अंधेरी खिड़की

मुख्य चिकित्सा अधिकारी के दफ़्तर के बाहर नीम के पुराने पेड़ की छांव में पचहत्तर साल के श्यामसुंदर जी हर मंगलवार सुबह ठीक दस बजे आकर बैठ जाते थे। उनके कांपते हाथों में प्लास्टिक के पारदर्शी कवर में सुरक्षित रखा एक पुराना पीला पड़ चुका सरकारी फॉर्म होता था जिसके कोने पर काले रंग की स्याही से बना एक आंख का निशान छपा था। अस्पताल का नया सुरक्षाकर्मी जब भी उन्हें वहाँ आकर बैठते देखता तो चाय का कुल्हड़ मेज़ पर रखते हुए ठहाका लगाकर कहता कि “बाबा जब आज पच्चीस अगस्त से पूरे देश में राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा शुरू हो चुका है और बड़े-बड़े पोस्टर लग रहे हैं तो इस पुराने सड़े-गले कागज़ को रोज़ अपनी छाती से लगाकर यहाँ अफ़सरों के आगे नुमाइश क्यों लगाते हो।” श्यामसुंदर जी अपनी धुंधली आँखों से ओपीडी के भारी परदों को देखते और बहुत शांत स्वर में उत्तर देते कि “बेटा यह पुराना कागज़ केवल एक फॉर्म नहीं है बल्कि इस पूरे स्वास्थ्य तंत्र की वो अंधी संवेदनहीनता है जिसने मेरे घर की रोशनी को कागज़ों की स्याही में दफ़न कर दिया है।” आसपास खड़े तमाम मुंशी और तीमारदार उनका मज़ाक उड़ाते हुए कहते कि “लगता है इस बुढ़ापे में दादाजी की मति मारी गई है जो नेत्रदान पखवाड़े के पावन उत्सव को अपनी हठ की भेंट चढ़ाने चले हैं।” श्यामसुंदर जी किसी की बात का तनिक भी बुरा माने बिना उस फॉर्म की मुड़ी हुई कोर को अपनी कांपती उंगलियों से सहलाते और चुपचाप गाड़ियों के आने का इंतज़ार करते रहते थे।read more:https://pahaltoday.com/ballia-police-receive-two-modern-interceptor-bikes-sp-omvir-singh-flags-them-off/दफ़्तर के तमाम कर्मचारी श्यामसुंदर जी की इस साप्ताहिक मूक उपस्थिति से पूरी तरह वाकिफ़ हो चुके थे और उन्हें एक सनकी बुजुर्ग मानकर पूरी तरह अनदेखा कर देते थे। दफ़्तर का बड़ा बाबू जब भी फाइलों का पुलिंदा लेकर मुख्य चिकित्सा अधिकारी के केबिन की तरफ बढ़ता तो श्यामसुंदर जी बहुत उम्मीद से अपनी लाठी के सहारे खड़े हो जाते और हाथ जोड़कर कहते कि “बाबू जी क्या आज उस कॉर्निया प्रत्यारोपण वाले सरकारी अनुदान के कागज़ पर साहब के दस्तखत हो गए।” बाबू गुस्से में फाइलें पटकते हुए डांटकर कहता कि “अरे बाबा जब तक डिजिटल पोर्टल पर ऑनलाइन स्लॉट बुक नहीं होगा और ऊपर से मंज़ूरी नहीं आएगी तब तक कागज़ आगे नहीं बढ़ेगा और तुम इस पीले फॉर्म को लेकर ताउम्र यहाँ चक्कर काटते रहोगे।” श्यामसुंदर जी बिना किसी प्रतिवाद के वापस अपनी जगह पर जाकर बैठ जाते और उस फॉर्म पर छपी आंख के निशान को अपनी हथेली से छूने का निरर्थक प्रयास करने लगते थे। कस्बे के लोग आपस में तरह-तरह की बातें करते थे कि शायद बाबा अपनी किसी पुरानी पेंशन के लिए यह सब कर रहे हैं लेकिन किसी को भी उस पुराने फॉर्म और अस्पताल के बड़े-बड़े दावों के बीच छुपे भयानक रहस्य की ज़रा सी भी भनक नहीं थी।दोपहर में अचानक स्वास्थ्य विभाग के संभागीय निदेशक महोदय राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़े के उद्घाटन समारोह का जायज़ा लेने के लिए उसी अस्पताल परिसर में पहुँचे। साहब की गाड़ी का सायरन बजते ही पूरे परिसर में खलबली मच गई और आनन-फानन में स्वागत के लिए नए बैनर टांगे जाने लगे ताकि कोई कमी न दिखाई दे। मंच पर दीप प्रज्वलन और मरणोपरांत नेत्रदान के संकल्प पर लंबा भाषण देने के बाद जब निदेशक महोदय पत्रकारों की भीड़ के साथ बाहर निकले तो उनकी नज़र चबूतरे पर शांत बैठे श्यामसुंदर जी पर पड़ी जिनकी गोद में वही पीला फॉर्म रखा था। अपनी जनप्रिय और संवेदनशील छवि का प्रदर्शन करने के लिए निदेशक साहब तुरंत मीडिया कर्मियों को साथ लेकर श्यामसुंदर जी के पास पहुँचे और बड़े आदर से बोले कि “बाबा आज के इस पावन दिन पर जब हम दूसरों को रोशनी देने का संकल्प ले रहे हैं बताइए आपकी क्या पीड़ा है क्या आपको मुफ़्त इलाज का लाभ नहीं मिल रहा है।” श्यामसुंदर जी ने अपनी पथराई आँखों से निदेशक साहब को देखा और अपने कांपते हाथों से वह पीला फॉर्म आगे बढ़ाते हुए बोले कि “साहब जी अगर वाकई इंसाफ़ करना चाहते हैं तो ज़रा इस फॉर्म के नीचे दर्ज तारीख और इस पर लगी सरकारी मुहर का सच जान लीजिए।”निदेशक साहब ने जब उस फॉर्म को हाथ में लेकर गौर से देखा तो उस पर पंद्रह साल पुरानी तारीख के साथ एक मरणोपरांत नेत्रदान का शपथ पत्र दर्ज था। श्यामसुंदर जी की आँखों से आंसुओं के दो मोटे कतरे ढलककर उस फॉर्म पर गिर पड़े और वे रुंधे गले से बोले कि “साहब पंद्रह साल पहले जब मेरे जवान बेटे की असमय सांसें थम गई थीं तो मैंने कलेजे पर पत्थर रखकर उसकी दोनों आंखें इसी अस्पताल के आई बैंक को दान कर दी थीं ताकि किसी की अंधेरी जिंदगी रोशन हो सके। डॉक्टरों ने मुझे यह प्रमाण पत्र देकर वादा किया था कि भविष्य में मेरे परिवार को प्राथमिकता पर उपचार मिलेगा। आज मेरी बारह साल की मासूम पोती की आंखों में गंभीर संक्रमण है और डॉक्टर कहते हैं कि अगर तुरंत कॉर्निया नहीं मिला तो वह हमेशा के लिए अंधी हो जाएगी। मैं पिछले दो साल से अपनी उस पोती के लिए इस चौखट पर कॉर्निया की भीख मांग रहा हूँ लेकिन आपके बाबू मुझसे लाखों रुपये की रिश्वत मांग रहे हैं। मैं रोज़ यह फॉर्म यहाँ इसलिए लाता हूँ ताकि आपके इस तंत्र को दिखा सकूँ कि जिस परिवार ने दूसरों की दुनिया रोशन करने के लिए अपनी औलाद की आंखें दान कर दी थीं आज उसी की मासूम पोती इस सरकारी दफ्तर के अंधेरे में अपनी बची-खुची रोशनी भी खोने के कगार पर खड़ी है।” यह सुनते ही निदेशक साहब का सिर शर्म से झुक गया और पूरा अस्पताल परिसर गहरे सन्नाटे में डूब गया।

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