स्नेहा सिंह
अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता अंतिम रूप ले चुका है। इसके चलते विश्वभर में राहत का माहौल बना है। घोषणा के बाद कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई और वैश्विक बाजारों में भी सामान्य स्थिति दिखाई दी। लोगों को लग रहा है कि अब हालात सुधर जाएंगे और वैश्विक ऊर्जा संकट समाप्त हो जाएगा। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच हुआ यह समझौता जितना सरल दिखाई देता है, वास्तव में उतना सरल नहीं है।चाहे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प हों, पेंटागन हो या ईरान का नेतृत्व, किसी के पास ऐसी जादुई छड़ी नहीं है कि एक झटके में सब कुछ सामान्य कर दिया जाए। सबसे बड़ी बात यह है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य वास्तव में कब पूरी तरह खुलेगा, यह किसी को नहीं पता। यदि इसे खोल भी दिया जाए, तब भी विश्वभर में तेल और गैस की आपूर्ति सामान्य होने में कई वर्ष लग सकते हैं।
व्यावहारिक रूप से देखें तो पिछले 100 दिनों से अधिक समय से यह समुद्री मार्ग बंद है। युद्ध के कारण खाड़ी देशों ने तेल उत्पादन बंद या कम कर दिया था और अपने भंडारों का उपयोग किया था। अब यदि समझौते के बाद शुक्रवार से मार्ग खुल भी जाता है, तो यह मान लेना गलत होगा कि युद्ध-पूर्व स्थिति तुरंत लौट आएगी। सामान्य स्थिति बहाल होने में लंबा समय लगेगा।गौरतलब है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य से विश्व का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है। कतर की 93 प्रतिशत एलएनजी और यूएई का 96 प्रतिशत तेल एवं गैस निर्यात भी इसी रास्ते से होता है। सऊदी अरब और यूएई के पास कुछ पाइपलाइनें अवश्य हैं, लेकिन उनकी क्षमता सीमित है। इनके माध्यम से कुछ मात्रा में तेल भेजा जा सकता है, लेकिन गैस परिवहन के लिए जहाजों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।इस मार्ग के बंद होने से वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति में लगभग 20 प्रतिशत की कमी आ गई। हर सप्ताह लगभग 200 करोड़ घन मीटर गैस की आपूर्ति बाधित हुई। सरल शब्दों में कहें तो आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा तेल और गैस संकट पैदा हो गया।विशेषज्ञों का मानना है कि केवल समुद्री मार्ग खुल जाने से समस्या का समाधान नहीं हो जाएगा। कतर के गैस संयंत्रों को हुए नुकसान की भरपाई होने में कम से कम पांच वर्ष लग सकते हैं। रिपोर्टों के अनुसार इस संयंत्र की कुल उत्पादन क्षमता में लगभग 17 प्रतिशत की कमी आ गई है। कतर को अपनी गैस आपूर्ति पूर्ववत करने में लंबा समय लगेगा।कतर ने यह भी स्पष्ट किया है कि जब तक उसके जहाजों के संचालन के लिए पर्याप्त सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलती, तब तक वह उत्पादन पूरी क्षमता से शुरू नहीं करेगा। इसलिए हॉर्मुज खुल जाने के बाद भी तुरंत बाजार में तेल और गैस की बाढ़ नहीं आने वाली।ईरान, सऊदी अरब, कुवैत और कतर के तेल एवं गैस केंद्रों पर हुए हमलों से हुए नुकसान की मरम्मत और उन्हें पूर्ण क्षमता से चालू करने में भी काफी समय लगेगा।महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सोमवार तक हॉर्मुज और उसके आसपास की स्थिति लगभग सामान्य ही थी। समुद्री ट्रैकिंग कंपनियों, नाविकों और विशेषज्ञों के अनुसार वहां कोई असाधारण गतिविधि नहीं देखी गई। किसी भी जहाज या उसके चालक दल को अभी तक पूर्ण संचालन शुरू करने के स्पष्ट निर्देश नहीं मिले थे।हालांकि लगभग डेढ़-दो महीने बाद जीपीएस संकेत फिर से उपलब्ध होने लगे हैं, जिससे जहाजों को रास्ता पहचानने में आसानी होगी। लेकिन जहाज कब चलेंगे, किस प्रकार चलेंगे और कितनी संख्या में चलेंगे, इसका उत्तर फिलहाल किसी के पास नहीं है।सूत्रों के अनुसार अभी केवल समुद्री मार्ग खोलने की बात हुई है।read more:https://pahaltoday.com/retired-teachers-and-shikshamitras-honored-at-baragaon-brc/ वास्तविक महत्त्व इस बात का है कि जहाजों की आवाजाही कब शुरू होगी। उससे पहले समुद्र में बिछाई गई समुद्री सुरंगों (माइन) को हटाना होगा, संभावित खतरों को समाप्त करना होगा और तेल तथा गैस निर्यात करने वाले बंदरगाहों तक टैंकरों को सुरक्षित पहुंचाना होगा।विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि जून के अंत तक भी हॉर्मुज पूरी तरह खोल दिया जाता है, तो एशियाई देशों तक तेल और गैस पहुंचने, उसका प्रसंस्करण होने और अंतिम उपभोक्ताओं तक पहुंचने में 60 से 70 दिन लग सकते हैं। इसलिए सितंबर से पहले आपूर्ति में वास्तविक सुधार दिखाई देना कठिन है। और यह तो केवल प्रारंभिक चरण होगा। युद्ध-पूर्व स्थिति बहाल करने में कई वर्ष लग सकते हैं।अमेरिकी विशेषज्ञों की रिपोर्ट के अनुसार मई महीने में खाड़ी देशों का तेल उत्पादन युद्ध-पूर्व स्तर की तुलना में लगभग 1 करोड़ बैरल प्रतिदिन कम था। उनका मानना है कि केवल उत्पादन क्षमता बहाल करने में ही एक वर्ष या उससे अधिक समय लग सकता है।तेल उत्पादन केंद्रों, तेल कुओं, भंडारण स्थलों और रिफाइनरियों को हुए नुकसान की मरम्मत में डेढ़ से दो वर्ष तक लग सकते हैं। जो कुएं, रिफाइनरियां और गैस उत्पादन केंद्र लंबे समय तक बंद रहे हैं, उनमें भी तकनीकी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। उन्हें पूरी तरह सामान्य करने में भी लंबा समय लगेगा।पहले प्रतिदिन 100 जहाज गुजरते थे, अब 10 भी नहीं युद्ध से पहले हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति की जीवनरेखा था। यहां से प्रतिदिन लगभग 100 जहाज गुजरते थे। वर्तमान स्थिति यह है कि यहां से प्रतिदिन 10 जहाज भी नहीं गुजर पा रहे हैं। इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट वर्कर्स फेडरेशन के अनुसार इस क्षेत्र में जहाजों का भारी जमावड़ा है। बड़ी संख्या में जहाज बाहर निकलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।जहाजों के चालक दल लंबे समय से समुद्र में फंसे हुए हैं और थक चुके हैं। अभी केवल समझौते की घोषणा हुई है। उसके बाद जब जहाजों की आवाजाही शुरू होगी, तब सुरक्षा जांच और अन्य प्रक्रियाओं में भी काफी समय लगेगा।इसके अतिरिक्त कई जहाज तीन महीने से अधिक समय तक समुद्र में स्थिर खड़े रहे हैं। उनकी निचली सतह पर शैवाल, समुद्री जीव और गंदगी जम गई होगी, जिससे उनकी गति प्रभावित हो सकती है। जब ये जहाज अपने गंतव्य बंदरगाहों पर पहुंचेंगे तो उनकी सफाई और तकनीकी जांच में भी महीनों लग सकते हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि अगले चार वर्षों तक इस संकट का प्रभाव वैश्विक स्तर पर महसूस किया जाएगा। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) से जुड़े आकलनों के अनुसार 2026 में उत्पन्न हुई तेल और गैस आपूर्ति की यह समस्या 2030 तक असर दिखा सकती है।आने वाले चार वर्षों में दुनिया को लगभग 120 अरब घन मीटर गैस कम मिल सकती है। यह मात्रा भारत की वार्षिक गैस खपत से कई गुना अधिक है।गैस आपूर्ति में कमी के दो प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं। पहला वर्तमान आपूर्ति बाधित है। दूसरा नई उत्पादन क्षमता विकसित करने के लिए कंपनियां अभी तैयार नहीं हैं और कई कंपनियों को युद्ध के कारण भारी नुकसान हुआ है, जिसकी भरपाई में समय लगेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार इस क्षेत्र में सामान्य निवेश और उत्पादन क्षमता बहाल होने में कम से कम दो वर्ष लग सकते हैं। 2026 की दूसरी तिमाही में गैस आपूर्ति बढ़ने की जो उम्मीद थी, वह युद्ध के कारण ध्वस्त हो गई। अब आपूर्ति विस्तार की उम्मीद 2028 तक खिसक गई है।