सावधान! यहाँ यादें वर्जित हैं

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
उस पुराने मकान की ढहरी हुई मुंडेर पर बैठी वह गौरैया अब घर की मालकिन नहीं, बल्कि एक अनधिकार चेष्टा थी। पिता की मृत्यु के बाद घर की चौखट अचानक ऊँची हो गई थी और माँ की अर्थी के साथ ही वे तमाम स्मृतियाँ भी विदा हो गईं जो ईंट-गारे के इस ढाँचे को ‘मायका’ कहती थीं। अब वहाँ नीम का वह पेड़ मात्र एक लकड़ी का लट्ठा था, जिसके नीचे बचपन की सिसकियाँ दफन थीं। भाई की आँखों में अब ममत्व की जगह खतौनी के नंबर चमकते थे और भौजाई की मुस्कुराहट में उस बासी बची हुई चाय की कड़वाहट थी, जो औपचारिकता के चूल्हे पर खौल रही थी। वह घर, जो कभी फेफड़ों की तरह साँस लेता था, अब एक निर्जीव अजायबघर बन चुका था जहाँ उसकी गुड़िया के टूटे हाथ और पुरानी कापियाँ ‘अतिक्रमण’ की श्रेणी में डाल दी गई थीं। वह अपनी ही जड़ों से उखड़े हुए उस गमले की तरह थी जिसे अब बरामदे के कोने में जगह मिलने पर अहसान मानना था।सम्बन्धों की इस ढहती हुई सल्तनत में प्रतीक अब बदल चुके थे। पिता के चश्मे का शीशा जो कभी नैतिकता का लेंस था, अब धूल की परतों में सुबक रहा था। जिस कमरे में वह कभी बेखौफ होकर पैर फैलाती थी, वहाँ अब संदूक और फालतू सामान का पहरा था—मानो घर ने अपनी बेटी को पहचानने से इनकार कर दिया हो। मायका अब उस पुराने कोट की तरह था जिसे सहेजने का मन तो सबका था, पर पहनने का साहस किसी में नहीं। भाई के शब्द अब शहद में डुबाए हुए नश्तर थे, जो बार-बार यह अहसास दिलाते थे कि संभ्रांत परिवारों में विवाहित बेटियाँ केवल ‘अतिथि’ होती हैं, और अतिथि का अधिक ठहरना शास्त्र सम्मत नहीं। वह घर अब एक ऐसा भूगोल बन गया था जिसकी सीमा रेखाएं उसकी विदाई के दिन ही खींच दी गई थीं, बस सूचना का प्रेषण माता-पिता की अंतिम सांसों तक रुका हुआ था।read more:https://worldtrustednews.in/tamil-nadu-elections-seat-sharing-formula-in-nda-almost-finalised-tensions-increase-in-dmk-alliance/ मायका एक मानसिक अवस्था थी, जो भौतिक देह के पंचतत्व में विलीन होते ही लुप्त हो गई। अब वहाँ केवल स्मृतियों का एक कबाड़खाना था जहाँ वह अपनी पहचान ढूँढने आई थी, पर उसे मिला केवल सन्नाटा और दीवारों पर जमी हुई सीलन। जिस आंगन को वह अपना ब्रह्मांड समझती थी, वह अब एक विवादित भूखंड मात्र था। वह खुद को उस डाकघर की तरह महसूस कर रही थी जहाँ पत्र तो आते हैं, पर पाने वाले का पता बदल चुका होता है। माँ की रसोई अब एक प्रयोगशाला थी जहाँ केवल नपे-तुले रिश्तों का स्वाद चखा जाता था। वहाँ अब प्रेम की जगह प्रोटोकॉल ने ले ली थी। वह समझ गई कि माता-पिता के बिना मायका केवल एक रूपक है, जिसे समाज ने लड़कियों को बहलाने के लिए गढ़ा था ताकि वे अपनी जड़ों की तलाश में भटकती रहें।अंतिम दिन जब वह चलने लगी, तो भाई ने उसे एक पुराना पीतल का लोटा थमा दिया—शायद विरासत का अंतिम अवशेष। उसने लोटे में झाँका, वह खाली था, बिल्कुल उसके मायके के अहसास की तरह। तभी उसने देखा कि आँगन के बीचों-बीच लगा वह पुराना अमरूद का पेड़, जिसे उसने अपने हाथों से सींचा था, रातों-रात काटकर जड़ से उखाड़ दिया गया था। उसने सिसकते हुए पूछा—”यह क्या हुआ?” भाई ने बड़ी सहजता से कहा—”बहन, इस जगह अब कार पार्किंग बनेगी, बेवजह जड़ें नींव हिला रही थीं।” उसने अपना सूटकेस उठाया और मुड़कर देखा, तो पाया कि घर के मुख्य द्वार पर उसके नाम की नेमप्लेट (पिता ने अपनी बेटी के नाम पर ही घर का नेमप्लेट बनवाया था) की जगह ‘सावधान, कुत्तों से बचें’ का बोर्ड टंग चुका था। वह घर जिसे वह अपना समझ रही थी, दरअसल एक श्मशान था जहाँ उसकी यादों का अंतिम संस्कार पहले ही हो चुका था। उसने लोटा वहीं छोड़ा और बिना पीछे मुड़े उस ‘पार्किंग लॉट’ से बाहर निकल गई।

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