भारत विभाजन के दौर में एक दूरदर्शी राष्ट्रनायक इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनके निर्णयों का महत्व उनके जीवनकाल से कहीं आगे जाकर समझ आता है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसे ही राष्ट्रनायक थे, जिनकी दूरदृष्टि ने भारत के पूर्वी भूगोल और करोड़ों लोगों के भविष्य को प्रभावित किया। 1951 में जनसंघ की स्थापना, “एक देश में दो निशान, दो प्रधान, दो विधान नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगें ” का नारा दिया, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को राजनीति की मुख्य धारा में लाना, जैसे अनेकों कार्य सर्वविदित हैं। लेकिन मैं आज डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के उस विशेष योगदान और बलिदान को याद करना चाहता हूँ जो इतिहास के पन्नों में अभी भी दबे हुए हैं।23 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान प्रस्ताव पारित किया था और इसके बाद लगातार वे भारत विभाजन का दबाव डाल रहे थे। जब 1946 में कैबिनेट मिशन ने भी भारत विभाजन को अस्वीकार कर दिया तब लीग ने 16 अगस्त 1946 को सीधी कार्रवाई दिवस (डायरेक्ट एक्शन डे) की घोषणा की। इस दिन बंगाल ने “वह” भयावह सांप्रदायिक हिंसा देखी, जिसमें लाखों निर्दोष “और बेबस” लोगों ने अपने प्राण गंवाए और विभाजन की आशंकाएँ और बलवती हो गईं।महात्मा गांधी भारत विभाजन के धुर विरोधी थे और उन्होंने डॉक्टर मुखर्जी को भी यह आश्वासन दिया था कि वे किसी भी कीमत पर विभाजन नहीं होने देंगे। लेकिन बंगाल के दंगों के बाद गांधी जी का विचार बदलने लगा था।read more:https://pahaltoday.com/barabanki-festival-will-be-inaugurated-from-april-10/
पश्चिम बंगाल को भारत में बनाए रखने का ऐतिहासिक संघर्ष
जब माउंटबेटन की भारत विभाजन घोषणा (3 जून 1947) का गांधी जी ने समर्थन कर दिया तब डॉक्टर मुखर्जी ने इसे देश के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात करार दिया।पंजाब और बंगाल किसके साथ रहेंगे इसका निर्णय विधानसभा के माध्यम से किया जाना था। 1946 के चुनावों में बंगाल राज्य में मुस्लिम लीग की सरकार स्थापित हुई थी और राज्य की विधानसभा में स्पष्ट रूप से मुस्लिम बहुमत था, जबकि तत्कालीन बंगाल में हिंदू अल्पसंख्यक (कुल आबादी का 42%) थे। मुस्लिम लीग के एच. एस. सुहरावर्दी और कांग्रेसी नेता शरद चंद्र बोस भारत और पाकिस्तान से अलग एक “स्वतंत्र संयुक्त बंगाल” बनाना चाहते थे। यह एक साजिश थी जिसमें आगे चलकर अल्पसंख्यक हिंदुओं को अत्याचार और धर्म परिवर्तन के द्वारा पूरी तरह दबा दिया जाता और स्वतंत्र संयुक्त बंगाल को पाकिस्तान में शामिल कर लिया जाता।डॉ. मुखर्जी ने एक ऐतिहासिक और व्यावहारिक रुख अपनाया। उन्होंने मुस्लिम लीग की पूरे बंगाल को पाकिस्तान में मिलाने की साजिश को भांप लिया और पुरजोर मांग की कि यदि देश का विभाजन धार्मिक आधार पर हो रहा है, तो बंगाल के हिंदू बहुल क्षेत्रों को भारत में ही रहना चाहिए। उनका यह संघर्ष राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि बंगाल के हिंदुओं की सुरक्षा, संस्कृति और उनके अस्तित्व को बचाने की एक पवित्र लड़ाई थी। उनके इसी भगीरथ प्रयास का परिणाम है कि आज का ‘पश्चिम बंगाल’ भारत का मुकुट बना हुआ है।
इसी संदर्भ में उनका वह ऐतिहासिक कथन आज भी गूंजता है—“कांग्रेस ने भारत का विभाजन किया, लेकिन मैंने पाकिस्तान का विभाजन किया।”इतिहास का साक्ष्य और डॉ. मुखर्जी की दूरदर्शिता
डॉ. मुखर्जी की हिंदुओं के भविष्य को लेकर आशंका का सबसे बड़ा उदाहरण जोगेंद्रनाथ मंडल हैं। मंडल पूर्वी बंगाल के एक बड़े दलित हिंदू नेता थे। उन्होंने जिन्ना के वादों पर विश्वास किया और विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान चले गए। वहाँ वे पाकिस्तान के पहले श्रम और कानून मंत्री बने—एक शीर्ष पद।लेकिन जल्द ही कड़वा सच सामने आया। पाकिस्तान में हिंदुओं और दलितों पर अत्याचार शुरू हो गए। खुलना के कलशीरा गाँव में पुलिस ने 350 घरों को आग लगा दी—सिर्फ तीन लोग बचे। चटगाँव में सैकड़ों हिंदुओं की हत्या कर दी गई और महिलाओं के साथ पाकिस्तानी नेताओं द्वारा अत्याचार किया गया। ढाका में फरवरी 1950 के दंगों में 10,000 हिंदू मारे गए। मंडल ने प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को कई शिकायतें भेजीं—कोई सुनवाई नहीं हुई।
अन्ततः उन्होंने 9 अक्टूबर 1950 को इस्तीफा दे दिया। अपने त्यागपत्र में उन्होंने लिखा—”मुस्लिम लीग ने मुझसे जो भी वादे किए थे, वे सब तोड़ दिए गए। जिन्ना का 11 अगस्त 1947 का भाषण, जहाँ उन्होंने सबको समान अधिकार देने का वादा किया था, वह धूल में मिल गया।”मंडल इतने आहत हो चुके थे कि अब वे पाकिस्तान छोड़कर वापस भारत आ गए।सोचिए, मंडल पाकिस्तान सरकार के मंत्री थे, फिर भी अपने समुदाय की रक्षा नहीं कर सके। तो अगर पूरा बंगाल पाकिस्तान चला जाता, तो एक साधारण बंगाली हिंदू की क्या गति होती?जोगेंद्रनाथ मंडल की कहानी केवल एक व्यक्ति की राजनीतिक निराशा नहीं थी, बल्कि उस ऐतिहासिक चिंता का प्रमाण थी जिसे डॉ. मुखर्जी पहले ही व्यक्त कर चुके थे। यदि डॉक्टर मुखर्जी ने बंगाल के विभाजन के लिए पुरजोर आंदोलन न चलाया होता तो बंगाल के अल्पसंख्यक हिंदू दीर्घकालिक अत्याचार, धर्म परिवर्तन और सांस्कृतिक विनाश का शिकार हो जाते। उनकी दूरदर्शिता और सतत प्रयास ने ही “पश्चिम बंगाल” का निर्माण किया जो भारत में शामिल हो सका।राष्ट्र-प्रथम का अमर संदेश यद्यपि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के प्रयासों से पश्चिम बंगाल को हिंदुओं की सुरक्षा और उनकी सांस्कृतिक, धार्मिक आजादी के लिए बचाया गया था लेकिन लंबे समय तक वामपंथी सरकारों तथा उसके बाद टीएमसी की सरकार ने केवल सत्ता के लालच में तुष्टिकरण की नीति चलाई और हिंदुओं पर अत्याचारों को बढ़ने दिया। वर्ष 2026 में जब भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल में भारी बहुमत से चुनाव जीत कर सरकार बनाई, तब डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी का वह स्वप्न पूरा हो सका है जो उन्होंने 1947 में बंगाल के लिए देखा था।
आज उनकी 125वीं जयंती पर देश उन्हें न केवल एक नेता के रूप में, बल्कि स्वतंत्र भारत के पहले ऐसे ‘राजनीतिक शहीद’ के रूप में नमन करता है, जिन्होंने अपनी वैचारिक दृढ़ता के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। डॉ. मुखर्जी के विचार, उनका राष्ट्र-प्रथम का संकल्प और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की उनकी दृष्टि, आज भी हमारे लिए उतनी ही प्रासंगिक है।
विकसित और अखंड भारत के निर्माण में डॉ. मुखर्जी सदैव एक प्रकाश स्तंभ की भांति मार्गदर्शन करते रहेंगे।
(लेखक म.प्र. सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं एवं पूर्व में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और बंगाल प्रभारी रहे हैं।)