि जो इस काले कारनामे के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश कर रहा था, उसे भी हमेशा के लिए ऐसी जगह भेज दिया गया जहां से कोई लौटकर नहीं आता।” इस बात को सुनते ही सुखदेव बाबा के हलक से एक ऐसी चीख निकली जिसने रात के सन्नाटे को तार-तार कर दिया, मानो किसी ने उनके कच्चे घाव पर सुलगता हुआ कोयला रख दिया हो। “अपने ही पाले हुए हाथों से अपने आशियाने को उजड़ते देखना कितना जानलेवा होता है, यह कोई उस बूढ़े बागबान से पूछे जिसकी आंखों के सामने उसकी सबसे नायाब कली को पैरों तले रौंद दिया गया हो।” उनकी यह उपमा सीधे कलेजे पर लगी और वहां खड़े मुसाफिर अपनी हथेलियों में मुंह छिपाकर फूट-फूटकर रोने लगे।”धीरज रखिए बाबा, कुदरत के घर में देर है मगर अंधेर नहीं, जिसने भी यह पाप किया है उसे इसकी कीमत चुकानी ही पड़ेगी।” एक बुजुर्ग मुसाफिर ने सुखदेव बाबा के कंधे पर हाथ रखते हुए रुंधे हुए गले से कहा, लेकिन सुखदेव बाबा का ध्यान तो जैसे इस फानी दुनिया से पूरी तरह टूट चुका था। “कीमत की बात मत करो भाई, यहां तो सेवा के नाम पर सियासत का ऐसा खूनी खेल खेला गया है कि खुद इंसानियत भी अपने होने पर शर्मिंदा हो रही होगी।” उन्होंने शून्य में अपनी उंगली उठाई और कांपते हुए चिल्लाए, “अगर वाकई इस दुनिया में कोई इंसाफ जिंदा है, तो वह इस तबाही को चुपचाप कैसे देख सकता है, क्या उसकी लाठी की आवाज भी अब बहरी हो चुकी है।” उनके इस सवाल ने वहां मौजूद हर शख्स के भीतर एक ऐसा खालीपन और खौफ भर दिया, जिसकी भरपाई दुनिया की कोई भी सांत्वना नहीं कर सकती थी। सुखदेव बाबा की आंखें अब पूरी तरह पथरा चुकी थीं और उनका पूरा वजूद किसी सूखे पत्ते की तरह थर-थर कांप रहा था।तभी स्टेशन के बाहर एक तेज रफ्तार पुलिस की गाड़ी आकर रुकी और उसमें से एक उदास चेहरे वाला इंस्पेक्टर उतरकर सीधा सुखदेव बाबा के पास आया, जिसके हाथ में एक लोहे का पुराना संदूक था। इंस्पेक्टर ने बहुत ही भारी और कांपती हुई आवाज में सुखदेव बाबा को देखते हुए कहा, “बाबा, आपकी अंतहीन तलाश अब खत्म हो गई है और जिस खौफनाक सच को सब छिपा रहे थे, वह अब बेपर्दा हो चुका है।” सुखदेव बाबा ने जैसे ही उस संदूक को देखा, उनके चेहरे की बची-कुची रौनक भी उड़ गई और वह सीधे ठंडी जमीन पर ढह गए। इंस्पेक्टर ने जब संदूक का ताला खोला तो उसमें अनाथालय के चोरी हुए दस्तावेज या पैसे नहीं थे, बल्कि सुखदेव बाबा की इकलौती लापता पोती की खून से सनी हुई गुड़िया और उसकी स्कूल की आईडी थी। इंस्पेक्टर ने रुआंसे होकर कहा, “बाबा, अनाथालय में कोई डकैती नहीं हुई थी, बल्कि आपकी पोती ने ही वहां के ट्रस्टियों के घिनौने चेहरे को देख लिया था, इसलिए उन्होंने उसकी जान ले ली और खुद ही चोरी का झूठा ड्रामा रचा ताकि पूरा समाज गुमराह हो जाए और आपकी बच्ची हमेशा के लिए गायब मान ली जाए।” यह खौफनाक और अंतिम सत्य सुनते ही सुखदेव बाबा ने उस गुड़िया को अपने सीने से चिपका लिया और एक ऐसी मर्मभेदी दहाड़ मारी कि स्टेशन का जर्रा-जर्रा कांप उठा, जिसकी भयावह कल्पना वहां खड़े किसी भी इंसान ने अपनी बदतरीन रातों में भी नहीं की थी।