सुनील कुमार महला
15 अप्रैल को प्रतिवर्ष विश्व कला दिवस (वर्ल्ड आर्ट डे) के रूप में मनाया जाता है।विश्व कला दिवस हमें यह सिखाता है कि कला केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने, समझने और बदलने की ताकत भी रखती है।कला ने विकास, क्रांति, स्वतंत्रता और रचनात्मकता के संदेशों को संप्रेषित करने और वैश्विक मुद्दों को जनता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कला में वह ताकत है जो हमें जीवन की सबसे कठिन परिस्थितियों में भी एकजुट और संलग्न कर सकती है।कला केवल एक सुंदर चित्र,या पेंटिंग मात्र ही नहीं है, बल्कि यह तो हमारे समाज की धड़कन है, स्थानीय और वैश्विक समुदायों में वे जो परिवर्तन देखना चाहते हैं, उसका हृदय है। वास्तव में, यह यह दिन कला और रचनात्मकता को बढ़ावा देने, सांस्कृतिक विविधता को सम्मान देने, कलाकारों को सम्मान और पहचान दिलाने,समाज में संवाद, शांति और एकता को प्रोत्साहित करने,शिक्षा में कला के महत्व को उजागर करने तथा युवाओं को कला के प्रति प्रेरित करने के क्रम में हर साल मनाया जाता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि कला हमारे जीवन को सुंदर, अर्थपूर्ण और संवेदनशील बनाती है।अनेक शोध यह बताते हैं कि कला (जैसे पेंटिंग, संगीत, लेखन) तनाव कम करने और मानसिक स्वास्थ्य सुधारने में सहायक होती है और यह दिवस चित्रकला, संगीत, नृत्य, नाटक और साहित्य जैसी विभिन्न कला विधाओं को समर्पित है।read more:https://khabarentertainment.in/30-fasts-in-ramadan-are-obligatory-20-in-a-year-are-voluntary-fasting-woman-reshma-bano-explains-the-importance-of-prayer/ बहरहाल, यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि मनुष्य और कला का संबंध अत्यंत गहरा, स्वाभाविक और प्राचीन है। जब से मानव सभ्यता का आरंभ हुआ, तब से ही मनुष्य ने अपनी भावनाओं, विचारों और अनुभवों को व्यक्त करने के लिए कला का सहारा लिया। प्रारंभिक मानव ने गुफाओं की दीवारों पर चित्र बनाकर अपने जीवन, शिकार और प्रकृति के साथ संबंध को दर्शाया-और यहीं से वास्तव में कला और मनुष्य का यह अनोखा रिश्ता शुरू हुआ।सच तो यह है कि कला मनुष्य की संवेदनाओं की पूर्ण व अनोखी अभिव्यक्ति है। खुशी, दुःख, प्रेम, क्रोध, आशा और निराशा जैसे भाव जब शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं हो पाते, तब कला उन्हें रूप, रंग, संगीत, नृत्य या साहित्य के माध्यम से जीवंत बना देती है। इस प्रकार कला मनुष्य के भीतर की दुनिया को(आंतरिक भावों, संवेदनाओं) बाहर लाने का माध्यम बनती है।कला केवल अभिव्यक्ति ही नहीं, बल्कि यह तो मनुष्य के आत्मिक संतुलन और मानसिक शांति(मेंटल सूदिंग) का भी साधन है। चित्रकारी, संगीत या लेखन जैसे कलात्मक कार्य मनुष्य को तनाव से दूर ले जाकर उसे सृजनात्मक आनंद प्रदान करते हैं। शायद यही कारण भी रहा है कि हर युग में कला ने मानव जीवन को सुंदर और संतुलित बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।इसके अलावा, कला समाज और संस्कृति का दर्पण भी होती है। किसी भी देश या समाज की परंपराएँ, रीति-रिवाज, इतिहास और जीवन शैली कला के विभिन्न रूपों में झलकते हैं।read more:https://khabarentertainment.in/ramadan-is-a-message-of-helping-the-poor-and-everyones-participation-in-the-joys-of-eid-is-essential/ इस तरह कला न केवल व्यक्ति को स्वयं से जोड़ती है, बल्कि उसे अपने समाज और उसकी जड़ों से भी जोड़ती है। आधुनिक युग में भी यह संबंध उतना ही प्रासंगिक है, बल्कि और भी व्यापक हो गया है। डिजिटल आर्ट, एनीमेशन, फिल्म और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) के माध्यम से कला के नए-नए रूप सामने आ रहे हैं, जो मनुष्य की रचनात्मकता को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा रहे हैं। हाल फिलहाल, इस दिवस पर देश-विदेश में विभिन्न स्कूल, कॉलेज और सांस्कृतिक संस्थान इस दिन प्रदर्शनी, कार्यशालाएं और प्रतियोगिताएं, आर्ट फेस्टिवल और लाइव पेंटिंग इवेंट्स आदि आयोजित करते हैं। आज सोशल नेटवर्किंग साइट्स का युग है और ऐसे समय में आजकल सोशल मीडिया पर भी कलाकार अपनी कला साझा कर जागरूकता फैलाते हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि कला मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य और आत्म-अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम है।इसकी शुरुआत अंतरराष्ट्रीय कला संघ द्वारा की गई थी। यहां पाठकों को बताता चलूं कि अंतरराष्ट्रीय कला संघ यूनेस्को से जुड़ा हुआ एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पहली बार इसे वर्ष 2012 में मनाया गया था तथा 15 अप्रैल का दिन इसलिए चुना गया क्योंकि यह महान कलाकार लियोनार्डो दा विंची का जन्मदिन है, जिन्हें कला और विज्ञान के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।सरल शब्दों में कहें तो लियोनार्डो दा विंची के जन्मदिन (15 अप्रैल) को समर्पित है, जो विश्व शांति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बहुसंस्कृतिवाद के प्रतीक हैं।read more:https://khabarentertainment.in/holi-was-celebrated-with-great-enthusiasm-at-divine-global-school-harpur-children-enjoyed-swings-and-delicious-food/ उल्लेखनीय है कि वर्ष 2019 में यूनेस्को ने इस दिन को आधिकारिक रूप से मान्यता दी, जिससे इसकी वैश्विक पहचान और मजबूत हुई।हर वर्ष इस दिवस की एक थीम रखी जाती है और वर्ष 2025 में इसकी थीम-‘अभिव्यक्ति का बगीचा-कला के माध्यम से समुदाय का निर्माण’ रखी गई थी। वास्तव में, इस थीम का उद्देश्य था कि कला के जरिए लोगों को जोड़ना, देश और समाज में सामुदायिक भावना को मजबूत करना और रचनात्मक अभिव्यक्ति को बढ़ावा देना।इस वर्ष यानी कि वर्ष 2026 में इस दिवस की थीम-‘एकता और उपचार के लिए कला’ रखी गई है। यह थीम दुनिया भर में बढ़ती विभिन्नताओं और तनावों के बीच कला की जोड़ने वाली शक्ति पर जोर देती है। यह कला ही होती है जो मानसिक और भावनात्मक उपचार (हीलिंग) में मदद करती है। वास्तव में यह लोगों को प्रेरित करती है कि वे कला के जरिए सामाजिक सौहार्द, सहानुभूति और शांति को बढ़ावा दें। आज का युग डिजिटल युग है, सोशल नेटवर्किंग साइट्स,एआइ व संचार क्रांति का युग है और ऐसे दौर में कला तकनीक व विज्ञान के साथ मिलकर नए रूप में उभर रही है। डिजिटल आर्ट के जरिए कलाकार अब एडोब फोटोशॉप और प्रो-क्रिएट जैसे सॉफ्टवेयर से आसानी से अपनी रचनात्मकता व्यक्त कर रहे हैं। वहीं नोन- फंजीबल टोकन (एन एफ टी) ने डिजिटल कला को आर्थिक पहचान दी है, जिससे कलाकार सीधे अपनी कला बेच सकते हैं। इसके साथ ही एआइ(आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) आर्ट, जैसे डैल·ई, ने कुछ ही सेकंड में कल्पनाओं को चित्रों में बदलना संभव बना दिया है। इस प्रकार, आधुनिक तकनीक ने कला को अधिक सुलभ, वैश्विक और नवाचारी बना दिया है।यहां पाठकों को बताता चलूं कि डैल·ई एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) आधारित इमेज जनरेटर है, जिसे ओपन-एआइ ने विकसित किया है। वास्तव में, यह एक ऐसा टूल है जो टेक्स्ट (शब्दों/वर्णन) को समझकर उसके आधार पर चित्र (इमेजेज) बना देता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज के तेज़-रफ्तार और तनावपूर्ण जीवन में कला एक तरह की मानसिक चिकित्सा (थैरेपी) की तरह काम करती है। यही कारण है कि ‘आर्ट थैरेपी’ का उपयोग भी लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए किया जाता है। सरल शब्दों में कहें तो कला में अद्भुत सूदिंग पावर (सुकून देने की शक्ति) होती है। यह मनुष्य के मन और आत्मा को गहराई से प्रभावित करती है। जब व्यक्ति तनाव, चिंता या दुख में होता है, तब संगीत, चित्रकला, कविता या नृत्य जैसे कला के रूप उसे भीतर से शांत और हल्का महसूस कराते हैं। वास्तव में, कोई भी कला मन की अशांति को धीरे-धीरे कम करती है और भावनाओं को संतुलित करती है। जैसे मधुर संगीत सुनने से मन शांत हो जाता है, या कोई सुंदर चित्र देखने से भीतर एक सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है। इसी तरह लेखन या चित्रकारी करने से व्यक्ति अपनी भावनाओं को बाहर निकाल पाता है, जिससे मानसिक बोझ कम होता है।अंततः यह बात कही जा सकती है कि मनुष्य और कला का संबंध आत्मा और अभिव्यक्ति का संबंध है-एक के बिना दूसरा अधूरा है। कला मनुष्य को केवल जीवित नहीं रखती, बल्कि उसे संवेदनशील, सृजनशील और मानवीय बनाती है।