महोदय, विवाह क्या जीवनभर की सहमति है या दो व्यक्तियों के बीच ऐसा संबंध, जिसमें हर बार सहमति का अपना स्वतंत्र महत्व है? वैवाहिक दुष्कर्म को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सामने उठता यह प्रश्न केवल कानून की किसी धारा का विवाद नहीं, बल्कि विवाह, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा और आपराधिक न्याय के बीच संतुलन का कठिन सवाल है। ‘ऋषिकेश साहू बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य’ से जुड़े विमर्श ने इस बहस को फिर सामने ला दिया है कि जब तक वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने वाले अपवाद की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला नहीं होता, तब तक उस अपवाद के रहते पति के खिलाफ दुष्कर्म के आरोप में अभियोजन की सीमा क्या होगी।
भारत में लंबे समय से भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अपवाद के कारण वयस्क पत्नी के साथ पति द्वारा किया गया यौन संबंध, उसकी सहमति के अभाव के बावजूद, दुष्कर्म की कानूनी परिभाषा से बाहर रहा। नए भारतीय न्याय संहिता में भी वयस्क पत्नी के संबंध में यह अपवाद मूलतः कायम है। हालांकि एक महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि 18 वर्ष से कम आयु की पत्नी को इस अपवाद का संरक्षण नहीं है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही ‘इंडिपेंडेंट थॉट’ मामले में नाबालिग पत्नी के संबंध में इस अपवाद को 18 वर्ष की आयु तक सीमित कर चुका था।
इस विवाद की संवैधानिक गंभीरता का अंदाजा दिल्ली हाई कोर्ट के 11 मई 2022 के विभाजित फैसले से लगाया जा सकता है। न्यायमूर्ति राजीव शकधर ने वैवाहिक दुष्कर्म के अपवाद को संविधान के समानता और जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े प्रावधानों के विरुद्ध माना, जबकि न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर ने इसे असंवैधानिक मानने से इनकार किया। दोनों न्यायाधीशों की अलग-अलग राय के कारण मामला आगे सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंचा।यहीं से बहस और पेचीदा हो जाती है। एक दृष्टिकोण कहता है कि विवाह किसी महिला की शारीरिक स्वायत्तता समाप्त नहीं करता। पत्नी का ‘न’ विवाह के बाद भी ‘न’ ही रहता है। विवाह की सामाजिक और कानूनी संस्था व्यक्ति की गरिमा से ऊपर नहीं हो सकती।read more:https://pahaltoday.com/demand-to-remove-government-country-liquor-shop-villagers-stage-protest-at-the-collectorate/#google_vignetteदूसरी ओर यह तर्क है कि विवाह एक विशिष्ट सामाजिक संस्था है और उसके भीतर होने वाले यौन संबंध को उसी कसौटी पर देखना, जिस पर किसी अजनबी द्वारा किया गया यौन अपराध देखा जाता है, वैवाहिक संबंध की विशिष्ट प्रकृति की अनदेखी हो सकती है। दिल्ली हाई कोर्ट के दोनों न्यायाधीशों ने इसी मूल प्रश्न को अलग-अलग संवैधानिक दृष्टिकोण से देखा था।केंद्र सरकार ने भी इस मामले में अपवाद हटाने का विरोध किया है। सरकार का तर्क रहा है कि पति को पत्नी की सहमति का उल्लंघन करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन विवाह संस्था के भीतर होने वाले ऐसे कृत्य को दुष्कर्म के कठोर आपराधिक अपराध के रूप में वर्गीकृत करने के सामाजिक और कानूनी परिणामों पर भी विचार होना चाहिए। यह दृष्टिकोण बताता है कि विवाद केवल ‘सहमति बनाम असहमति’ तक सीमित नहीं, बल्कि अपराध की परिभाषा, वैवाहिक संस्था, साक्ष्य, झूठे मुकदमों की आशंका, पारिवारिक संबंधों और दंड कानून की सीमाओं से भी जुड़ा है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी कानून के अस्तित्व में होने और किसी कृत्य के नैतिक रूप से उचित होने के बीच अंतर होता है। कानून किसी कृत्य को अपराध न माने, इसका अर्थ यह नहीं कि वह कृत्य हर परिस्थिति में उचित या स्वीकार्य भी हो जाता है। इसी तरह किसी कृत्य को अपराध घोषित करने से पहले यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उसकी परिभाषा स्पष्ट हो, साक्ष्य की कसौटी न्यायसंगत हो और आपराधिक कानून का इस्तेमाल न्याय के उद्देश्य से ही हो।इसलिए वैवाहिक दुष्कर्म पर बहस को न तो विवाह संस्था बनाम महिला अधिकार की सरल लड़ाई बनाना उचित है और न ही इसे केवल पुरुष बनाम महिला का प्रश्न समझना। असली सवाल यह है कि आधुनिक भारतीय कानून विवाह के भीतर व्यक्ति की गरिमा, सहमति और स्वायत्तता को किस तरह परिभाषित करता है और आपराधिक न्याय उस परिभाषा को किस सीमा तक लागू कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट के सामने चुनौती केवल एक अपवाद की संवैधानिकता तय करने की नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक मूल्यों और आपराधिक कानून के बीच ऐसी रेखा खींचने की भी है, जो न्याय, अधिकार और वैवाहिक संस्था,तीनों के बीच संतुलन कायम कर सके!-सुभाष बुड़ावन वाला,रतलाम.मप्र