अशोक भाटिया
अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी और हेराफेरी के मामले में SIT जांच कर रही थी । सूत्रों के अनुसार जांच में सामने आया है कि दान पेटियों की सुरक्षा और गिनती में लापरवाही बरती गई, सीसीटीवी फुटेज से छेड़छाड़ की बात सामने आ रही है। मामले में कई कर्मचारियों और संलिप्त लोगों पर बड़ी कार्रवाई की तैयारी है।सूत्र बताते हैं कि रिपोर्ट के आधार पर मंदिर से जुड़े कई सेवादारों की सेवाएं समाप्त की जा सकती हैं। हालांकि अभी तक किसी नाम की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन मंदिर परिसर में कार्रवाई की अटकलों ने हलचल बढ़ा दी है।जांच के दौरान राम मंदिर ट्रस्ट के सचिव से भी बंद कमरे में करीब तीन घंटे तक पूछताछ की गई थी । इस दौरान जांच अधिकारियों ने चढ़ावे के संग्रह, सुरक्षा व्यवस्था, निगरानी तंत्र और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जुड़े कई सवाल पूछे। सूत्रों का दावा है कि पूछताछ के दौरान कई महत्वपूर्ण जानकारियां जांच टीम को मिली हैं, जिन्हें रिपोर्ट का हिस्सा बनाया गया है।भले ही रिपोर्ट तैयार हो चुकी हो, लेकिन SIT की गतिविधियां अभी जारी हैं। जांच टीम के कई सदस्य अभी भी अयोध्या में मौजूद हैं और अंतिम सत्यापन में जुटे हैं। माना जा रहा है कि कुछ बिंदुओं पर अतिरिक्त जानकारी जुटाई जा रही है ताकि रिपोर्ट पूरी तरह तथ्यात्मक और तकनीकी रूप से मजबूत रहे।राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़ी कथित अनियमितताओं की जांच में सबसे बड़ा सवाल श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को लेकर उठ रहा है। मंदिर निर्माण से लेकर उसके संचालन तक जिस व्यक्ति की भूमिका सबसे प्रभावशाली मानी गई, आज वही नाम जांच और बहस के केंद्र में दिखाई दे रहा है। दरअसल, राम मंदिर निर्माण का श्रेय जिन चुनिंदा लोगों को दिया जाता है, उनमें चंपत राय सबसे प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के पूर्णकालिक प्रचारक रहे चंपत राय ने दशकों तक अयोध्या में रहकर राम मंदिर आंदोलन को गति दी। मंदिर आंदोलन के समर्थक उन्हें समर्पित, अनुशासित और सादगीपूर्ण जीवन जीने वाला कार्यकर्ता मानते हैं।हालांकि उनकी कार्यशैली को लेकर समय-समय पर सवाल भी उठते रहे। अयोध्या के कई संतों और मंदिर आंदोलन से जुड़े पुराने चेहरों का आरोप रहा कि ट्रस्ट के गठन और मंदिर निर्माण की प्रक्रिया में अनेक पुराने कार्यकर्ताओं और संतों को अपेक्षित महत्व नहीं मिला। यही वजह है कि ट्रस्ट बनने के बाद से एक वर्ग के भीतर असंतोष लगातार बना रहा। अब जब चढ़ावे से जुड़ा मामला सुर्खियों में है तो वर्षों से दबा असंतोष भी सतह पर दिखाई देने लगा है। कई संत, महंत और आंदोलन से जुड़े पुराने चेहरे खुलकर सवाल उठा रहे हैं। कुछ का कहना है कि यदि मंदिर की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था एक केंद्रीय नेतृत्व के तहत संचालित हो रही थी तो किसी भी गड़बड़ी की जवाबदेही तय होना स्वाभाविक है।यहीं से चंपत राय को लेकर बहस शुरू होती है। उनके समर्थकों का तर्क है कि दशकों के सार्वजनिक जीवन में उन पर व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का कोई आरोप साबित नहीं हुआ और उनकी सादगी आज भी वैसी ही है जैसी पहले थी। दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि यदि जांच में प्रशासनिक कमियां सामने आती हैं तो शीर्ष स्तर की जवाबदेही से इंकार नहीं किया जा सकता। सूत्रों के मुताबिक SIT की रिपोर्ट में विभिन्न स्तरों पर जिम्मेदारियों का आकलन किया गया है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि रिपोर्ट केवल कुछ कर्मचारियों और सेवादारों तक सीमित रहती है या फिर ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारियों की भूमिका पर भी कोई टिप्पणी करती है।राजनीतिक और धार्मिक गलियारों में एक और चर्चा तेजी से चल रही है। माना जा रहा है कि विवाद के बाद राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की कार्यप्रणाली में बड़े बदलाव हो सकते हैं। दान प्रबंधन और प्रशासनिक निगरानी के लिए अधिक प्रोफेशनल सिस्टम लागू करने पर भी विचार किया जा सकता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या SIT रिपोर्ट चंपत राय को पूरी तरह राहत देगी या फिर रिपोर्ट के निष्कर्ष उनके भविष्य को प्रभावित करेंगे। भले ही जांच का अंतिम परिणाम अभी सामने नहीं आया है, लेकिन इतना तय है कि इस विवाद ने राम मंदिर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली और नेतृत्व दोनों को गंभीर सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। अब अयोध्या से लेकर लखनऊ और दिल्ली तक नजर सिर्फ एक बात पर टिकी है—140 पन्नों की रिपोर्ट में आखिर लिखा क्या है और कार्रवाई की गाज किन-किन लोगों पर गिरने वाली है क्योकि पाया गया कि मंदिर प्रबंधन की निगरानी व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त थी। जिम्मेदार बेखबर रहे और खेल होता रहा। सूत्रों के मुताबिक एसआईटी ने इसका अपनी रिपोर्ट में प्रमुखता से जिक्र किया है। जो गाइडलाइन थी, उसका पालन ही नहीं किया गया। यह लापरवाही ट्रस्ट के प्रमुख पदाधिकारियों के लिए मुसीबत बन सकती है।यूं तो RSS और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े पूर्णकालिक प्रचारक चंपत राय बेहद सख्त और ईमानदार माने जाते रहे हैं, लेकिन जिद्दी और किसी की न सुनने वाले व्यक्ति की उनकी छवि ने उन्हें राम मंदिर से जुड़े एक अनकंप्रोमाइजिंग शख्स के तौर पर स्थापित कर दिया। राम मंदिर बनने से पहले तक चंपत राय मंदिर निर्माण के लिए समर्पित सबसे बड़े चेहरों में शामिल हो चुके थे।जिन्होंने अपना पूरा जीवन मंदिर निर्माण के नाम कर दिया, उन्हें काम के प्रति समर्पित और अयोध्या का बड़ा जानकार भी माना गया। चूंकि कई दशकों से अयोध्या ही चंपत राय की कर्मभूमि रही है, ऐसे में अयोध्या के तमाम साधु-संतों, छावनियों, अखाड़ों और संत समाज से उनका अच्छा तालमेल बन गया था।read more:https://pahaltoday.com/us-iran-ceasefire-a-positive-step/लेकिन जब मंदिर निर्माण की बारी आई, तो चंपत राय ने अयोध्या के ज्यादातर साधु-संतों की बातों को नहीं माना। चाहे ट्रस्ट का गठन हो या मंदिर निर्माण, राम मंदिर आंदोलन से जुड़े कई नेताओं और संतों को राम जन्मभूमि ट्रस्ट और मंदिर निर्माण प्रक्रिया से दूर रखा गया।राम मंदिर ट्रस्ट के गठन के समय से ही ज्यादातर साधु-संत और मंदिर आंदोलन से जुड़े पुराने लोग इस बात से नाराज थे कि मंदिर आंदोलन में जिन लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जिन्होंने लाठियां और गोलियां खाईं, जिन साधु-संतों, मठों और छावनियों ने राम मंदिर आंदोलन में अपनी भूमिका निभाई, उन्हें पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया।जब राम जन्मभूमि ट्रस्ट का गठन हुआ, तो उसके अध्यक्ष छोटी छावनी के महंत नृत्य गोपाल दास जरूर बनाए गए, लेकिन उनकी भूमिका एक पदेन अध्यक्ष तक ही सीमित कर दी गई। सारी ताकत और अधिकार चंपत राय में निहित थे। अयोध्या के कई मठों के महंत राम जन्मभूमि ट्रस्ट बनने के बाद से ही चंपत राय से नाराज चल रहे थे, लेकिन चूंकि सरकार ने चंपत राय को काफी अधिकार दे रखे थे, इसलिए सभी चुप ही रहते थे।कई मौके ऐसे आए जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नाराजगी भी दिखाई दी। खासकर धर्मध्वजा आरोहण के वक्त चंपत राय के काम करने के तरीके को लेकर सरकार की नाराजगी सामने आई थी।ट्रस्ट में अध्यक्ष और कोषाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद मौजूद हैं। मुख्यमंत्री के सलाहकार अवनीश अवस्थी भी ट्रस्ट में रहे। अयोध्या के डीएम भी इसके ट्रस्टी होते हैं। लेकिन कहा जाता है कि चंपत राय अकेले सब पर भारी थे। इसलिए ट्रस्ट के ज्यादातर सदस्यों ने मंदिर के कामकाज और फैसलों से अपनी दूरी बना ली थी।अब जबकि चढ़ावे में चोरी का मामला तूल पकड़ चुका है और चंपत राय पर सवाल उठने लगे हैं, उन्हें कटघरे में खड़ा किया जाने लगा है, तो वर्षों से नाराज पुराने आंदोलन से जुड़े बड़े चेहरे, संत और महंत भी उनके खिलाफ खुलकर सामने आ गए हैं। चाहे विनय कटियार हों, संतोष दुबे हों या छोटी छावनी के महंत कमल नयन दास, सभी ने चंपत राय के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।विनय कटियार ने तो साफ कह दिया था कि चंपत राय ने अपराध किया है और वह जल्द ही चढ़ावे में हुई चोरी का खुलासा करेंगे। हालांकि बाद में उन्होंने यू-टर्न ले लिया और चुप हो गए।सभी को मालूम है कि चंपत राय अक्खड़, जिद्दी और किसी की न सुनने वाले हो सकते हैं, लेकिन भ्रष्ट नहीं हो सकते। क्योंकि दशकों से राम मंदिर आंदोलन से जुड़े लोगों ने उनका सादगी भरा जीवन देखा है, जो आज भी जारी है। लेकिन चढ़ावे में चोरी का मामला लोगों की आस्था से इस तरह जुड़ गया है कि लोग चंपत राय को क्लीन चिट देने के लिए तैयार नहीं हैं।वजह साफ है कि अब तक ट्रस्ट और पूरा राम मंदिर परिसर उनकी ही देखरेख में चलता रहा है। अगर उनकी जानकारी के बिना भी चढ़ावे में चोरी हुई, तो जिम्मेदारी उनकी तो बनती ही है।राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पर इतने गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं कि अगर चंपत राय को क्लीन चिट मिल भी जाती है, तो भी ट्रस्ट में उनका बने रहना अब लगभग असंभव माना जा रहा है।राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष और प्रधानमंत्री के बेहद करीबी माने जाने वाले नृपेंद्र मिश्र ने भी मंदिर के कामकाज में व्याप्त बड़ी गड़बड़ियों की बात स्वीकार की, लेकिन चंपत राय के जीवन को निष्कलंक करार दिया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भले ही अपने कार्यक्रम से चंपत राय को दूर रखा, लेकिन उन्होंने भी कहा कि किसी का चरित्र हनन नहीं होना चाहिए। इशारा चंपत राय की ओर ही माना गया।अब ऐसा लगता है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को नए सिरे से पुनर्गठित किया जा सकता है। एक नया प्रोफेशनल सिस्टम लागू किया जा सकता है। और इतने सवाल उठने के बाद चंपत राय, अनिल मिश्रा जैसे लोग ट्रस्ट से दूरी बना सकते हैं।लेकिन नजर इस बात पर जरूर रहेगी कि क्या SIT इस पूरे चढ़ावा चोरी मामले में इन बड़े चेहरों, जिनमें चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव जैसे नाम शामिल हैं, को कहीं दोषी करार देती है या नहीं।